त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे या स्थितिः शारदाभ्रस्य क्षणिका ह्यनवस्थिता । ततोऽपि पेलवा स्त्रीणां स्थितिरत्यन्तचञ्चला ॥ ५७ ॥ नाहमद्यावधि ह्येवं स्त्रीस्वभावमहोऽविदम् । यन्मां सर्वात्मनासक्तं त्यक्त्वा भृत्यमनुव्रता ॥ ५८ ॥ अन्यासक्ता गूढभावा मयि छद्मानुरागिणी । प्रदर्शयन्ती भक्तिं स्वां नटीव विटमण्डले ॥ ५९ ॥ नाविदं लेशतोऽप्येनां मदिरामत्तमानसः । छायेव मां सङ्गतेति मत्वा विश्वब्धमानसः ॥ ६० ॥ अप्रेक्षणीयां चेटीं तां वञ्चितश्चिरसङ्गतः । नूनं मत्तो मूढतमः को भवेज्जगतीतले ॥ ६१ ॥ य एवं विस्रम्भपूर्वमनया चिरवञ्चितः । अहोऽयं भृत्यहतकः सर्वाङ्गविकृताकृतिः ॥ ६२ ॥ शरत्कालीन मेघकी स्थिति जो क्षणिक और अस्थायी होती है इन स्त्रियोंकी स्थिति तो उससे भी अधिक अस्थायी और चंचल समझनी चाहिये ॥ ५७ ॥ अहो ! आजतक भी मैंने इन स्त्रियोंके स्वभावको नहीं समझा। मैं सब प्रकार इसमें आसक्त था, फिर भी इसने मुझे छोड़कर इस सेवकका पल्ला पकड़ा ॥ ५८ ॥ यह दूसरेमें आसक्त थी, परन्तु इस भावको इसने खूब छिपाया। नटी जैसे नटोंके बीच अपना अत्यन्त भक्तिभाव प्रदर्शित करती है उसी प्रकार यह भी कपटपूर्वक मुझसे प्रेम दिखाती रही ॥ ५९ ॥ मेरा मन मदिरापानसे ऐसा उन्मत्तहो गया कि मैं इसे लेशमात्र भी न पहचान सका। मेरे मनमें सदा यही विश्वास रहा कि यह तो छायाके समान मेरी नित्यसंगिनी है ॥ ६० ॥ इनसे ठगा जाकर मैं चिरकालसे उस दासीके साथ ही समागम करता रहा, जिसकी ओर देखनेसे भी दुःख होता है। सचमुच मुझसे बढ़कर मूढ इस पृथ्वीतलमें और कौन हो सकता है, जिसे यह विश्वास दिलाकर चिरकालसे इस प्रकार ठगती रही ॥ ६१-६२ पू० ॥ वाहरे ! यह निन्दनीय सेवक ! इसके तो सभी अंग भोंड़ी आकृति-