त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
४४ त्रिपुरारहस्यं ज्ञानखण्डे आलक्ष्य राजपुत्रोऽपि वैषम्यं चात्मवञ्चनम् । वामेन जग्राह कचे चेटीं क्रोधारुणेक्षणः ॥ ४४ ॥ कृपाणमाददे दक्षहस्तेन नृपसम्भवः । तर्जयंस्तां प्रत्युवाच वद वृत्तं यथातथम् ॥ ४५ ॥ नो चेन्न स्याज्जीवितं ते क्षणमात्रमपि द्रुतम् । सैवं निशम्य तद्वाक्यं भीता प्राणपरीप्सया ॥ ४६ ॥ जगौ यथावत्तत् सर्वं चिराद् वृत्तं समास्थितम् । प्रादर्शयच्चापि तस्मै तां भृत्येन सुसङ्गताम् ॥ ४७ ॥ क्वचिद्भूमौ कटे भृत्यं कृष्णं पिङ्गललोचनम् । प्रांशुं मलिनसर्वाङ्गं रूक्षवक्त्रं जुगुप्सितम् ॥ ४८ ॥ समाश्लिष्य रतिश्रान्तां सर्वाङ्गैः प्रेमभावतः । मृदुबाहुलतावृत्तग्रीवस्य वदने स्वकम् ॥ ४९ ॥ निवेश्य वक्त्रकमलं पद्भ्यामाश्लिष्य गाढतः । तयोरुयुग्मं तद्वक्षस्संसक्तगुरुसुस्तनीम् ॥ ५० ॥ राजकुमारने जब ऐसा विपरीत व्यवहार और अपनेको वञ्चित होते देखा तो क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो गयीं। उसने अपने बायें हाथसे दासी की चोटी पकड़ ली ॥ ४४ ॥ और दायें हाथमें तलवार ले ली। फिर उसे डपटते हुए पूछा, “ठीक-ठीक बात बता, नहीं तो अब एक क्षण भी तेरा जीवन नहीं रह सकता ॥ ४५-४६ पू० ॥ राजकुमारके ये वचन सुनकर वह डर गयी और अपने प्राण बचानेके लिये बहुत दिनोंसे जो कुछ हो रहा था वह सब बता दिया। तथा सेवकके साथ समागम करती उसकी पत्नी भी दिखा दी ॥ ४६ उ०-४७ ॥ राजकुमारने देखा कि उसकी स्त्री भूमि पर बिछी एक चटाईपर उस सेवकको अपने सब अंगोंसे आलिंगित किये पड़ी है, जिसका काला रंग है, लाल आँखें हैं, लंबा शरीर है, सब अंग मलिन हैं, रूखा चेहरा है और जो अत्यन्त घृणित है। रतिके श्रमसे वह कुछ श्रान्त है, अपनी कोमल बाहुलताओंको उसके गलेमें डालकर उसने अपने
चतुर्थोऽध्यायः । ४५ वासन्तिकामिव लतां वृतां कुसुमकोरकैः । रोहिणीं राहुणोपेतामिवापश्यन्नृपात्मजः ॥ ५१ ॥ एवंविधां समालोक्य निद्रयापगतस्मृतिम् । मोमुह्यमानश्चात्यन्तं क्षणं पश्चाद्धृतिं भजन् ॥ ५२ ॥ यत् प्राह राजतनयस्तन्मत्तः श्रूयतां ननु । धिङ्मामणार्यमत्यन्तं मूढं मदविमोहितम् ॥ ५३ ॥ धिग्ये स्त्रीष्वभिसंग्रीता धिक् तांश्च पुरुषाधमान् । न कामिन्यः कस्यचित् स्युर्वृक्षस्येव च शारिकाः ॥ ५४ ॥ किमहं मां प्रवक्ष्यामि मुग्धं महिषपोतवत् । जानन्तमेनां प्राणेभ्यः प्रेष्ठां सुचिरकालतः ॥ ५५ ॥ न स्त्रियः कस्यचिद्वा स्युर्वेश्या इव विटस्य हि । यः स्त्रीषु विश्वब्धमनाः स एव वनगर्दभः ॥ ५६ ॥ मुखकमलको उसके मुँहसे सटा रखा है, चरणोंसे उसकी दोनों टाँगोंको कसा हुआ है तथा उसके पीन पयोधर उसके हाथों से कसे हुए हैं। [ उस समय वह ऐसी जान पड़ती थी ] मानों कुसुम- कलिकाओंसे घिरी हुई वासन्तिका लता हो, अथवा राहुसे मिली हुई रोहिणी हो ॥ ४८-५१ ॥ निद्रासे अचेत अपनी पत्नीको ऐसी स्थितिमें देखकर राजकुमार कुछ देरके लिये अपनेको बिलकुल भूल गया, फिर धैर्य धारणकर उसने जो कुछ कहा वह मुझसे सुनिये—॥ ५२-५३ पू० ॥ मदिराके नशेमें चूर मुझ अनार्य महामूढको धिक्कार है। इन स्त्रियोंमें जिनकी अत्यन्त आसक्ति है उन नीच मनुष्योंको भी धिक्कार है। [ जहाँ-तहाँ चारा चुगनेवाली ] सारिकाएँ (मैनाएँ) जैसे किसी एक वृक्षकी नहीं हो सकतीं उसी प्रकार ये नारियाँ किसीकी भी नहीं होतीं ॥ ५३ उ०-५४ ॥ मैं अपनेको ही क्या कहूँ? मैं तो इसमें भैंसके बछेके समान मोहग्रस्त रहा, चिरकालसे इसे अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय समझता रहा ॥ ५५ ॥ वेश्या जैसे अपने प्रेमीकी नहीं होती इसी प्रकार स्त्रियाँ किसीकी भी नहीं होतीं। जिसका स्त्रियोंमें विश्वास है वह तो जंगली गधा ही है॥५६॥
४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे या स्थितिः शारदाभ्रस्य क्षणिका ह्यनवस्थिता । ततोऽपि पेलवा स्त्रीणां स्थितिरत्यन्तचञ्चला ॥ ५७ ॥ नाहमद्यावधि ह्येवं स्त्रीस्वभावमहोऽविदम् । यन्मां सर्वात्मनासक्तं त्यक्त्वा भृत्यमनुव्रता ॥ ५८ ॥ अन्यासक्ता गूढभावा मयि छद्मानुरागिणी । प्रदर्शयन्ती भक्तिं स्वां नटीव विटमण्डले ॥ ५९ ॥ नाविदं लेशतोऽप्येनां मदिरामत्तमानसः । छायेव मां सङ्गतेति मत्वा विश्वब्धमानसः ॥ ६० ॥ अप्रेक्षणीयां चेटीं तां वञ्चितश्चिरसङ्गतः । नूनं मत्तो मूढतमः को भवेज्जगतीतले ॥ ६१ ॥ य एवं विस्रम्भपूर्वमनया चिरवञ्चितः । अहोऽयं भृत्यहतकः सर्वाङ्गविकृताकृतिः ॥ ६२ ॥ शरत्कालीन मेघकी स्थिति जो क्षणिक और अस्थायी होती है इन स्त्रियोंकी स्थिति तो उससे भी अधिक अस्थायी और चंचल समझनी चाहिये ॥ ५७ ॥ अहो ! आजतक भी मैंने इन स्त्रियोंके स्वभावको नहीं समझा। मैं सब प्रकार इसमें आसक्त था, फिर भी इसने मुझे छोड़कर इस सेवकका पल्ला पकड़ा ॥ ५८ ॥ यह दूसरेमें आसक्त थी, परन्तु इस भावको इसने खूब छिपाया। नटी जैसे नटोंके बीच अपना अत्यन्त भक्तिभाव प्रदर्शित करती है उसी प्रकार यह भी कपटपूर्वक मुझसे प्रेम दिखाती रही ॥ ५९ ॥ मेरा मन मदिरापानसे ऐसा उन्मत्तहो गया कि मैं इसे लेशमात्र भी न पहचान सका। मेरे मनमें सदा यही विश्वास रहा कि यह तो छायाके समान मेरी नित्यसंगिनी है ॥ ६० ॥ इनसे ठगा जाकर मैं चिरकालसे उस दासीके साथ ही समागम करता रहा, जिसकी ओर देखनेसे भी दुःख होता है। सचमुच मुझसे बढ़कर मूढ इस पृथ्वीतलमें और कौन हो सकता है, जिसे यह विश्वास दिलाकर चिरकालसे इस प्रकार ठगती रही ॥ ६१-६२ पू० ॥ वाहरे ! यह निन्दनीय सेवक ! इसके तो सभी अंग भोंड़ी आकृति-
चतुर्थोऽध्यायः । ४७ किमस्मिन्ननया दृष्टं सौन्दर्यं सर्वतोऽधिकम् । यतो मां निजसौन्दर्याहृतलोकावलोकनम् ॥ ६३ ॥ अनुरक्तं सर्वथैव त्यक्त्वैनमुपसङ्गता । एवं प्रलप्य बहुधा निर्विण्णोऽतितरां तदा ॥ ६४ ॥ राजपुत्रो वनं प्रागात् सर्वसङ्गविवर्जितः । तस्माद्राजकुमारैतत् सौन्दर्यं मनसोत्थितम् ॥ ६५ ॥ यथा त्वं मयि चात्यन्तसौभगेक्षणपूर्वकम् । रतिं विन्दस्यतितरां तथा वा तद्विशेषतः ॥ ६६ ॥ विन्दन्ति रतिमत्यन्तं योषित्सु विकृतास्वपि । अत्र ते प्रत्ययं वक्ष्ये शृणु प्रिय समाहितः ॥ ६७ ॥ विलोक्यते या हि योषित् सा बहिःसुव्यवस्थिता । या च तत्प्रतिबिम्बात्मरूपिणी चित्तसंश्रया ॥ ६८ ॥ सङ्कल्परूपिणी तस्याः सौष्ठवं मनसोलिखन् । पौनःपुन्येन तदनु वाञ्छामुपसमागतः ॥ ६९ ॥ वाले हैं। इसमें इसे ऐसा सबसे बड़ा क्या सौन्दर्य 'दिखायी दिया जो मुझे छोड़कर इसका सहवास स्वीकार कर बैठी ! मेरी सुन्दरताने तो सभी लोगोंकी आँखोंको आकर्षित कर रखा है और इसके प्रति मेरा अनुराग भी पूरा था ॥ ६२ उ०-६४ पू० ॥ इस प्रकार बहुत कुछ कहकर वह राजपुत्र अत्यन्त विरक्त हो गया और सबकी आसक्ति छोड़कर वनको चला गया ॥ ६४ उ० -६५ पू० ॥ अतः राजकुमार ! यह सुन्दरता तो अपने मनकी ही उपज है। जिस प्रकार अत्यन्त सुन्दरता देखकर आपको मुझसे रतिजनित सुख मिलता है उससे भी अधिक सुख कुरूपा नारियोंसे भी प्राप्त हो जाता है। प्रियवर ! इस विषयको मैं निश्चयात्मक रूपसे समझाती हूँ, आप सावधान होकर सुनें ॥ ६५ उ०-६७ ॥ जो स्त्री दिखायी देती है वह तो बाहर रहती है किन्तु चित्त में संकल्परूपसे रहनेवाली उसकी जो प्रतिबिम्बरूपिणी आकृति है, मनसे उसमें सुन्दरताकी कल्पना हो जाती है। उसकी पुनः पुनः [स्मृति
४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे क्षुब्धेन्द्रियो नरस्तस्यां रतिमाप्नोति सर्वतः । अक्षुब्धे त्विन्द्रिये न स्यात् सुन्दर्यामपि वै रतिः ॥ ७० ॥ तत्र मूलं समुल्लेखः सौष्ठवस्य पुनः पुनः । अतः क्षोभो नैव दृष्टो बालानां योगिनामपि ॥ ७१ ॥ तथा च यो यो यस्यान्तु रतिं विन्दति मानवः । सुन्दर्यां वापि चान्यस्यां तत्र सौष्ठवमुल्लिखेत् ॥ ७२ ॥ दृश्यन्ते योषितोऽन्यन्तबीभत्साकारविग्रहाः । तरुणैः सङ्गतास्ताश्च दृश्यन्तेऽपत्यहेतुतः ॥ ७३ ॥ विरूपतोल्लेखनं वाप्यनुल्लेखस्तु सौष्ठवे । यदि स्यात्तत् कथं नृणां रतिस्तासु हि सम्भवेत् ॥ ७४ ॥ किं वक्तव्यमहो नृणां कामिनां क्षिप्तचेतसाम् । जघन्याङ्गेऽपि सौन्दर्यं भासते सर्वतोऽधिकम् ॥ ७५ ॥ होने से ] मनमें भोगनेकी इच्छा होती है । उसके कारण अन्य इच्छाएँ दब जाती हैं तथा उपस्थेन्द्रियमें क्षोभ होनेसे उसीमें पुरुष रतिसुख अनुभव करने लगता है । यदि इन्द्रियमें क्षोभ न हो तो सुन्दरी स्त्रीमें भी पुरुषको रतिसुख नहीं मिल सकता ॥ ६८-७० ॥ उस क्षोभमें हेतु है मनमें पुनः सुन्दरताका स्फुरण होना । इसीसे बालकों और योगियोंमें क्षोभ होता नहीं देखा जाता ॥ ७१ ॥ इससे निश्चय हुआ कि सुन्दरी अथवा असुन्दरी जिस स्त्रीमें जिस पुरुषको रतिसुख की अनुभूति होती है उसीमें उसे सुन्दरताकी कल्पना हो जाती है ॥ ७२ ॥ ऐसी स्त्रियाँ भी देखी ही जाती हैं जिनके आकार और शरीर अत्यन्त बीभत्स होते हैं । किन्तु उनके सन्तान होतो दिखायी देती है, इससे निश्चय होता है कि उनका भी युवकोंसे समागम हुआ है ॥७३॥ यदि उनमें कुरूपताकी कल्पना रहती अथवा चित्तपर उनका सौन्दर्य अङ्कित ही न होता तो उनमें पुरुषोंको रतिसुख कैसे मिल सकता था ॥ ७४ ॥ इन कामातुर और विक्षिप्तचित्त पुरुषोंके विषयमें क्या कहा जाय, जिन्हें स्त्रीके अत्यन्त घृणित अंगमें भी सबसे अधिक सुन्दरता की प्रतीति होती है ॥ ७५ ॥
