भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे राज्ञा वितीर्णो विषयः सुखदोऽपि समन्ततः । वध्यं न सुखयेद्यद्वत्तथा तस्मान्न मे सुखम् ॥ २४ ॥ विषयान् सेवमानोऽहं सदा विष्टिगृहीतवत् । तत् पृच्छामि प्रिये ब्रूहि किं कृत्वा सुखमेम्यहम् ॥ २५ ॥ एवं तेन समापृष्टा हेमलेखा तदाऽब्रवीत् । नूनमेष सुनिर्वेदमागतो मद्वचःश्रुतेः ॥ २६ ॥ अस्ति बीजं श्रेयसोऽस्मिन् यत एवंविधो ह्ययम् । येषु श्रेयो ह्यसम्भाव्यं त एवं वाक्यगुम्फनैः ॥ २७ ॥ न ह्यण्वपि विशेषेण विशिष्यन्ते कदाचन । चिरं संराधिता हृत्स्था प्रसन्ना स्वात्मदेवता ॥ २८ ॥ त्रिपुरा येन तेष्वेव भवेदेवंविधा स्थितिः । इत्यालोच्यातिविदुषी बुबोधयिषती प्रियम् ॥ २९ ॥ महाराजने मुझे जो विषय दिये हैं वे सब प्रकार सुखदायक हैं, तथापि वध्य पुरुषको जैसे विषयोंसे सुख नहीं मिल सकता उसी प्रकार उनसे मुझे सुख नहीं मिलता ॥ २४ ॥ मैं जो विषयोंका सेवन करता हूँ वह सर्वदा बेगारमें पकड़े हुए पुरुषके समान [वासनाओंकी अधीनताके कारण] ही होता है। अतः प्रिये ! मैं तुमसे पूछता हूँ, अब क्या करनेसे मैं सुख प्राप्त कर सकूँगा" ? ॥ २५ ॥ हेमचूडके इस प्रकार पूछनेपर हेमलेखाने [मन ही मनमें] कहा, 'मेरा भाषण सुनकर सचमुच इन्हें खूब वैराग्य हो गया है ॥२६॥ इनमें निश्चय ही निःश्रेयसप्राप्तिका बीज है, तभी तो इनकी ऐसी अवस्था है। जिनके मुक्त होनेकी सम्भावना नहीं होती उनमें इस प्रकारके वाक्यविन्याससे कभी अणुमात्र भी कोई अन्तर नहीं पड़ता ॥ २७-२८ पू० ॥ चिरकालतक आराधना किये जानेपर जिनके हृदयमें विराजमान आत्मस्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा प्रसन्न होती है उन्हींमें ऐसी स्थिति पायी जाती है' ॥ २८ उ०-२९ पू० ॥ तब उस महापण्डिताने इस प्रकार विचार कर अपने पाण्डित्यको