त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं बहुविधा मर्त्याः सजातिवनितासु ते । रतिं विन्दन्ति त्वमिव राजपुत्र निशामय ॥ ८२ ॥ सुखसाधनभूतेषु मुख्यं यत् स्त्रीवपुःस्थितम् । सर्वप्रियं यत्र सर्वे मुह्यन्ति विबुधा अपि ॥ ८३ ॥ पुंसां वपुस्तथा स्त्रीणां प्रियमत्यन्तसुन्दरम् । विमृश्य सुबुद्ध्या त्वं राजपुत्र यथास्थितम् ॥ ८४ ॥ मांसलिप्तमसृक्क्लिन्नं शिराबद्धं त्वगाततम् । अस्थिपञ्जरकं लोमच्छन्नं पित्तकफाहितम् ॥ ८५ ॥ मलमूत्रकुमलं तच्छुक्रशोणितसम्भवम् । मूत्रद्वारसमुद्भूतमहो प्रियमिहेष्यते ॥ ८६ ॥ य एवमतिबीभत्से वितन्वन्ति रतिं नराः । विट्कृमिभ्यः कुतस्तेषां भवेदन्तरमीरय ॥ ८७ ॥ ऐसे ही अनेकों प्रकारके पुरुष हैं। राजपुत्र ! निश्चय मानिये, वे सभी अपनी सजातीय स्त्रियोंमें आपकी तरह रतिसुख अनुभव करते हैं ॥ ८२ ॥ सुखके साधनोंमें जो स्त्रीशरीर सबसे प्रधान समझा जाता है, जो सभीको प्रिय है और जिसमें सम्पूर्ण देवताओंको भी मोह हो जाता है, इसी प्रकार स्त्रियोंके लिये जो पुरुषोंका शरीर अत्यन्त प्रिय और सुन्दर भासता है, हे राजपुत्र ! आप अपनी सुबुद्धिसे तनिक विचार तो करें कि वह वास्तवमें कैसा है ॥ ८३-८४ ॥ वह मांससे लिपटा है, लोहूसे लथपथ है, नस-नाड़ियोंसे बँधा हुआ है, खालसे ढका हुआ है, हड्डियोंका ढाँचा है, बालोंसे आच्छन्न है और पित्त एवं कफसे भरा हुआ है ॥ ८५ ॥ [यही नहीं,] वह मल-मूत्रका भण्डार है तथा वीर्य एवं रजसे उत्पन्न हुआ है। हाय ! मूत्रद्वारसे निकले हुए इस घृणित शरीरको ही लोग प्रिय मान बैठते हैं ! ॥ ८६ ॥ बताइये, जो लोग ऐसे बीभत्स शरीरमें राग करते हैं, उनका विष्ठाके कीड़ोंसे क्या अन्तर हो सकता है ॥ ८७ ॥