त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः । ४७ किमस्मिन्ननया दृष्टं सौन्दर्यं सर्वतोऽधिकम् । यतो मां निजसौन्दर्याहृतलोकावलोकनम् ॥ ६३ ॥ अनुरक्तं सर्वथैव त्यक्त्वैनमुपसङ्गता । एवं प्रलप्य बहुधा निर्विण्णोऽतितरां तदा ॥ ६४ ॥ राजपुत्रो वनं प्रागात् सर्वसङ्गविवर्जितः । तस्माद्राजकुमारैतत् सौन्दर्यं मनसोत्थितम् ॥ ६५ ॥ यथा त्वं मयि चात्यन्तसौभगेक्षणपूर्वकम् । रतिं विन्दस्यतितरां तथा वा तद्विशेषतः ॥ ६६ ॥ विन्दन्ति रतिमत्यन्तं योषित्सु विकृतास्वपि । अत्र ते प्रत्ययं वक्ष्ये शृणु प्रिय समाहितः ॥ ६७ ॥ विलोक्यते या हि योषित् सा बहिःसुव्यवस्थिता । या च तत्प्रतिबिम्बात्मरूपिणी चित्तसंश्रया ॥ ६८ ॥ सङ्कल्परूपिणी तस्याः सौष्ठवं मनसोलिखन् । पौनःपुन्येन तदनु वाञ्छामुपसमागतः ॥ ६९ ॥ वाले हैं। इसमें इसे ऐसा सबसे बड़ा क्या सौन्दर्य 'दिखायी दिया जो मुझे छोड़कर इसका सहवास स्वीकार कर बैठी ! मेरी सुन्दरताने तो सभी लोगोंकी आँखोंको आकर्षित कर रखा है और इसके प्रति मेरा अनुराग भी पूरा था ॥ ६२ उ०-६४ पू० ॥ इस प्रकार बहुत कुछ कहकर वह राजपुत्र अत्यन्त विरक्त हो गया और सबकी आसक्ति छोड़कर वनको चला गया ॥ ६४ उ० -६५ पू० ॥ अतः राजकुमार ! यह सुन्दरता तो अपने मनकी ही उपज है। जिस प्रकार अत्यन्त सुन्दरता देखकर आपको मुझसे रतिजनित सुख मिलता है उससे भी अधिक सुख कुरूपा नारियोंसे भी प्राप्त हो जाता है। प्रियवर ! इस विषयको मैं निश्चयात्मक रूपसे समझाती हूँ, आप सावधान होकर सुनें ॥ ६५ उ०-६७ ॥ जो स्त्री दिखायी देती है वह तो बाहर रहती है किन्तु चित्त में संकल्परूपसे रहनेवाली उसकी जो प्रतिबिम्बरूपिणी आकृति है, मनसे उसमें सुन्दरताकी कल्पना हो जाती है। उसकी पुनः पुनः [स्मृति