भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे केवलां चितिमात्मस्थां त्रिपुरामात्मरूपिणीम् । बुद्ध्वाऽभवद्विमुक्तात्मा स्वात्मभूताखिलेक्षणः ॥ ९४ ॥ जीवन्मुक्तः समभवत् ततस्तस्यानुजोऽपि हि । मणिचूडोऽविदद्भ्रातुर्मुक्ताचूडोऽपि पुत्रतः ॥ ९५ ॥ मुक्ताचूडप्रिया चापि स्नुषया ज्ञानमासदत् । मन्त्रिणश्चापि पौराश्च बभूवुर्ज्ञानशालिनः ॥ ९६ ॥ न तत्र नगरे कश्चिदविद्वान् समजायत । आसीद् ब्रह्मपुरप्रख्यं शान्तसंसृतिवासनम् ॥ ९७ ॥ विशालनगरं तच्च जगत्यत्युत्तमं बभौ । यत्र कीराः शारिकाश्च पञ्जरस्थाः पठन्ति वै ॥ ९८ ॥ चितिरूपं स्वमात्मानं भजध्वं चेत्यवर्जितम् । नास्ति चेत्यं चितेरन्यद्दर्पणे प्रतिबिम्बवत् ॥ ९९ ॥ पदको जान लिया, जो विशुद्ध चिन्मात्रा आत्मस्वरूपिणी श्रीत्रिपुरा ही हैं और सबके अन्तःकरणमें स्थित है। उसे जानकर वह मुक्तस्वरूप (जीवन्मुक्त) हो गया और सबको अपने आत्मस्वरूपसे ही देखने लगा ॥ ६३ उ०-६४ ॥ फिर उसका छोटा भाई मणिचूड़ भी अपने भाईसे ज्ञान प्राप्त करके जीवन्मुक्त हो गया और राजा मुक्ताचूड़ने भी अपने पुत्रसे ही ज्ञान प्राप्त किया ॥ ६५ ॥ मुक्ताचूड़की रानीने अपनी पुत्रवधू (हेमलेखा) से ज्ञान प्राप्त किया। इसी प्रकार सब मन्त्री और पुरवासी भी ज्ञानसम्पन्न हो गये ॥ ६६ ॥ उस नगरमें कोई भी अज्ञानी नहीं रहा। सभीकी सांसारिक वासनाएँ निवृत्त हो गयीं। इस प्रकार वह नगर ब्रह्मपुरीके समान जान पड़ता था ॥ ६७ ॥ वह विशाल नगर संसारमें अत्यन्त उत्कृष्ट हो गया। वहाँ पिंजड़ोंमें बन्द तोते और मैना भी इस प्रकार पढ़ते रहते थे— ॥ ६८ ॥ “चेत्य (दृश्य) पदार्थोंसे रहित जो चिन्मात्र अपना आत्मा है, उसका भजन करो। दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान चेत्य पदार्थ चिन्मात्रसे भिन्न नहीं है ॥ ६६ ॥