त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पञ्चमोऽध्यायः । ५७ आमयाः प्रायशः सर्वदेहान् व्याप्यैव संस्थिताः । सर्वथा ह्यप्रतीकार्यं वैषम्यं दोषजं ननु ॥ १८ ॥ अशनाद्वसनाद्वाचो दर्शनात् स्पर्शनादपि । कालाद्देशात् कर्मतश्च दोषा वैषम्यमाप्नुयुः ॥ १९ ॥ अतस्तस्योद्भवो लोके सर्वथाऽलक्ष्यतां गतः । इत्यतः सति वैषम्ये चिकित्सा सम्प्रकीर्तिता ॥ २० ॥ नोक्ता चिकित्सानुत्पत्तौ वैषम्ये केनचित् क्वचित् । तद्वद प्रिय कस्माद्वि शोकस्य तव सम्भवः ॥ २१ ॥ इति श्रुत्वा हेमलेखां ग्राह राजसुतस्ततः । प्रिये शृणु प्रवक्ष्यामि यन्मे शोकस्य कारणम् ॥ २२ ॥ त्वदुक्त्या यत् पुरा मेऽभूत् सुखदन्तद्गतं ननु । न पश्याम्यधुना किञ्चिदपि मे सुखवर्द्धनम् ॥ २३ ॥ इसीसे रोग प्रायः सभी शरीरोंमें व्यापे हुए हैं। इस दोषजनित विषमताको दूर रखना निश्चय ही बहुत कठिन है ॥ १८ ॥ ये दोष भोजनसे, वस्त्रसे, वाणीसे, किसी वस्तुविशेषको देखने या छूनेसे तथा देश-काल और क्रिया-विशेषसे और भी विषम हो जाते हैं ॥ १९ ॥ इसलिये इनकी उत्पत्तिका निमित्त सामान्य पुरुषोंके लिये जानना बहुत कठिन होता है। इसीसे जब कोई विषमता होती है तो शास्त्रमें उसकी चिकित्सा कही गयी है ॥ २० ॥ यदि विषमता न होती तो कोई कभी उसकी चिकित्साका भी वर्णन न करता। अतः प्रियतम ! बतलाइये, आपको किस कारणसे शोक उत्पन्न हुआ है" ॥ २१ ॥ यह सुनकर राजकुमारने हेमलेखासे कहा, "प्रिये ! सुनो, मेरे शोकका जो कारण है वह मैं तुम्हें बताता हूँ ॥ २२ ॥ पहले मुझे जो कुछ सुखदायक जान पड़ता था वह तुम्हारी बातें सुनकर सब नष्टप्राय हो गया है। अब मुझे ऐसी कोई चीज दिखायी नहीं देती जो मेरे सुखको बढ़ानेवाली हो ॥ २३ ॥
५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे राज्ञा वितीर्णो विषयः सुखदोऽपि समन्ततः । वध्यं न सुखयेद्यद्वत्तथा तस्मान्न मे सुखम् ॥ २४ ॥ विषयान् सेवमानोऽहं सदा विष्टिगृहीतवत् । तत् पृच्छामि प्रिये ब्रूहि किं कृत्वा सुखमेम्यहम् ॥ २५ ॥ एवं तेन समापृष्टा हेमलेखा तदाऽब्रवीत् । नूनमेष सुनिर्वेदमागतो मद्वचःश्रुतेः ॥ २६ ॥ अस्ति बीजं श्रेयसोऽस्मिन् यत एवंविधो ह्ययम् । येषु श्रेयो ह्यसम्भाव्यं त एवं वाक्यगुम्फनैः ॥ २७ ॥ न ह्यण्वपि विशेषेण विशिष्यन्ते कदाचन । चिरं संराधिता हृत्स्था प्रसन्ना स्वात्मदेवता ॥ २८ ॥ त्रिपुरा येन तेष्वेव भवेदेवंविधा स्थितिः । इत्यालोच्यातिविदुषी बुबोधयिषती प्रियम् ॥ २९ ॥ महाराजने मुझे जो विषय दिये हैं वे सब प्रकार सुखदायक हैं, तथापि वध्य पुरुषको जैसे विषयोंसे सुख नहीं मिल सकता उसी प्रकार उनसे मुझे सुख नहीं मिलता ॥ २४ ॥ मैं जो विषयोंका सेवन करता हूँ वह सर्वदा बेगारमें पकड़े हुए पुरुषके समान [वासनाओंकी अधीनताके कारण] ही होता है। अतः प्रिये ! मैं तुमसे पूछता हूँ, अब क्या करनेसे मैं सुख प्राप्त कर सकूँगा" ? ॥ २५ ॥ हेमचूडके इस प्रकार पूछनेपर हेमलेखाने [मन ही मनमें] कहा, 'मेरा भाषण सुनकर सचमुच इन्हें खूब वैराग्य हो गया है ॥२६॥ इनमें निश्चय ही निःश्रेयसप्राप्तिका बीज है, तभी तो इनकी ऐसी अवस्था है। जिनके मुक्त होनेकी सम्भावना नहीं होती उनमें इस प्रकारके वाक्यविन्याससे कभी अणुमात्र भी कोई अन्तर नहीं पड़ता ॥ २७-२८ पू० ॥ चिरकालतक आराधना किये जानेपर जिनके हृदयमें विराजमान आत्मस्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा प्रसन्न होती है उन्हींमें ऐसी स्थिति पायी जाती है' ॥ २८ उ०-२९ पू० ॥ तब उस महापण्डिताने इस प्रकार विचार कर अपने पाण्डित्यको
पञ्चमोऽध्यायः । ५६ गोपयन्ती स्ववैदुष्यं प्राहान्यव्यपदेशतः । शृणु राजकुमारेदं यन्मे वृत्तं पुरातनम् ॥ ३० ॥ पुरा मे जननी काञ्चित् क्रीडनाय सखीं ददौ । सा स्वभावसती काञ्चिदसतीमनुसङ्गता ॥ ३१ ॥ सा विचित्रविधाश्चर्यसृष्टिसामर्थ्यसंयुता । अलक्षिता मे जनन्या सख्या मे सङ्गताभवत् ॥ ३२ ॥ असच्चरित्रियात्यन्तं सङ्गता मम सा सखी । प्राणेभ्योऽपि प्रियतमा सदा तद्वशगा ह्यहम् ॥ ३३ ॥ न तां विहाय मे संस्था क्षणार्द्धं वा क्वचिद्भवेत् । सा निर्मलस्वभावेन मां वशीकृत्य संस्थिता ॥ ३४ ॥ छिपाते हुए, अपने प्रियतमको बोध करानेकी इच्छासे किसी अन्यकी ओट लेकर कहा- ॥ २९ उ०-३० पू० ॥ राजकुमार ! सुनो, यह बात¹ पहले मेरे साथ बीत चुकी है। पूर्वकालमें मेरी माताने² खेलनेके लिये मुझे³ एक सखी⁴ दी थी। वह स्वभावसे तो सती थी, किन्तु किसी कुलटाकी⁵ संगतिमें पड़ गयी ॥ ३० उ०-३१ ॥ उस कुलटामें अनेक प्रकारकी आश्चर्यमयी सृष्टि रचनेकी सामर्थ्य थी। वह मेरी माताको पता लगाये बिना ही मेरी सखीसे मिल गयी⁶ ॥ मेरी सखीका उस दुराचारिणीसे बहुत अधिक सम्पर्क बढ़ गया। और मुझे वह प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। मैं सदा उसके अधीन ही रहती थी ॥ ३३ ॥ उसे छोड़कर तो आधे क्षणके लिये भी मैं कहीं नहीं रह सकती थी। अपने पवित्र (सत्त्वगुणप्रधान) स्वभावके कारण उसने मुझे १. यहाँ जो बात कही जा रही है उसका कुछ गूढ आशय है। यहाँ जिन व्यक्तियों के द्वारा जिन तत्त्वोंका उल्लेख किया गया है उनका विवरण नीचे दिया जाता है—। २. शुद्धचिति । ३. जीवात्मा । ४. बुद्धि । ५. अविद्या । ६. क्योंकि अविद्या कब जीवकी बुद्धिपर अधिकार करती है, इसका पता शुद्धचितिको भी नहीं लगता। अथवा यों समझना चाहिए कि शुद्धचिति वास्तव- में अविद्या या बुद्धिको विषय ही नहीं करती, क्योंकि उसकी दृष्टिमें तो बुद्धि आदि प्रपञ्चकी सत्ता ही नहीं है, यह केवल आभासमात्र है ।
