त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनीशा तत्परैवासं सर्वथा तामनुव्रता । अथ तस्याः प्रियो मूढो भुञ्जानस्तां तु सर्वदा ॥ ४५ ॥ प्रसह्य मां समाक्रान्तुमुद्युक्तः सर्वथाऽभवत् । नाहं स्वभावसंशुद्धा वस्तुतस्तद्वशं गता ॥ ४६ ॥ तथापि लोके मेऽत्यन्तं परीवादो महानभूत् । मूढेन सर्वथेयं च भुज्यते इति सर्वतः ॥ ४७ ॥ अस्थिराख्यं स्वपुत्रं सा मयि न्यस्य सखी मम । प्रियेण संपरिष्वक्ता सर्वथा तत्पराऽभवत् ॥ ४८ ॥ अथास्थिरो मया सम्यग् लालितः पोषितस्ततः । प्रौढस्त्रियं पितामह्या अनुमत्योपसङ्गतः ॥ ४९ ॥ सा प्रिया तस्य चपलाभिधाना हि प्रतिक्षणम् । प्रियस्य सम्मतं रूपं भिन्नं भिन्नं मनोहरम् ॥ ५० ॥ समर्थ न हो सकी। सर्वदा उसीके साथ रहती और उसका अनुसरण करती¹ ॥ ४४-४५ पू० ॥ अब तो उसका प्रेमी मूढ सर्वदा उसका भोग करते हुए सब प्रकार बलात्कारसे मुझपर भी आक्रमण करने को उद्यत रहने लगा। किन्तु स्वभावसे शुद्ध होने के कारण वस्तुतः मैं उसके अधीन नहीं हो सकी ॥ ४५ उ०-४६ ॥ तथापि लोकमें सब ओर मेरे विषयमें यह महती अपकीर्ति तो फैल ही गयी कि मूढ इसका यथेच्छ उपभोग करता है ॥ ४७ ॥ मेरी सखीने अपने अस्थिर नामक पुत्रको तो मेरे पास छोड़ दिया और स्वयं अपने प्रेमीसे आलिंगित रहकर सर्वथा उसीकी हो गयी ॥४८॥ अब अस्थिर सर्वथा मेरे द्वारा लालित-पोषित होने लगा। उसने अपनी दादीकी अनुमतिसे एक प्रौढा स्त्रीसे² सम्बन्ध जोड़ लिया ॥४६॥ उसकी वह चपला नामकी प्रेमिका अपने प्रियतमकी इच्छानुसार क्षण-क्षणमें तरह-तरहके मनोहर और आश्चर्यजनक रूप धारण कर १. अर्थात् बुद्धिसे जीवात्माका तादात्म्य हो गया और वह बुद्धिके व्यापारों- को अपने ही व्यापार मानने लगा। २. कल्पना।