भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पञ्चमोऽध्यायः । ५७ आमयाः प्रायशः सर्वदेहान् व्याप्यैव संस्थिताः । सर्वथा ह्यप्रतीकार्यं वैषम्यं दोषजं ननु ॥ १८ ॥ अशनाद्वसनाद्वाचो दर्शनात् स्पर्शनादपि । कालाद्देशात् कर्मतश्च दोषा वैषम्यमाप्नुयुः ॥ १९ ॥ अतस्तस्योद्भवो लोके सर्वथाऽलक्ष्यतां गतः । इत्यतः सति वैषम्ये चिकित्सा सम्प्रकीर्तिता ॥ २० ॥ नोक्ता चिकित्सानुत्पत्तौ वैषम्ये केनचित् क्वचित् । तद्वद प्रिय कस्माद्वि शोकस्य तव सम्भवः ॥ २१ ॥ इति श्रुत्वा हेमलेखां ग्राह राजसुतस्ततः । प्रिये शृणु प्रवक्ष्यामि यन्मे शोकस्य कारणम् ॥ २२ ॥ त्वदुक्त्या यत् पुरा मेऽभूत् सुखदन्तद्गतं ननु । न पश्याम्यधुना किञ्चिदपि मे सुखवर्द्धनम् ॥ २३ ॥ इसीसे रोग प्रायः सभी शरीरोंमें व्यापे हुए हैं। इस दोषजनित विषमताको दूर रखना निश्चय ही बहुत कठिन है ॥ १८ ॥ ये दोष भोजनसे, वस्त्रसे, वाणीसे, किसी वस्तुविशेषको देखने या छूनेसे तथा देश-काल और क्रिया-विशेषसे और भी विषम हो जाते हैं ॥ १९ ॥ इसलिये इनकी उत्पत्तिका निमित्त सामान्य पुरुषोंके लिये जानना बहुत कठिन होता है। इसीसे जब कोई विषमता होती है तो शास्त्रमें उसकी चिकित्सा कही गयी है ॥ २० ॥ यदि विषमता न होती तो कोई कभी उसकी चिकित्साका भी वर्णन न करता। अतः प्रियतम ! बतलाइये, आपको किस कारणसे शोक उत्पन्न हुआ है" ॥ २१ ॥ यह सुनकर राजकुमारने हेमलेखासे कहा, "प्रिये ! सुनो, मेरे शोकका जो कारण है वह मैं तुम्हें बताता हूँ ॥ २२ ॥ पहले मुझे जो कुछ सुखदायक जान पड़ता था वह तुम्हारी बातें सुनकर सब नष्टप्राय हो गया है। अब मुझे ऐसी कोई चीज दिखायी नहीं देती जो मेरे सुखको बढ़ानेवाली हो ॥ २३ ॥