चतुर्थोऽध्यायः । ४६ मलमूत्रपरिक्लिन्नं यदङ्गं तत्र सौभगम् । पश्येच्चेत् कुत्र नो पश्येत् सौन्दर्यं तन्ममेरय ॥ ७६ ॥ तस्मात् सौन्दर्यमेतद्वै राजपुत्र निशामय । अभिमानमृते नैष सुखहेतुर्भवेत् क्वचित् ॥ ७७ ॥ क्षौद्रमाधुर्यवद्देहे सौन्दर्यं सहजं यदि । तद्भालानां कुमाराणां कुतो नो भाति तद्वद ॥ ७८ ॥ देशभेदेषु दृश्यन्ते विविधाकृतयो नराः । एकपादैकनयना लम्बकर्णा हयाननाः ॥ ७९ ॥ कर्णप्रावरणाः फालवक्त्रा निर्गतदंष्ट्रकाः । त्रिनसा दीर्घनासाश्च लोमच्छन्ना विलोमकाः ॥ ८० ॥ पिङ्गकेशाः श्वेतकेशा विकेशाः स्थूलकेशकाः । चित्रवर्णाः काकवर्णाः पिङ्गला लोहिताङ्गकाः ॥ ८१ ॥ मुझे बताइये तो, जो मूर्ख मल-मूत्रसे भरे अंगमें भी सुन्दरता देख लेता है उसे कहाँ सौन्दर्यका भान नहीं हो सकता ॥ ७६ ॥ अतः राजपुत्र ! खूब ध्यान रखें, यह सुन्दरता बिना मानसिक कल्पनाके कहीं भी सुखकी हेतु नहीं हो सकती ॥ ७७ ॥ यदि मधुके माधुर्यकी तरह सुन्दरताको भी शरीरका स्वभाव माना जाय ता बताइये, छोटे बच्चोंको उसकी प्रतीति क्यों नहीं होती ॥ ७८ ॥ देशभेदसे अनेकों आकृतियोंके पुरुष देखे जाते हैं। कोई एक पैरवाले, कोई एक आँखवाले, कोई लंबे कानोंवाले और कोई घोड़ेके-से मुँहवाले होते हैं ॥ ७६ ॥ किन्हींके कान फैले हुए होते हैं, किन्हींका मुँह हलकी तरह होता है, उनकी दाढ़ें बाहर निकली होती हैं। किन्हींके नाक होती ही नहीं और कोई लंबी नाकवाले होते हैं। कोई लोमोंसे ढके होते हैं और किन्हींके लोम बिलकुल नहीं होते ॥ ८० ॥ किन्हींके केश पीले होते हैं, कोई श्वेत केशवाले होते हैं तथा कोई केशहीन और कोई सघन केशोंवाले देखे जाते हैं। कोई (श्वेत कुष्ठके कारण) चितकबरे, कोई कौएके समान काले, कोई पीले और कोई लाल शरीरवाले होते हैं ॥ ८१ ॥ ४ त्रि०
५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं बहुविधा मर्त्याः सजातिवनितासु ते । रतिं विन्दन्ति त्वमिव राजपुत्र निशामय ॥ ८२ ॥ सुखसाधनभूतेषु मुख्यं यत् स्त्रीवपुःस्थितम् । सर्वप्रियं यत्र सर्वे मुह्यन्ति विबुधा अपि ॥ ८३ ॥ पुंसां वपुस्तथा स्त्रीणां प्रियमत्यन्तसुन्दरम् । विमृश्य सुबुद्ध्या त्वं राजपुत्र यथास्थितम् ॥ ८४ ॥ मांसलिप्तमसृक्क्लिन्नं शिराबद्धं त्वगाततम् । अस्थिपञ्जरकं लोमच्छन्नं पित्तकफाहितम् ॥ ८५ ॥ मलमूत्रकुमलं तच्छुक्रशोणितसम्भवम् । मूत्रद्वारसमुद्भूतमहो प्रियमिहेष्यते ॥ ८६ ॥ य एवमतिबीभत्से वितन्वन्ति रतिं नराः । विट्कृमिभ्यः कुतस्तेषां भवेदन्तरमीरय ॥ ८७ ॥ ऐसे ही अनेकों प्रकारके पुरुष हैं। राजपुत्र ! निश्चय मानिये, वे सभी अपनी सजातीय स्त्रियोंमें आपकी तरह रतिसुख अनुभव करते हैं ॥ ८२ ॥ सुखके साधनोंमें जो स्त्रीशरीर सबसे प्रधान समझा जाता है, जो सभीको प्रिय है और जिसमें सम्पूर्ण देवताओंको भी मोह हो जाता है, इसी प्रकार स्त्रियोंके लिये जो पुरुषोंका शरीर अत्यन्त प्रिय और सुन्दर भासता है, हे राजपुत्र ! आप अपनी सुबुद्धिसे तनिक विचार तो करें कि वह वास्तवमें कैसा है ॥ ८३-८४ ॥ वह मांससे लिपटा है, लोहूसे लथपथ है, नस-नाड़ियोंसे बँधा हुआ है, खालसे ढका हुआ है, हड्डियोंका ढाँचा है, बालोंसे आच्छन्न है और पित्त एवं कफसे भरा हुआ है ॥ ८५ ॥ [यही नहीं,] वह मल-मूत्रका भण्डार है तथा वीर्य एवं रजसे उत्पन्न हुआ है। हाय ! मूत्रद्वारसे निकले हुए इस घृणित शरीरको ही लोग प्रिय मान बैठते हैं ! ॥ ८६ ॥ बताइये, जो लोग ऐसे बीभत्स शरीरमें राग करते हैं, उनका विष्ठाके कीड़ोंसे क्या अन्तर हो सकता है ॥ ८७ ॥
