त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः । ५६ गोपयन्ती स्ववैदुष्यं प्राहान्यव्यपदेशतः । शृणु राजकुमारेदं यन्मे वृत्तं पुरातनम् ॥ ३० ॥ पुरा मे जननी काञ्चित् क्रीडनाय सखीं ददौ । सा स्वभावसती काञ्चिदसतीमनुसङ्गता ॥ ३१ ॥ सा विचित्रविधाश्चर्यसृष्टिसामर्थ्यसंयुता । अलक्षिता मे जनन्या सख्या मे सङ्गताभवत् ॥ ३२ ॥ असच्चरित्रियात्यन्तं सङ्गता मम सा सखी । प्राणेभ्योऽपि प्रियतमा सदा तद्वशगा ह्यहम् ॥ ३३ ॥ न तां विहाय मे संस्था क्षणार्द्धं वा क्वचिद्भवेत् । सा निर्मलस्वभावेन मां वशीकृत्य संस्थिता ॥ ३४ ॥ छिपाते हुए, अपने प्रियतमको बोध करानेकी इच्छासे किसी अन्यकी ओट लेकर कहा- ॥ २९ उ०-३० पू० ॥ राजकुमार ! सुनो, यह बात¹ पहले मेरे साथ बीत चुकी है। पूर्वकालमें मेरी माताने² खेलनेके लिये मुझे³ एक सखी⁴ दी थी। वह स्वभावसे तो सती थी, किन्तु किसी कुलटाकी⁵ संगतिमें पड़ गयी ॥ ३० उ०-३१ ॥ उस कुलटामें अनेक प्रकारकी आश्चर्यमयी सृष्टि रचनेकी सामर्थ्य थी। वह मेरी माताको पता लगाये बिना ही मेरी सखीसे मिल गयी⁶ ॥ मेरी सखीका उस दुराचारिणीसे बहुत अधिक सम्पर्क बढ़ गया। और मुझे वह प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। मैं सदा उसके अधीन ही रहती थी ॥ ३३ ॥ उसे छोड़कर तो आधे क्षणके लिये भी मैं कहीं नहीं रह सकती थी। अपने पवित्र (सत्त्वगुणप्रधान) स्वभावके कारण उसने मुझे १. यहाँ जो बात कही जा रही है उसका कुछ गूढ आशय है। यहाँ जिन व्यक्तियों के द्वारा जिन तत्त्वोंका उल्लेख किया गया है उनका विवरण नीचे दिया जाता है—। २. शुद्धचिति । ३. जीवात्मा । ४. बुद्धि । ५. अविद्या । ६. क्योंकि अविद्या कब जीवकी बुद्धिपर अधिकार करती है, इसका पता शुद्धचितिको भी नहीं लगता। अथवा यों समझना चाहिए कि शुद्धचिति वास्तव- में अविद्या या बुद्धिको विषय ही नहीं करती, क्योंकि उसकी दृष्टिमें तो बुद्धि आदि प्रपञ्चकी सत्ता ही नहीं है, यह केवल आभासमात्र है ।