६० त्रि पुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निरन्तरं तद्गतात्मस्वभावाऽभवमञ्जसा । सा तया दुष्टया युक्ता नट्या चित्रस्वभावया ॥ ३५ ॥ परोक्षवृत्तिमानीता स्वपुत्रेणाभियोजिता । तस्याः पुत्रोऽतिमूढात्मा मदिराघूर्णितेक्षणः ॥ ३६ ॥ बुभुजे तां समाक्रम्य सर्वदा मत्समक्षतः । सा तेनाक्रान्तसर्वाङ्गी भुज्यमानानुवासरम् ॥ ३७ ॥ न मां जहौ कदाचिच्च तत्स्पृष्टा तेन चाप्यहम् । ततः पुत्रः समुत्पन्नो मूढस्य सदृशाकृतिः ॥ ३८ ॥ तरुणः सोऽभवत्तूर्णमतिचञ्चलसंस्थितिः । अपने[अधीन कर लिया था। निरन्तर उसीमें चित्त लगा रहनेके कारण मैं भी उसीके-से स्वभाववाली हो गयी ॥ ३४-३५ पू० ॥ उस विचित्र स्वभाववाली नटीने अपने साथ मिली हुई मेरी सखीको [ स्वर्गादि ] परोक्ष पदार्थोंका झूठा लोभ देकर अपने पुत्रके¹ अधीन कर दिया ॥ ३५ उ०-३६ पू० ॥ उसका पुत्र बड़ा ही मूढ़चित्त था, मदिरासे उसकी आँखें चढ़ी रहती थीं। वह मेरे सामने ही बलात्कारसे उसे निरन्तर भोगता था ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ उसके द्वारा रात-दिन अंग-प्रत्यंगोंके आक्रान्त रहने और भोगे जानेपर भी वह कभी मुझे नहीं छोड़ती थी ।² इसलिये एक दिन तो मेरा भी उससे स्पर्श हो गया ।³ तदनन्तर उन दोनोंके एक पुत्र⁴ उत्पन्न हुआ। वह अपने पिता मूढ़के समान ही आकृतिवाला था ॥ ३७ उ०-३८ ॥ वह तुरन्त ही तरुण ( कार्यक्षम ) हो गया । उसका स्वभाव बड़ा १. मोह । २. क्योंकि मोहाक्रान्त रहनेपर भी बुद्धिके सब व्यापार और भोग चित्प्रकाशसे ही प्रकाशित रहते हैं । ३. बुद्धिसे तादात्म्य रहनेके कारण जीवात्माने भी अपनेको मोहग्रस्त मान लिया । ४. मन ।
पञ्चमोऽध्यायः । ६१ पितुर्मौढ्येन संयुक्तः पितामह्या गुणेन च ॥ ३९ ॥ अनेकचित्रनिर्माणसामर्थ्येन समावृतः । पितामह्या शून्यनाम्न्या पित्रा मूढाभिधेन च ॥ ४० ॥ अस्थिराह्वः शिक्षितोऽभूत् स्वयं चातिविशारदः । गतिमप्रतिबद्धां वै शीघ्राच्छीघ्रां समासदत् ॥ ४१ ॥ एवं मम सखी स्वच्छस्वभावा जन्मतः सती । असतीसङ्गतोऽत्यन्तं मालिन्यं समुपागता ॥ ४२ ॥ सख्या प्रियेण पुत्रेणासत्स्वभावयुतेन सा । चिरसङ्गात्तेषु दृढानुरागेण समायुता ॥ ४३ ॥ जहौ मय्यनुरागन्तु सर्वथा क्रमशः सखी । अहं स्वभावसरला हातुं तत्सङ्गमञ्जसा ॥ ४४ ॥ चंचल था । तथा वह अपने पिताकी मूढतासे और दादीके गुणसे भी सम्पन्न था¹ ॥ ३६ ॥ उसमें अनेक प्रकारके चित्र बनानेका सामर्थ्य भी आ गया । फिर शून्य² नामवाली दादी और मूढ नामवाले पिताने अपने उन अस्थिर नामक पुत्रको, जो स्वयं भी बहुत कुशल था, पढ़ा-लिखाकर पक्का कर दिया । इससे उसे शीघ्रातिशीघ्र ऐसी गति प्राप्त हो गयी जो किसीके द्वारा भी रोकी नहीं जा सकती थी ॥ ४०-४१ ॥ इस प्रकार मेरी सखी, जो बड़े निर्मल स्वभाववाली और जन्मसे सती ही थी, उस असतीका संग पाकर अत्यन्त मलिनताको प्राप्त हो गयी³ ॥ ४२ ॥ अपने असत्स्वभाव प्रेमी और पुत्रका चिरकालतक संग रहनेसे उसका उन्हींमें दृढ अनुराग हो गया ॥ ४३ ॥ अतः क्रमशः मेरी सखीने मुझसे प्रेम करना छोड़ दिया । किन्तु मैं सरल स्वभावकी थी, इसलिये सहसा अपनी सखीका संग छोड़ने में १. मनमें अपने पिता मोहका गुण जड़ता और अपनी दादी अविद्याका गुण विचित्र सृष्टि-रचना रहते ही हैं । २. वास्तव मेंअविद्याकी कोई सत्ता नहीं है, इसलिये उसे शून्य कहा गया है । ३. शुद्ध सत्त्वमयी होनेपर भी अविद्याके अधीन होनेपर रजोगुण-तमोगुण- विशिष्ट हो गयी ।
६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनीशा तत्परैवासं सर्वथा तामनुव्रता । अथ तस्याः प्रियो मूढो भुञ्जानस्तां तु सर्वदा ॥ ४५ ॥ प्रसह्य मां समाक्रान्तुमुद्युक्तः सर्वथाऽभवत् । नाहं स्वभावसंशुद्धा वस्तुतस्तद्वशं गता ॥ ४६ ॥ तथापि लोके मेऽत्यन्तं परीवादो महानभूत् । मूढेन सर्वथेयं च भुज्यते इति सर्वतः ॥ ४७ ॥ अस्थिराख्यं स्वपुत्रं सा मयि न्यस्य सखी मम । प्रियेण संपरिष्वक्ता सर्वथा तत्पराऽभवत् ॥ ४८ ॥ अथास्थिरो मया सम्यग् लालितः पोषितस्ततः । प्रौढस्त्रियं पितामह्या अनुमत्योपसङ्गतः ॥ ४९ ॥ सा प्रिया तस्य चपलाभिधाना हि प्रतिक्षणम् । प्रियस्य सम्मतं रूपं भिन्नं भिन्नं मनोहरम् ॥ ५० ॥ समर्थ न हो सकी। सर्वदा उसीके साथ रहती और उसका अनुसरण करती¹ ॥ ४४-४५ पू० ॥ अब तो उसका प्रेमी मूढ सर्वदा उसका भोग करते हुए सब प्रकार बलात्कारसे मुझपर भी आक्रमण करने को उद्यत रहने लगा। किन्तु स्वभावसे शुद्ध होने के कारण वस्तुतः मैं उसके अधीन नहीं हो सकी ॥ ४५ उ०-४६ ॥ तथापि लोकमें सब ओर मेरे विषयमें यह महती अपकीर्ति तो फैल ही गयी कि मूढ इसका यथेच्छ उपभोग करता है ॥ ४७ ॥ मेरी सखीने अपने अस्थिर नामक पुत्रको तो मेरे पास छोड़ दिया और स्वयं अपने प्रेमीसे आलिंगित रहकर सर्वथा उसीकी हो गयी ॥४८॥ अब अस्थिर सर्वथा मेरे द्वारा लालित-पोषित होने लगा। उसने अपनी दादीकी अनुमतिसे एक प्रौढा स्त्रीसे² सम्बन्ध जोड़ लिया ॥४६॥ उसकी वह चपला नामकी प्रेमिका अपने प्रियतमकी इच्छानुसार क्षण-क्षणमें तरह-तरहके मनोहर और आश्चर्यजनक रूप धारण कर १. अर्थात् बुद्धिसे जीवात्माका तादात्म्य हो गया और वह बुद्धिके व्यापारों- को अपने ही व्यापार मानने लगा। २. कल्पना।