चतुर्थोऽध्यायः । ५१ राजपुत्र तनुरियं प्रिया हि नितरां तव । विभावय विवेकेन धातूनाञ्च पृथक्स्थितिम् ॥ ८८ ॥ एवमन्यत्रोपयोज्ये मधुराम्लादिषड्रसे । परिणामस्वभावन्तु सूक्ष्मदृष्ट्या विभावय ॥ ८९ ॥ भक्षितस्यापि सर्वस्य विड्भावः परिणामके । सर्वथा नात्र सन्देहः सर्वैरेव विभावितः ॥ ९० ॥ वदैवं संस्थिते लोके किं प्रियं स्यात् किमप्रियम् । इत्युक्तो हेमचूड़ोऽथ वैरस्यं विषये विदन् ॥ ९१ ॥ श्रुत्वाऽपूर्वं वाक्यजालं विस्मितोऽभवदञ्जसा । विचार्य भूयस्तत् सर्वं यदुक्तं हेमलेखया ॥ ९२ ॥ भोगेषु जातनिर्वेदः परं वैराग्यमाप्तवान् । अथ क्रमेण पृष्ट्वा तां प्रियां ज्ञात्वा च तत्पदम् ॥ ९३ ॥ राजकुमार ! आपको जो यह शरीर अत्यन्त प्रिय जान पड़ता है, तनिक विवेकद्वारा इसके रक्त-मज्जा आदि धातुओंकी पृथक्-पृथक् स्थितिका तो विचार कीजिये ॥ ८८ ॥ यही बात अन्य भोज्य पदार्थोंके विषयमें भी है। उन मीठे-खट्टे आदि षड्रस पदार्थोंके परिणाम और स्वभावका भी आप सूक्ष्म बुद्धि- से विचार करें ॥ ८९ ॥ जो कुछ खाया जाता है उस सबका परिणाममें विष्ठा ही बनता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है, सभी जानते हैं। संसारकी ऐसी स्थिति देखते हुए बताइये, इसमें क्या प्रिय है और क्या अप्रिय है ?'' ॥ ९०-९१ पू० ॥ हेमलेखाका यह भाषण सुनकर हेमचूडको विषयोंमें वैराग्य हो गया। उसका यह अपूर्व वाक्य-विन्यास सुनकर उसे स्वभावसे ही बड़ा विस्मय हुआ ॥ ९१ उ०-९२ पू० ॥ फिर हेमलेखान जो कुछ कहा था उसपर स्वयं विचार किया। इससे भोगोंमें अरुचि हो जानेके कारण उसे परम वैराग्य हो गया ॥ ९२ उ०-९३ पू० ॥ तब क्रमशः उसने उस प्रियतमासे अनेकों प्रश्न करके उस परम
५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे केवलां चितिमात्मस्थां त्रिपुरामात्मरूपिणीम् । बुद्ध्वाऽभवद्विमुक्तात्मा स्वात्मभूताखिलेक्षणः ॥ ९४ ॥ जीवन्मुक्तः समभवत् ततस्तस्यानुजोऽपि हि । मणिचूडोऽविदद्भ्रातुर्मुक्ताचूडोऽपि पुत्रतः ॥ ९५ ॥ मुक्ताचूडप्रिया चापि स्नुषया ज्ञानमासदत् । मन्त्रिणश्चापि पौराश्च बभूवुर्ज्ञानशालिनः ॥ ९६ ॥ न तत्र नगरे कश्चिदविद्वान् समजायत । आसीद् ब्रह्मपुरप्रख्यं शान्तसंसृतिवासनम् ॥ ९७ ॥ विशालनगरं तच्च जगत्यत्युत्तमं बभौ । यत्र कीराः शारिकाश्च पञ्जरस्थाः पठन्ति वै ॥ ९८ ॥ चितिरूपं स्वमात्मानं भजध्वं चेत्यवर्जितम् । नास्ति चेत्यं चितेरन्यद्दर्पणे प्रतिबिम्बवत् ॥ ९९ ॥ पदको जान लिया, जो विशुद्ध चिन्मात्रा आत्मस्वरूपिणी श्रीत्रिपुरा ही हैं और सबके अन्तःकरणमें स्थित है। उसे जानकर वह मुक्तस्वरूप (जीवन्मुक्त) हो गया और सबको अपने आत्मस्वरूपसे ही देखने लगा ॥ ६३ उ०-६४ ॥ फिर उसका छोटा भाई मणिचूड़ भी अपने भाईसे ज्ञान प्राप्त करके जीवन्मुक्त हो गया और राजा मुक्ताचूड़ने भी अपने पुत्रसे ही ज्ञान प्राप्त किया ॥ ६५ ॥ मुक्ताचूड़की रानीने अपनी पुत्रवधू (हेमलेखा) से ज्ञान प्राप्त किया। इसी प्रकार सब मन्त्री और पुरवासी भी ज्ञानसम्पन्न हो गये ॥ ६६ ॥ उस नगरमें कोई भी अज्ञानी नहीं रहा। सभीकी सांसारिक वासनाएँ निवृत्त हो गयीं। इस प्रकार वह नगर ब्रह्मपुरीके समान जान पड़ता था ॥ ६७ ॥ वह विशाल नगर संसारमें अत्यन्त उत्कृष्ट हो गया। वहाँ पिंजड़ोंमें बन्द तोते और मैना भी इस प्रकार पढ़ते रहते थे— ॥ ६८ ॥ “चेत्य (दृश्य) पदार्थोंसे रहित जो चिन्मात्र अपना आत्मा है, उसका भजन करो। दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान चेत्य पदार्थ चिन्मात्रसे भिन्न नहीं है ॥ ६६ ॥
चतुर्थोऽध्यायः । ५३ चितिश्चेत्यं चितिरहं चितिः सर्वं चराचरम् । यतः सर्वं चितिमनु भाति सा तु स्वतन्त्रतः ॥ १०० ॥ अतिश्रिति जनाः सर्वे भासिनीं सर्वसंश्रयाम् । भजध्वं भ्रान्तिमुत्सृज्य चितिमात्रसुदृष्टयः ॥ १०१ ॥ कदाचिदेवं कीराणां श्रुत्वा वाक्यं महोदयम् । ब्राह्मणा वामदेवाद्या नामाचख्युः पुरस्य तु ॥ १०२ ॥ यतोऽत्र विद्यां तिर्यञ्चोऽप्याहुस्तस्मादिदं पुरम् । प्रसिद्धविद्यानगरमिति नाम्ना प्रसिद्धयतु ॥ १०३ ॥ तदद्यापि च तेनैव नाम्ना तन्नगरं स्थितम् । राम तस्मात्तु सत्सङ्गो मूलं सर्वशुभोदये ॥ १०४ ॥ सङ्गेन हेमलेखायाः सर्वे विद्याविदोऽभवन् । तस्मात् सङ्गः परं मूलं राम जानीहि श्रेयसः ॥ १०५ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने सत्सङ्गफलं चतुर्थोऽध्यायः ॥ चिति (चिन्मात्र) ही चेत्य है, चिति ही मैं हूँ और चिति ही सारा चराचर है, क्योंकि इन सबका भान चितिसे ही होता है और चिति स्वयंप्रकाश है ॥ १०० ॥ इसलिये हे लोगो ! भ्रान्ति को त्यागकर केवल चितिपर ही दृष्टि रखते हुए सबको प्रकाशित करनेवाली और सभीकी आश्रयभूत चिति- का ही भजन करो" ॥ १०१ ॥ किसी दिन वामदेवादि ब्रह्मज्ञ महात्माओंने तोतोंके ये अत्यन्त सारगर्भित वचन सुनकर उस नगरका नाम बदल दिया ॥ १०२ ॥ [वे बोले—] क्योंकि यहाँ पक्षी भी विद्या (ब्रह्मज्ञान) का प्रतिपादन करते हैं, इसलिये अब यह नगर 'विद्यानगर' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ अतः आज भी वह नगर उसी नामसे विख्यात है। इसलिये परशुराम ! सत्संग ही सब प्रकारके मंगलका आविर्भाव होनेमें मूल कारण है ॥ १०४ ॥ एक हेमलेखाके संगसे ही वहाँ सब लोग ज्ञानवान हो गये । अतः परशुराम ! निश्चय जानो, कल्याणका वास्तविक मूल सत्संग ही है ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ।
