त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० त्रि पुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निरन्तरं तद्गतात्मस्वभावाऽभवमञ्जसा । सा तया दुष्टया युक्ता नट्या चित्रस्वभावया ॥ ३५ ॥ परोक्षवृत्तिमानीता स्वपुत्रेणाभियोजिता । तस्याः पुत्रोऽतिमूढात्मा मदिराघूर्णितेक्षणः ॥ ३६ ॥ बुभुजे तां समाक्रम्य सर्वदा मत्समक्षतः । सा तेनाक्रान्तसर्वाङ्गी भुज्यमानानुवासरम् ॥ ३७ ॥ न मां जहौ कदाचिच्च तत्स्पृष्टा तेन चाप्यहम् । ततः पुत्रः समुत्पन्नो मूढस्य सदृशाकृतिः ॥ ३८ ॥ तरुणः सोऽभवत्तूर्णमतिचञ्चलसंस्थितिः । अपने[अधीन कर लिया था। निरन्तर उसीमें चित्त लगा रहनेके कारण मैं भी उसीके-से स्वभाववाली हो गयी ॥ ३४-३५ पू० ॥ उस विचित्र स्वभाववाली नटीने अपने साथ मिली हुई मेरी सखीको [ स्वर्गादि ] परोक्ष पदार्थोंका झूठा लोभ देकर अपने पुत्रके¹ अधीन कर दिया ॥ ३५ उ०-३६ पू० ॥ उसका पुत्र बड़ा ही मूढ़चित्त था, मदिरासे उसकी आँखें चढ़ी रहती थीं। वह मेरे सामने ही बलात्कारसे उसे निरन्तर भोगता था ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ उसके द्वारा रात-दिन अंग-प्रत्यंगोंके आक्रान्त रहने और भोगे जानेपर भी वह कभी मुझे नहीं छोड़ती थी ।² इसलिये एक दिन तो मेरा भी उससे स्पर्श हो गया ।³ तदनन्तर उन दोनोंके एक पुत्र⁴ उत्पन्न हुआ। वह अपने पिता मूढ़के समान ही आकृतिवाला था ॥ ३७ उ०-३८ ॥ वह तुरन्त ही तरुण ( कार्यक्षम ) हो गया । उसका स्वभाव बड़ा १. मोह । २. क्योंकि मोहाक्रान्त रहनेपर भी बुद्धिके सब व्यापार और भोग चित्प्रकाशसे ही प्रकाशित रहते हैं । ३. बुद्धिसे तादात्म्य रहनेके कारण जीवात्माने भी अपनेको मोहग्रस्त मान लिया । ४. मन ।