त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे क्षुब्धेन्द्रियो नरस्तस्यां रतिमाप्नोति सर्वतः । अक्षुब्धे त्विन्द्रिये न स्यात् सुन्दर्यामपि वै रतिः ॥ ७० ॥ तत्र मूलं समुल्लेखः सौष्ठवस्य पुनः पुनः । अतः क्षोभो नैव दृष्टो बालानां योगिनामपि ॥ ७१ ॥ तथा च यो यो यस्यान्तु रतिं विन्दति मानवः । सुन्दर्यां वापि चान्यस्यां तत्र सौष्ठवमुल्लिखेत् ॥ ७२ ॥ दृश्यन्ते योषितोऽन्यन्तबीभत्साकारविग्रहाः । तरुणैः सङ्गतास्ताश्च दृश्यन्तेऽपत्यहेतुतः ॥ ७३ ॥ विरूपतोल्लेखनं वाप्यनुल्लेखस्तु सौष्ठवे । यदि स्यात्तत् कथं नृणां रतिस्तासु हि सम्भवेत् ॥ ७४ ॥ किं वक्तव्यमहो नृणां कामिनां क्षिप्तचेतसाम् । जघन्याङ्गेऽपि सौन्दर्यं भासते सर्वतोऽधिकम् ॥ ७५ ॥ होने से ] मनमें भोगनेकी इच्छा होती है । उसके कारण अन्य इच्छाएँ दब जाती हैं तथा उपस्थेन्द्रियमें क्षोभ होनेसे उसीमें पुरुष रतिसुख अनुभव करने लगता है । यदि इन्द्रियमें क्षोभ न हो तो सुन्दरी स्त्रीमें भी पुरुषको रतिसुख नहीं मिल सकता ॥ ६८-७० ॥ उस क्षोभमें हेतु है मनमें पुनः सुन्दरताका स्फुरण होना । इसीसे बालकों और योगियोंमें क्षोभ होता नहीं देखा जाता ॥ ७१ ॥ इससे निश्चय हुआ कि सुन्दरी अथवा असुन्दरी जिस स्त्रीमें जिस पुरुषको रतिसुख की अनुभूति होती है उसीमें उसे सुन्दरताकी कल्पना हो जाती है ॥ ७२ ॥ ऐसी स्त्रियाँ भी देखी ही जाती हैं जिनके आकार और शरीर अत्यन्त बीभत्स होते हैं । किन्तु उनके सन्तान होतो दिखायी देती है, इससे निश्चय होता है कि उनका भी युवकोंसे समागम हुआ है ॥७३॥ यदि उनमें कुरूपताकी कल्पना रहती अथवा चित्तपर उनका सौन्दर्य अङ्कित ही न होता तो उनमें पुरुषोंको रतिसुख कैसे मिल सकता था ॥ ७४ ॥ इन कामातुर और विक्षिप्तचित्त पुरुषोंके विषयमें क्या कहा जाय, जिन्हें स्त्रीके अत्यन्त घृणित अंगमें भी सबसे अधिक सुन्दरता की प्रतीति होती है ॥ ७५ ॥