पञ्चमोध्यायः ॥ ५ ॥ एवं सत्सङ्गमाहात्म्यं श्रुत्वाऽत्रिसुतभाषितम् । प्रहृष्टमानसो भूयः प्रष्टुमेवोपचक्रमे ॥ १ ॥ सत्यं प्रोक्तमिदं नाथ भवता शुभकारणम् । सत्सङ्गरूपमेतच्च प्रत्यक्षेणैव भावितम् ॥ २ ॥ यो यथा सङ्गमाप्नोति फलं तस्य तथा भवेत् । स्त्रियोऽपि हेमलेखायाः सङ्गात् सर्वे महाफलाः ॥ ३ ॥ भूय इच्छाम्यहं श्रोतुं हेमचूडस्तया कथम् । बोधितस्तन्ममाचक्ष्व विस्तरेण दयानिधे ॥ ४ ॥ एवं रामेणानुयुक्तो दत्तात्रेय उवाच तम् । शृणु भार्गव वक्ष्यामि कथां परमपावनीम् ॥ ५ ॥
पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ हेमचूडकी विवशता, हेमलताद्वारा अद्भुत उपाख्यानका वर्णन इस प्रकार श्रीदत्तात्रेयजी द्वारा कही हुई सत्संगकी महिमा सुनकर परशुरामके चित्तको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने पुनः प्रश्न किया—॥ १ ॥ “नाथ ! आपने सत्संगको कल्याणका प्रधान कारण बताया, सो ठीक ही है । मैंने तो [ श्रीसंवर्त मुनिके सत्संगद्वारा ] इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी कर लिया ॥ २ ॥ जो जैसा संग करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। हेमलेखा स्त्री थी, तथापि उसके संगसे सभी महान् फलके भागी हुए ॥ ३ ॥ किन्तु यह बात मैं फिर भी सुनना चाहता हूँ कि उसने हेमचूडको किस प्रकार तत्त्वज्ञान कराया । दयानिधे ! वह प्रसंग आप मुझे विस्तार से सुनाइये” ॥ ४ ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर श्रीदत्तात्रेयजीने उनसे कहा, “भृगुनन्दन ! सुनो, मैं तुम्हें वह परम पवित्र कथा सुनाता हूँ ॥ ५ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । ५५ एवं तस्या वचः श्रुत्वा विषयान् विरसान् विदन् । तेषु सञ्जातनिर्वेदो विमना इव संबभौ ॥ ६ ॥ चिरस्थितविषयजवासनानां वशं गतः । त्यक्तुं वा संगृहीतुं वा नाशकत् सहसा हि सः ॥ ७ ॥ प्रियां न किञ्चित् प्रोवाच राजपुत्रोऽतिलज्जितः । कांश्चिच दिवसानेवमनयच्चिन्तायाकुलः ॥ ८ ॥ विषयेषु प्रसक्तेषु स्मृत्वा तत् प्रियोदितम् । विगर्हन्नेव स्वात्मानं बुभुजे वासनावशः ॥ ९ ॥ वासनावेगवशतो विषयानुगच्छति । दृष्ट्वैव विषयान् दोषान् प्रियाप्रोक्तान् विचिन्तयन् ॥ १० ॥ शोकसंविग्नहृदयो विषीदति मुहुर्मुहुः । एवं तस्याभवच्चित्तं चलदोलास्थितं यथा ॥ ११ ॥
हेमलताके वैसे वचन सुनकर हेमचूडको विषय रसहीन-से दिखायी देने लगे और उनमें रुचि न रहनेके कारण वह उदास-सा हो गया।॥ ६ ॥ विषयजनित वासनाएँ तो उसमें चिरकालसे थीं ही और उनका उसके चित्तपर अधिकार भी था। इसलिये अब वह उन्हें न तो सहसा त्याग सकता था और न रख ही सकता था ॥ ७ ॥ [हेमलताने उसे निरुत्तर कर दिया था, इसलिये] वह राजकुमार बहुत लज्जित हो जानेके कारण अपनी प्रिया हेमलतासे कुछ कह न सका। उसने कुछ दिन इसी प्रकार चिन्ताकुल रहते हुए निकाल दिये ॥ ८ ॥ जब विषय प्राप्त होते तो अपनी प्रियाकी बातें याद करके वह अपनी भर्त्सना करते हुए भी वासनाओंके अधीन होनेके कारण उन्हें भोग लेता ॥ ९ ॥ वासनाओंका वेग होनेके कारण वह विषयोंको देखते ही उनकी ओर खिंच तो जाता, किन्तु फिर अपनी प्रियतमाके कहे हुए दोषोंका विचार आनेपर उसका हृदय शोकसे व्याकुल हो जाता और वह बार- बार विषाद करने लगता। इस प्रकार उसका चित्त झोंका लेते हुए झूलेके समान अस्थिर हो गया ॥ १०-११ ॥
भोज्यं वस्त्रं भूषणं वा योषिद्वाहनमेव वा । मित्राणि वापि सुहृदो नैततं सुखयन्ति वै ॥ १२ ॥ नष्टाखिलार्थ इव स शोचत्येव निरन्तरम् । वासनाविवशः सर्वं त्यक्तुं नाशकदञ्जसा ॥ १३ ॥ नोपभोक्तुं तथा शक्तो दोषदृष्टियुतस्ततः । एवं तं शोकवशतो विवर्णवदनेक्षणम् ॥ १४ ॥ हेमलेखा समालक्ष्य कदाचित् सङ्गता रहः । किं नाथ पूर्ववत्त्वं नो लक्ष्यसेऽत्यन्तहर्षितः ॥ १५ ॥ शोचन्तमिव पश्यामि कुत एवं तव स्थितिः । कच्चिच्छरीरमात्मा ते नामयैर्बाध्यते सदा ॥ १६ ॥ भोगेषु रोगभीतिं वै प्रवदन्ति मनीषिणः । त्रिदोषसम्भवे देहे दोषवैषम्यसम्भवाः ॥ १७ ॥
