भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पञ्चमोऽध्यायः । ६१ पितुर्मौढ्येन संयुक्तः पितामह्या गुणेन च ॥ ३९ ॥ अनेकचित्रनिर्माणसामर्थ्येन समावृतः । पितामह्या शून्यनाम्न्या पित्रा मूढाभिधेन च ॥ ४० ॥ अस्थिराह्वः शिक्षितोऽभूत् स्वयं चातिविशारदः । गतिमप्रतिबद्धां वै शीघ्राच्छीघ्रां समासदत् ॥ ४१ ॥ एवं मम सखी स्वच्छस्वभावा जन्मतः सती । असतीसङ्गतोऽत्यन्तं मालिन्यं समुपागता ॥ ४२ ॥ सख्या प्रियेण पुत्रेणासत्स्वभावयुतेन सा । चिरसङ्गात्तेषु दृढानुरागेण समायुता ॥ ४३ ॥ जहौ मय्यनुरागन्तु सर्वथा क्रमशः सखी । अहं स्वभावसरला हातुं तत्सङ्गमञ्जसा ॥ ४४ ॥ चंचल था । तथा वह अपने पिताकी मूढतासे और दादीके गुणसे भी सम्पन्न था¹ ॥ ३६ ॥ उसमें अनेक प्रकारके चित्र बनानेका सामर्थ्य भी आ गया । फिर शून्य² नामवाली दादी और मूढ नामवाले पिताने अपने उन अस्थिर नामक पुत्रको, जो स्वयं भी बहुत कुशल था, पढ़ा-लिखाकर पक्का कर दिया । इससे उसे शीघ्रातिशीघ्र ऐसी गति प्राप्त हो गयी जो किसीके द्वारा भी रोकी नहीं जा सकती थी ॥ ४०-४१ ॥ इस प्रकार मेरी सखी, जो बड़े निर्मल स्वभाववाली और जन्मसे सती ही थी, उस असतीका संग पाकर अत्यन्त मलिनताको प्राप्त हो गयी³ ॥ ४२ ॥ अपने असत्स्वभाव प्रेमी और पुत्रका चिरकालतक संग रहनेसे उसका उन्हींमें दृढ अनुराग हो गया ॥ ४३ ॥ अतः क्रमशः मेरी सखीने मुझसे प्रेम करना छोड़ दिया । किन्तु मैं सरल स्वभावकी थी, इसलिये सहसा अपनी सखीका संग छोड़ने में १. मनमें अपने पिता मोहका गुण जड़ता और अपनी दादी अविद्याका गुण विचित्र सृष्टि-रचना रहते ही हैं । २. वास्तव मेंअविद्याकी कोई सत्ता नहीं है, इसलिये उसे शून्य कहा गया है । ३. शुद्ध सत्त्वमयी होनेपर भी अविद्याके अधीन होनेपर रजोगुण-तमोगुण- विशिष्ट हो गयी ।

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