भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः । ५१ राजपुत्र तनुरियं प्रिया हि नितरां तव । विभावय विवेकेन धातूनाञ्च पृथक्स्थितिम् ॥ ८८ ॥ एवमन्यत्रोपयोज्ये मधुराम्लादिषड्रसे । परिणामस्वभावन्तु सूक्ष्मदृष्ट्या विभावय ॥ ८९ ॥ भक्षितस्यापि सर्वस्य विड्भावः परिणामके । सर्वथा नात्र सन्देहः सर्वैरेव विभावितः ॥ ९० ॥ वदैवं संस्थिते लोके किं प्रियं स्यात् किमप्रियम् । इत्युक्तो हेमचूड़ोऽथ वैरस्यं विषये विदन् ॥ ९१ ॥ श्रुत्वाऽपूर्वं वाक्यजालं विस्मितोऽभवदञ्जसा । विचार्य भूयस्तत् सर्वं यदुक्तं हेमलेखया ॥ ९२ ॥ भोगेषु जातनिर्वेदः परं वैराग्यमाप्तवान् । अथ क्रमेण पृष्ट्वा तां प्रियां ज्ञात्वा च तत्पदम् ॥ ९३ ॥ राजकुमार ! आपको जो यह शरीर अत्यन्त प्रिय जान पड़ता है, तनिक विवेकद्वारा इसके रक्त-मज्जा आदि धातुओंकी पृथक्-पृथक् स्थितिका तो विचार कीजिये ॥ ८८ ॥ यही बात अन्य भोज्य पदार्थोंके विषयमें भी है। उन मीठे-खट्टे आदि षड्रस पदार्थोंके परिणाम और स्वभावका भी आप सूक्ष्म बुद्धि- से विचार करें ॥ ८९ ॥ जो कुछ खाया जाता है उस सबका परिणाममें विष्ठा ही बनता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है, सभी जानते हैं। संसारकी ऐसी स्थिति देखते हुए बताइये, इसमें क्या प्रिय है और क्या अप्रिय है ?'' ॥ ९०-९१ पू० ॥ हेमलेखाका यह भाषण सुनकर हेमचूडको विषयोंमें वैराग्य हो गया। उसका यह अपूर्व वाक्य-विन्यास सुनकर उसे स्वभावसे ही बड़ा विस्मय हुआ ॥ ९१ उ०-९२ पू० ॥ फिर हेमलेखान जो कुछ कहा था उसपर स्वयं विचार किया। इससे भोगोंमें अरुचि हो जानेके कारण उसे परम वैराग्य हो गया ॥ ९२ उ०-९३ पू० ॥ तब क्रमशः उसने उस प्रियतमासे अनेकों प्रश्न करके उस परम