पञ्चमोऽध्यायः । ६३ गृह्णात्याश्चर्यजननं प्रियमेवं स्वके वशे। चक्रे सात्यन्तनिपुणा स्वनैपुण्यवशात् खलु ॥ ५१॥ अस्थिरोऽपि क्षणेनैव त्वसंख्यशतयोजनम् । प्रयात्यायाति च सदा न श्रान्तिमुपगच्छति ॥ ५२ ॥ समीहते यत्र गन्तुमस्थिरश्च यदा यदा । तस्येष्टं स्वस्वरूपन्तु कृत्वा सा चपलापि हि ॥ ५३ ॥ तत्र तत्र स्थिता भूत्वा रमयत्येव स्वं प्रियम् । एवं सा चपला सम्यगस्थिरेण युता सती ॥ ५४ ॥ सुषुवे पञ्चतनयान् मातापितृपरायणान् । ते समर्थाः पञ्चविधा मयि सख्या निवेशिताः ॥ ५५ ॥ अहं सख्यनुरक्ता तानकुर्वं बलवत्तरान् । अथ ते पञ्चतनयाश्चपलायाः पृथक् पृथक् ॥ ५६ ॥ लेती थी। वह बड़ी ही चतुर थी। उसने अपनी चतुरतासे अपने प्रेमीको अपने अधीन कर लिया ॥ ५०-५१ ॥ अस्थिर भी एक क्षणमें ही असंख्य शत (करोड़ों) योजन आ-जा सकता था। इससे थकता तो वह कभी था ही नहीं ॥ ५२ ॥ अस्थिर जब-जब भी जहाँ कहीं जानेका विचार करता, चपला भी वहीं-वहीं पहुँचकर उसकी रुचिके अनुसार अपना रूप बनाकर अपने प्रियतमका मनोरञ्जन करती ॥ ५३-५४ पू० ॥ इस प्रकार अस्थिरके सम्पर्कमें रहते हुए चपलाने पाँच पुत्र¹उत्पन्न किये। वे अपने माता-पिताके बड़े अनुगत थे।² वे बड़े समर्थ थे और पाँचों पाँच प्रकारके थे। मेरी सखीने उन्हें मुझे ही सौंप दिया³ ॥ ५४ उ०-५५ ॥ सखीके अनुरागवश मैंने उन्हें और भी बलवान् बना दिया। फिर चपलाके उन पाँच पुत्रोंने अपने लिये अलग-अलग बड़े विचित्र, १. पाँच कर्मेन्द्रियाँ। २. क्योंकि इन्द्रियवर्ग मनकी कल्पना-शक्तिको बढ़ानेमें सहायक होते हैं। ३. अर्थात् उनका भी चेतन जीवात्मासे तादात्म्य हो गया।
६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे चक्रुरायतनं श्रेष्ठं विचित्रमतिविस्तृतम् । पितरं स्ववशे चक्रुर्मात्रा सम्यग् विभाविताः ॥ ५७ ॥ आनयन्ति स्वायतनं पितरं तं क्षणे क्षणे । तत्रास्थिरो ज्येष्ठसुतायतनं विनिविश्य तु ॥ ५८ ॥ अशृणोद्विविधान् शब्दान् सुस्वरानितरानपि । क्वचिन्मधुरसङ्गीतं क्वचिद्वाद्यं सुमङ्गलम् ॥ ५९ ॥ ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्रानाथर्वणानपि । शास्त्रागमेतिहासांश्च भूषणानाञ्च सिञ्जितम् ॥ ६० ॥ भृङ्गसंघस्य गीतञ्च पिकपञ्चमसुस्वरम् । एवं मनोहराञ् शब्दान् शृण्वन् पुत्रनिदेशतः ॥ ६१ ॥ प्रीतः पुत्रवशं प्रागादथ पुत्रोऽन्यथादिशत् । विरुद्धान् कर्णकटुकानशृणोद्भैरवान् रवान् ॥ ६२ ॥ सिंहादिगर्जितं मेघनिर्घोषमशनेस्तथा । विशाल और सुन्दर निवासस्थान¹ बनवाये। फिर माताके द्वारा परिपुष्ट होकर उन्होंने पिताको अपने अधीन कर लिया ॥ ५६-५७ ॥ वे क्षण-क्षणमें पिताको अपने निवासस्थानमें बुला लेते थे। एक बार अस्थिरने अपने सबसे बड़े पुत्रके² भवनमें जाकर नाना प्रकारके बड़े सुरीले तथा अन्य प्रकारके भी शब्द सुने ॥ ५८-५६ पू० ॥ वहाँ उसने कभी मधुर संगीत और कभी मंगलमय बाजे सुने। कभी ऋक्, यजु, साम और अथर्ववेदके मन्त्र तथा शास्त्र, आंगम और इतिहास सुने एवं कभी आभूषणोंकी झनकार भ्रमर-निकरकी गुंजार और कोकिलका सुमधुर पञ्चम स्वर भी सुनाई दिया ॥ ५६ उ०-६१ पू० ॥ इस प्रकार उस पुत्रके संकेतसे मनोहर शब्द सुनकर वह बड़ा प्रसन्न हुआ और उसके अधीन हो गया। अब उसी पुत्रने उसे दूसरा रंग दिखाया। उसने अपनी रुचिके विरुद्ध अनेकों कठोर और भयानक शब्द भी सुने ॥ ६१ उ०-६२ ॥ सिंहादि हिंस्र पशुओंकी गर्जना, बादल और बिजलीकी कड़कड़ाहट, १. इन्द्रियगोलक। २. श्रवणेन्द्रिय।