अब उसे भोजन, वस्त्र, आभूषण, स्त्री, सवारी अथवा मित्र या सुहृद्-ये कोई भी सुखी नहीं कर पाते थे ॥ १२ ॥ वह निरन्तर शोकमग्न ही रहता था, मानो उसकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गयी हो । किन्तु वासनाओंके अधीन होनेके कारण वह सहसा सबको छोड़ नहीं सकता था ॥ १३ ॥ साथ ही विषयोंमें दोषदृष्टियुक्त होनेके कारण उन्हें भोगनेका भी साहस नहीं होता था। इस प्रकार जब हेमलताने देखा कि वह शोकाकुल है तथा उसके मुख और नेत्र भी मलिन हो गये हैं तो एक दिन उसने एकान्तमें मिलकर पूछा, "नाथ क्या कारण है आप पहले की तरह खूब प्रसन्न दिखायी नहीं देते ॥ १४-१५ ॥ मैं आपको सदा शोकमग्न-सा ही देखती हूँ। आपकी ऐसी स्थिति क्यों है। क्या आपका शरीररूप आत्मा सर्वदा किन्हीं रोगोंसे पीडित रहता है ? ॥ १६ ॥ विचारवान् पुरुष भोगोंमें रोगकी आशंका बताया करते हैं। शरीर वात, पित्त, कफ इन तीन दोषोंसे बना है, इसलिये इसमें इन दोषों- की विषमता होनी सम्भव ही है ॥ १७ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । ५७ आमयाः प्रायशः सर्वदेहान् व्याप्यैव संस्थिताः । सर्वथा ह्यप्रतीकार्यं वैषम्यं दोषजं ननु ॥ १८ ॥ अशनाद्वसनाद्वाचो दर्शनात् स्पर्शनादपि । कालाद्देशात् कर्मतश्च दोषा वैषम्यमाप्नुयुः ॥ १९ ॥ अतस्तस्योद्भवो लोके सर्वथाऽलक्ष्यतां गतः । इत्यतः सति वैषम्ये चिकित्सा सम्प्रकीर्तिता ॥ २० ॥ नोक्ता चिकित्सानुत्पत्तौ वैषम्ये केनचित् क्वचित् । तद्वद प्रिय कस्माद्वि शोकस्य तव सम्भवः ॥ २१ ॥ इति श्रुत्वा हेमलेखां ग्राह राजसुतस्ततः । प्रिये शृणु प्रवक्ष्यामि यन्मे शोकस्य कारणम् ॥ २२ ॥ त्वदुक्त्या यत् पुरा मेऽभूत् सुखदन्तद्गतं ननु । न पश्याम्यधुना किञ्चिदपि मे सुखवर्द्धनम् ॥ २३ ॥ इसीसे रोग प्रायः सभी शरीरोंमें व्यापे हुए हैं। इस दोषजनित विषमताको दूर रखना निश्चय ही बहुत कठिन है ॥ १८ ॥ ये दोष भोजनसे, वस्त्रसे, वाणीसे, किसी वस्तुविशेषको देखने या छूनेसे तथा देश-काल और क्रिया-विशेषसे और भी विषम हो जाते हैं ॥ १९ ॥ इसलिये इनकी उत्पत्तिका निमित्त सामान्य पुरुषोंके लिये जानना बहुत कठिन होता है। इसीसे जब कोई विषमता होती है तो शास्त्रमें उसकी चिकित्सा कही गयी है ॥ २० ॥ यदि विषमता न होती तो कोई कभी उसकी चिकित्साका भी वर्णन न करता। अतः प्रियतम ! बतलाइये, आपको किस कारणसे शोक उत्पन्न हुआ है" ॥ २१ ॥ यह सुनकर राजकुमारने हेमलेखासे कहा, "प्रिये ! सुनो, मेरे शोकका जो कारण है वह मैं तुम्हें बताता हूँ ॥ २२ ॥ पहले मुझे जो कुछ सुखदायक जान पड़ता था वह तुम्हारी बातें सुनकर सब नष्टप्राय हो गया है। अब मुझे ऐसी कोई चीज दिखायी नहीं देती जो मेरे सुखको बढ़ानेवाली हो ॥ २३ ॥
५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे राज्ञा वितीर्णो विषयः सुखदोऽपि समन्ततः । वध्यं न सुखयेद्यद्वत्तथा तस्मान्न मे सुखम् ॥ २४ ॥ विषयान् सेवमानोऽहं सदा विष्टिगृहीतवत् । तत् पृच्छामि प्रिये ब्रूहि किं कृत्वा सुखमेम्यहम् ॥ २५ ॥ एवं तेन समापृष्टा हेमलेखा तदाऽब्रवीत् । नूनमेष सुनिर्वेदमागतो मद्वचःश्रुतेः ॥ २६ ॥ अस्ति बीजं श्रेयसोऽस्मिन् यत एवंविधो ह्ययम् । येषु श्रेयो ह्यसम्भाव्यं त एवं वाक्यगुम्फनैः ॥ २७ ॥ न ह्यण्वपि विशेषेण विशिष्यन्ते कदाचन । चिरं संराधिता हृत्स्था प्रसन्ना स्वात्मदेवता ॥ २८ ॥ त्रिपुरा येन तेष्वेव भवेदेवंविधा स्थितिः । इत्यालोच्यातिविदुषी बुबोधयिषती प्रियम् ॥ २९ ॥ महाराजने मुझे जो विषय दिये हैं वे सब प्रकार सुखदायक हैं, तथापि वध्य पुरुषको जैसे विषयोंसे सुख नहीं मिल सकता उसी प्रकार उनसे मुझे सुख नहीं मिलता ॥ २४ ॥ मैं जो विषयोंका सेवन करता हूँ वह सर्वदा बेगारमें पकड़े हुए पुरुषके समान [वासनाओंकी अधीनताके कारण] ही होता है। अतः प्रिये ! मैं तुमसे पूछता हूँ, अब क्या करनेसे मैं सुख प्राप्त कर सकूँगा" ? ॥ २५ ॥ हेमचूडके इस प्रकार पूछनेपर हेमलेखाने [मन ही मनमें] कहा, 'मेरा भाषण सुनकर सचमुच इन्हें खूब वैराग्य हो गया है ॥२६॥ इनमें निश्चय ही निःश्रेयसप्राप्तिका बीज है, तभी तो इनकी ऐसी अवस्था है। जिनके मुक्त होनेकी सम्भावना नहीं होती उनमें इस प्रकारके वाक्यविन्याससे कभी अणुमात्र भी कोई अन्तर नहीं पड़ता ॥ २७-२८ पू० ॥ चिरकालतक आराधना किये जानेपर जिनके हृदयमें विराजमान आत्मस्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा प्रसन्न होती है उन्हींमें ऐसी स्थिति पायी जाती है' ॥ २८ उ०-२९ पू० ॥ तब उस महापण्डिताने इस प्रकार विचार कर अपने पाण्डित्यको
