त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः । ४५ वासन्तिकामिव लतां वृतां कुसुमकोरकैः । रोहिणीं राहुणोपेतामिवापश्यन्नृपात्मजः ॥ ५१ ॥ एवंविधां समालोक्य निद्रयापगतस्मृतिम् । मोमुह्यमानश्चात्यन्तं क्षणं पश्चाद्धृतिं भजन् ॥ ५२ ॥ यत् प्राह राजतनयस्तन्मत्तः श्रूयतां ननु । धिङ्मामणार्यमत्यन्तं मूढं मदविमोहितम् ॥ ५३ ॥ धिग्ये स्त्रीष्वभिसंग्रीता धिक् तांश्च पुरुषाधमान् । न कामिन्यः कस्यचित् स्युर्वृक्षस्येव च शारिकाः ॥ ५४ ॥ किमहं मां प्रवक्ष्यामि मुग्धं महिषपोतवत् । जानन्तमेनां प्राणेभ्यः प्रेष्ठां सुचिरकालतः ॥ ५५ ॥ न स्त्रियः कस्यचिद्वा स्युर्वेश्या इव विटस्य हि । यः स्त्रीषु विश्वब्धमनाः स एव वनगर्दभः ॥ ५६ ॥ मुखकमलको उसके मुँहसे सटा रखा है, चरणोंसे उसकी दोनों टाँगोंको कसा हुआ है तथा उसके पीन पयोधर उसके हाथों से कसे हुए हैं। [ उस समय वह ऐसी जान पड़ती थी ] मानों कुसुम- कलिकाओंसे घिरी हुई वासन्तिका लता हो, अथवा राहुसे मिली हुई रोहिणी हो ॥ ४८-५१ ॥ निद्रासे अचेत अपनी पत्नीको ऐसी स्थितिमें देखकर राजकुमार कुछ देरके लिये अपनेको बिलकुल भूल गया, फिर धैर्य धारणकर उसने जो कुछ कहा वह मुझसे सुनिये—॥ ५२-५३ पू० ॥ मदिराके नशेमें चूर मुझ अनार्य महामूढको धिक्कार है। इन स्त्रियोंमें जिनकी अत्यन्त आसक्ति है उन नीच मनुष्योंको भी धिक्कार है। [ जहाँ-तहाँ चारा चुगनेवाली ] सारिकाएँ (मैनाएँ) जैसे किसी एक वृक्षकी नहीं हो सकतीं उसी प्रकार ये नारियाँ किसीकी भी नहीं होतीं ॥ ५३ उ०-५४ ॥ मैं अपनेको ही क्या कहूँ? मैं तो इसमें भैंसके बछेके समान मोहग्रस्त रहा, चिरकालसे इसे अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय समझता रहा ॥ ५५ ॥ वेश्या जैसे अपने प्रेमीकी नहीं होती इसी प्रकार स्त्रियाँ किसीकी भी नहीं होतीं। जिसका स्त्रियोंमें विश्वास है वह तो जंगली गधा ही है॥५६॥