भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63

चतुर्थोऽध्यायः । ४६ मलमूत्रपरिक्लिन्नं यदङ्गं तत्र सौभगम् । पश्येच्चेत् कुत्र नो पश्येत् सौन्दर्यं तन्ममेरय ॥ ७६ ॥ तस्मात् सौन्दर्यमेतद्वै राजपुत्र निशामय । अभिमानमृते नैष सुखहेतुर्भवेत् क्वचित् ॥ ७७ ॥ क्षौद्रमाधुर्यवद्देहे सौन्दर्यं सहजं यदि । तद्भालानां कुमाराणां कुतो नो भाति तद्वद ॥ ७८ ॥ देशभेदेषु दृश्यन्ते विविधाकृतयो नराः । एकपादैकनयना लम्बकर्णा हयाननाः ॥ ७९ ॥ कर्णप्रावरणाः फालवक्त्रा निर्गतदंष्ट्रकाः । त्रिनसा दीर्घनासाश्च लोमच्छन्ना विलोमकाः ॥ ८० ॥ पिङ्गकेशाः श्वेतकेशा विकेशाः स्थूलकेशकाः । चित्रवर्णाः काकवर्णाः पिङ्गला लोहिताङ्गकाः ॥ ८१ ॥ मुझे बताइये तो, जो मूर्ख मल-मूत्रसे भरे अंगमें भी सुन्दरता देख लेता है उसे कहाँ सौन्दर्यका भान नहीं हो सकता ॥ ७६ ॥ अतः राजपुत्र ! खूब ध्यान रखें, यह सुन्दरता बिना मानसिक कल्पनाके कहीं भी सुखकी हेतु नहीं हो सकती ॥ ७७ ॥ यदि मधुके माधुर्यकी तरह सुन्दरताको भी शरीरका स्वभाव माना जाय ता बताइये, छोटे बच्चोंको उसकी प्रतीति क्यों नहीं होती ॥ ७८ ॥ देशभेदसे अनेकों आकृतियोंके पुरुष देखे जाते हैं। कोई एक पैरवाले, कोई एक आँखवाले, कोई लंबे कानोंवाले और कोई घोड़ेके-से मुँहवाले होते हैं ॥ ७६ ॥ किन्हींके कान फैले हुए होते हैं, किन्हींका मुँह हलकी तरह होता है, उनकी दाढ़ें बाहर निकली होती हैं। किन्हींके नाक होती ही नहीं और कोई लंबी नाकवाले होते हैं। कोई लोमोंसे ढके होते हैं और किन्हींके लोम बिलकुल नहीं होते ॥ ८० ॥ किन्हींके केश पीले होते हैं, कोई श्वेत केशवाले होते हैं तथा कोई केशहीन और कोई सघन केशोंवाले देखे जाते हैं। कोई (श्वेत कुष्ठके कारण) चितकबरे, कोई कौएके समान काले, कोई पीले और कोई लाल शरीरवाले होते हैं ॥ ८१ ॥ ४ त्रि०