पञ्चमोऽध्यायः । ५६ गोपयन्ती स्ववैदुष्यं प्राहान्यव्यपदेशतः । शृणु राजकुमारेदं यन्मे वृत्तं पुरातनम् ॥ ३० ॥ पुरा मे जननी काञ्चित् क्रीडनाय सखीं ददौ । सा स्वभावसती काञ्चिदसतीमनुसङ्गता ॥ ३१ ॥ सा विचित्रविधाश्चर्यसृष्टिसामर्थ्यसंयुता । अलक्षिता मे जनन्या सख्या मे सङ्गताभवत् ॥ ३२ ॥ असच्चरित्रियात्यन्तं सङ्गता मम सा सखी । प्राणेभ्योऽपि प्रियतमा सदा तद्वशगा ह्यहम् ॥ ३३ ॥ न तां विहाय मे संस्था क्षणार्द्धं वा क्वचिद्भवेत् । सा निर्मलस्वभावेन मां वशीकृत्य संस्थिता ॥ ३४ ॥ छिपाते हुए, अपने प्रियतमको बोध करानेकी इच्छासे किसी अन्यकी ओट लेकर कहा- ॥ २९ उ०-३० पू० ॥ राजकुमार ! सुनो, यह बात¹ पहले मेरे साथ बीत चुकी है। पूर्वकालमें मेरी माताने² खेलनेके लिये मुझे³ एक सखी⁴ दी थी। वह स्वभावसे तो सती थी, किन्तु किसी कुलटाकी⁵ संगतिमें पड़ गयी ॥ ३० उ०-३१ ॥ उस कुलटामें अनेक प्रकारकी आश्चर्यमयी सृष्टि रचनेकी सामर्थ्य थी। वह मेरी माताको पता लगाये बिना ही मेरी सखीसे मिल गयी⁶ ॥ मेरी सखीका उस दुराचारिणीसे बहुत अधिक सम्पर्क बढ़ गया। और मुझे वह प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। मैं सदा उसके अधीन ही रहती थी ॥ ३३ ॥ उसे छोड़कर तो आधे क्षणके लिये भी मैं कहीं नहीं रह सकती थी। अपने पवित्र (सत्त्वगुणप्रधान) स्वभावके कारण उसने मुझे १. यहाँ जो बात कही जा रही है उसका कुछ गूढ आशय है। यहाँ जिन व्यक्तियों के द्वारा जिन तत्त्वोंका उल्लेख किया गया है उनका विवरण नीचे दिया जाता है—। २. शुद्धचिति । ३. जीवात्मा । ४. बुद्धि । ५. अविद्या । ६. क्योंकि अविद्या कब जीवकी बुद्धिपर अधिकार करती है, इसका पता शुद्धचितिको भी नहीं लगता। अथवा यों समझना चाहिए कि शुद्धचिति वास्तव- में अविद्या या बुद्धिको विषय ही नहीं करती, क्योंकि उसकी दृष्टिमें तो बुद्धि आदि प्रपञ्चकी सत्ता ही नहीं है, यह केवल आभासमात्र है ।
६० त्रि पुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निरन्तरं तद्गतात्मस्वभावाऽभवमञ्जसा । सा तया दुष्टया युक्ता नट्या चित्रस्वभावया ॥ ३५ ॥ परोक्षवृत्तिमानीता स्वपुत्रेणाभियोजिता । तस्याः पुत्रोऽतिमूढात्मा मदिराघूर्णितेक्षणः ॥ ३६ ॥ बुभुजे तां समाक्रम्य सर्वदा मत्समक्षतः । सा तेनाक्रान्तसर्वाङ्गी भुज्यमानानुवासरम् ॥ ३७ ॥ न मां जहौ कदाचिच्च तत्स्पृष्टा तेन चाप्यहम् । ततः पुत्रः समुत्पन्नो मूढस्य सदृशाकृतिः ॥ ३८ ॥ तरुणः सोऽभवत्तूर्णमतिचञ्चलसंस्थितिः । अपने[अधीन कर लिया था। निरन्तर उसीमें चित्त लगा रहनेके कारण मैं भी उसीके-से स्वभाववाली हो गयी ॥ ३४-३५ पू० ॥ उस विचित्र स्वभाववाली नटीने अपने साथ मिली हुई मेरी सखीको [ स्वर्गादि ] परोक्ष पदार्थोंका झूठा लोभ देकर अपने पुत्रके¹ अधीन कर दिया ॥ ३५ उ०-३६ पू० ॥ उसका पुत्र बड़ा ही मूढ़चित्त था, मदिरासे उसकी आँखें चढ़ी रहती थीं। वह मेरे सामने ही बलात्कारसे उसे निरन्तर भोगता था ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ उसके द्वारा रात-दिन अंग-प्रत्यंगोंके आक्रान्त रहने और भोगे जानेपर भी वह कभी मुझे नहीं छोड़ती थी ।² इसलिये एक दिन तो मेरा भी उससे स्पर्श हो गया ।³ तदनन्तर उन दोनोंके एक पुत्र⁴ उत्पन्न हुआ। वह अपने पिता मूढ़के समान ही आकृतिवाला था ॥ ३७ उ०-३८ ॥ वह तुरन्त ही तरुण ( कार्यक्षम ) हो गया । उसका स्वभाव बड़ा १. मोह । २. क्योंकि मोहाक्रान्त रहनेपर भी बुद्धिके सब व्यापार और भोग चित्प्रकाशसे ही प्रकाशित रहते हैं । ३. बुद्धिसे तादात्म्य रहनेके कारण जीवात्माने भी अपनेको मोहग्रस्त मान लिया । ४. मन ।
पञ्चमोऽध्यायः । ६१ पितुर्मौढ्येन संयुक्तः पितामह्या गुणेन च ॥ ३९ ॥ अनेकचित्रनिर्माणसामर्थ्येन समावृतः । पितामह्या शून्यनाम्न्या पित्रा मूढाभिधेन च ॥ ४० ॥ अस्थिराह्वः शिक्षितोऽभूत् स्वयं चातिविशारदः । गतिमप्रतिबद्धां वै शीघ्राच्छीघ्रां समासदत् ॥ ४१ ॥ एवं मम सखी स्वच्छस्वभावा जन्मतः सती । असतीसङ्गतोऽत्यन्तं मालिन्यं समुपागता ॥ ४२ ॥ सख्या प्रियेण पुत्रेणासत्स्वभावयुतेन सा । चिरसङ्गात्तेषु दृढानुरागेण समायुता ॥ ४३ ॥ जहौ मय्यनुरागन्तु सर्वथा क्रमशः सखी । अहं स्वभावसरला हातुं तत्सङ्गमञ्जसा ॥ ४४ ॥ चंचल था । तथा वह अपने पिताकी मूढतासे और दादीके गुणसे भी सम्पन्न था¹ ॥ ३६ ॥ उसमें अनेक प्रकारके चित्र बनानेका सामर्थ्य भी आ गया । फिर शून्य² नामवाली दादी और मूढ नामवाले पिताने अपने उन अस्थिर नामक पुत्रको, जो स्वयं भी बहुत कुशल था, पढ़ा-लिखाकर पक्का कर दिया । इससे उसे शीघ्रातिशीघ्र ऐसी गति प्राप्त हो गयी जो किसीके द्वारा भी रोकी नहीं जा सकती थी ॥ ४०-४१ ॥ इस प्रकार मेरी सखी, जो बड़े निर्मल स्वभाववाली और जन्मसे सती ही थी, उस असतीका संग पाकर अत्यन्त मलिनताको प्राप्त हो गयी³ ॥ ४२ ॥ अपने असत्स्वभाव प्रेमी और पुत्रका चिरकालतक संग रहनेसे उसका उन्हींमें दृढ अनुराग हो गया ॥ ४३ ॥ अतः क्रमशः मेरी सखीने मुझसे प्रेम करना छोड़ दिया । किन्तु मैं सरल स्वभावकी थी, इसलिये सहसा अपनी सखीका संग छोड़ने में १. मनमें अपने पिता मोहका गुण जड़ता और अपनी दादी अविद्याका गुण विचित्र सृष्टि-रचना रहते ही हैं । २. वास्तव मेंअविद्याकी कोई सत्ता नहीं है, इसलिये उसे शून्य कहा गया है । ३. शुद्ध सत्त्वमयी होनेपर भी अविद्याके अधीन होनेपर रजोगुण-तमोगुण- विशिष्ट हो गयी ।
६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनीशा तत्परैवासं सर्वथा तामनुव्रता । अथ तस्याः प्रियो मूढो भुञ्जानस्तां तु सर्वदा ॥ ४५ ॥ प्रसह्य मां समाक्रान्तुमुद्युक्तः सर्वथाऽभवत् । नाहं स्वभावसंशुद्धा वस्तुतस्तद्वशं गता ॥ ४६ ॥ तथापि लोके मेऽत्यन्तं परीवादो महानभूत् । मूढेन सर्वथेयं च भुज्यते इति सर्वतः ॥ ४७ ॥ अस्थिराख्यं स्वपुत्रं सा मयि न्यस्य सखी मम । प्रियेण संपरिष्वक्ता सर्वथा तत्पराऽभवत् ॥ ४८ ॥ अथास्थिरो मया सम्यग् लालितः पोषितस्ततः । प्रौढस्त्रियं पितामह्या अनुमत्योपसङ्गतः ॥ ४९ ॥ सा प्रिया तस्य चपलाभिधाना हि प्रतिक्षणम् । प्रियस्य सम्मतं रूपं भिन्नं भिन्नं मनोहरम् ॥ ५० ॥ समर्थ न हो सकी। सर्वदा उसीके साथ रहती और उसका अनुसरण करती¹ ॥ ४४-४५ पू० ॥ अब तो उसका प्रेमी मूढ सर्वदा उसका भोग करते हुए सब प्रकार बलात्कारसे मुझपर भी आक्रमण करने को उद्यत रहने लगा। किन्तु स्वभावसे शुद्ध होने के कारण वस्तुतः मैं उसके अधीन नहीं हो सकी ॥ ४५ उ०-४६ ॥ तथापि लोकमें सब ओर मेरे विषयमें यह महती अपकीर्ति तो फैल ही गयी कि मूढ इसका यथेच्छ उपभोग करता है ॥ ४७ ॥ मेरी सखीने अपने अस्थिर नामक पुत्रको तो मेरे पास छोड़ दिया और स्वयं अपने प्रेमीसे आलिंगित रहकर सर्वथा उसीकी हो गयी ॥४८॥ अब अस्थिर सर्वथा मेरे द्वारा लालित-पोषित होने लगा। उसने अपनी दादीकी अनुमतिसे एक प्रौढा स्त्रीसे² सम्बन्ध जोड़ लिया ॥४६॥ उसकी वह चपला नामकी प्रेमिका अपने प्रियतमकी इच्छानुसार क्षण-क्षणमें तरह-तरहके मनोहर और आश्चर्यजनक रूप धारण कर १. अर्थात् बुद्धिसे जीवात्माका तादात्म्य हो गया और वह बुद्धिके व्यापारों- को अपने ही व्यापार मानने लगा। २. कल्पना।
पञ्चमोऽध्यायः । ६३ गृह्णात्याश्चर्यजननं प्रियमेवं स्वके वशे। चक्रे सात्यन्तनिपुणा स्वनैपुण्यवशात् खलु ॥ ५१॥ अस्थिरोऽपि क्षणेनैव त्वसंख्यशतयोजनम् । प्रयात्यायाति च सदा न श्रान्तिमुपगच्छति ॥ ५२ ॥ समीहते यत्र गन्तुमस्थिरश्च यदा यदा । तस्येष्टं स्वस्वरूपन्तु कृत्वा सा चपलापि हि ॥ ५३ ॥ तत्र तत्र स्थिता भूत्वा रमयत्येव स्वं प्रियम् । एवं सा चपला सम्यगस्थिरेण युता सती ॥ ५४ ॥ सुषुवे पञ्चतनयान् मातापितृपरायणान् । ते समर्थाः पञ्चविधा मयि सख्या निवेशिताः ॥ ५५ ॥ अहं सख्यनुरक्ता तानकुर्वं बलवत्तरान् । अथ ते पञ्चतनयाश्चपलायाः पृथक् पृथक् ॥ ५६ ॥ लेती थी। वह बड़ी ही चतुर थी। उसने अपनी चतुरतासे अपने प्रेमीको अपने अधीन कर लिया ॥ ५०-५१ ॥ अस्थिर भी एक क्षणमें ही असंख्य शत (करोड़ों) योजन आ-जा सकता था। इससे थकता तो वह कभी था ही नहीं ॥ ५२ ॥ अस्थिर जब-जब भी जहाँ कहीं जानेका विचार करता, चपला भी वहीं-वहीं पहुँचकर उसकी रुचिके अनुसार अपना रूप बनाकर अपने प्रियतमका मनोरञ्जन करती ॥ ५३-५४ पू० ॥ इस प्रकार अस्थिरके सम्पर्कमें रहते हुए चपलाने पाँच पुत्र¹उत्पन्न किये। वे अपने माता-पिताके बड़े अनुगत थे।² वे बड़े समर्थ थे और पाँचों पाँच प्रकारके थे। मेरी सखीने उन्हें मुझे ही सौंप दिया³ ॥ ५४ उ०-५५ ॥ सखीके अनुरागवश मैंने उन्हें और भी बलवान् बना दिया। फिर चपलाके उन पाँच पुत्रोंने अपने लिये अलग-अलग बड़े विचित्र, १. पाँच कर्मेन्द्रियाँ। २. क्योंकि इन्द्रियवर्ग मनकी कल्पना-शक्तिको बढ़ानेमें सहायक होते हैं। ३. अर्थात् उनका भी चेतन जीवात्मासे तादात्म्य हो गया।