त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ त्रिपुरारहस्यं ज्ञानखण्डे आलक्ष्य राजपुत्रोऽपि वैषम्यं चात्मवञ्चनम् । वामेन जग्राह कचे चेटीं क्रोधारुणेक्षणः ॥ ४४ ॥ कृपाणमाददे दक्षहस्तेन नृपसम्भवः । तर्जयंस्तां प्रत्युवाच वद वृत्तं यथातथम् ॥ ४५ ॥ नो चेन्न स्याज्जीवितं ते क्षणमात्रमपि द्रुतम् । सैवं निशम्य तद्वाक्यं भीता प्राणपरीप्सया ॥ ४६ ॥ जगौ यथावत्तत् सर्वं चिराद् वृत्तं समास्थितम् । प्रादर्शयच्चापि तस्मै तां भृत्येन सुसङ्गताम् ॥ ४७ ॥ क्वचिद्भूमौ कटे भृत्यं कृष्णं पिङ्गललोचनम् । प्रांशुं मलिनसर्वाङ्गं रूक्षवक्त्रं जुगुप्सितम् ॥ ४८ ॥ समाश्लिष्य रतिश्रान्तां सर्वाङ्गैः प्रेमभावतः । मृदुबाहुलतावृत्तग्रीवस्य वदने स्वकम् ॥ ४९ ॥ निवेश्य वक्त्रकमलं पद्भ्यामाश्लिष्य गाढतः । तयोरुयुग्मं तद्वक्षस्संसक्तगुरुसुस्तनीम् ॥ ५० ॥ राजकुमारने जब ऐसा विपरीत व्यवहार और अपनेको वञ्चित होते देखा तो क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो गयीं। उसने अपने बायें हाथसे दासी की चोटी पकड़ ली ॥ ४४ ॥ और दायें हाथमें तलवार ले ली। फिर उसे डपटते हुए पूछा, “ठीक-ठीक बात बता, नहीं तो अब एक क्षण भी तेरा जीवन नहीं रह सकता ॥ ४५-४६ पू० ॥ राजकुमारके ये वचन सुनकर वह डर गयी और अपने प्राण बचानेके लिये बहुत दिनोंसे जो कुछ हो रहा था वह सब बता दिया। तथा सेवकके साथ समागम करती उसकी पत्नी भी दिखा दी ॥ ४६ उ०-४७ ॥ राजकुमारने देखा कि उसकी स्त्री भूमि पर बिछी एक चटाईपर उस सेवकको अपने सब अंगोंसे आलिंगित किये पड़ी है, जिसका काला रंग है, लाल आँखें हैं, लंबा शरीर है, सब अंग मलिन हैं, रूखा चेहरा है और जो अत्यन्त घृणित है। रतिके श्रमसे वह कुछ श्रान्त है, अपनी कोमल बाहुलताओंको उसके गलेमें डालकर उसने अपने