पञ्चमोऽध्यायः । ६५ ब्रह्माण्डभेदनं गर्भस्रावणं सुभयङ्करम् ॥ ६३ ॥ रुदितं विप्रलपितं शोचितादिविचित्रितम् । एवं श्रुत्वा सुचकितश्चान्यत्राप्यशृणोत्तथा ॥ ६४ ॥ द्वितीयसुतनीतोऽथास्थिरस्तद्भुवनं ययौ । तत्रापश्यन् मृदुस्पर्शान्यासनानि शुभानि च ॥ ६५ ॥ शयनानि च वासांसि कठिनस्पर्शकान्यपि । शीतस्पर्शानि वस्तूनि तथोष्णस्पर्शकानि च ॥ ६६ ॥ अनुष्णाशीतस्पर्शानि विचित्राण्यभिवीक्ष्य तु । हितान् दृष्ट्वा प्रमुदितो विषण्णस्त्वहितानपि ॥ ६७ ॥ अथ तृतीयतनयभवनं प्राप्य सोऽस्थिरः । अपश्यद्रुचिराकारान् भावान् विविधवर्णकान् ॥ ६८ ॥ रक्तान् श्वेतान् पीतनीलान् हरितान्पाटलानपि । धूम्रान् कडारान् कपिशान्मेचकान् कर्बुरांस्तथा ॥ ६९ ॥ स्थूलान् कृशानणून्दीर्घानायतान् वर्त्तुलांस्तथा । अर्द्धवृत्तान् दीर्घवृत्तान् सुन्दरांश्र विभीषणान् ॥ ७० ॥ ब्रह्माण्डका भयङ्कर स्फोट, गर्भस्रावका क्रन्दन तथा शोकाकुलोंका प्रलाप आदि विचित्र शब्द सुनकर वह बड़ा चकित हुआ । इसी प्रकार और भी बहुत-से शब्द सुने ॥ ६३-६४ ॥ एक बार दूसरे पुत्रके१ ले जानेसे वह उसके घर भी गया । वहाँ उसने कोमल स्पर्शवाले सुन्दर आसन, शयन ( बिछौने ) और वस्त्र देखे । इसी प्रकार कठिन, शीत और उष्ण स्पर्शवाली वस्तुएँ भी देखीं ॥ कोई वस्तुएँ ऐसी भी थीं जिनका स्पर्श न अधिक उष्ण था न शीत । इस प्रकार तरह-तरह की वस्तुएँ देखकर अनुकूलोंसे उसे हर्ष हुआ और प्रतिकूलोंसे विषाद ॥ ६७ ॥ फिर उस अस्थिरने तीसरे पुत्रके२ भवनमें जाकर वहाँ अनेक रंगोंके सुन्दर-सुन्दर आकारवाले पदार्थ देखे ॥ ६८ ॥ वे पदार्थ लाल, सफेद, पीले, नीले, हरे, भूरे, धूमिल, मटियाले, सुनहरे, काले और चितकबरे इत्यादि अनेकों रंगों तथा स्थूल, कृश, अणु, दीर्घ, चौड़े, गोल आदि अनेकों आकारोंके थे । कोई गोलार्ध और कोई १. त्वगिन्द्रिय । २. चक्षुरिन्द्रिय ।
६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे बीभत्सान् भास्वरान् रौद्राननालोकांश्च दङ्मुखः । क्वचिद्धितं ततोऽन्यश्च पश्यन्तं पितरं पुनः ॥ ७१ ॥ अनयत्तुर्यतनयो भवनं स्वं विचित्रितम् । तत्राससाद पुष्पाणि फलान्यन्यानि च क्रमात् ॥ ७२ ॥ पेयानि लेह्यचोष्याणि भक्ष्याणि रसवन्ति वै । सुधास्वादूनि मधुराण्यन्यान्यम्लरसानि च ॥ ७३ ॥ कटुकानि च तिक्तानि कषायान्यपि कानिचित् । क्षाराणि मधुराम्लानि कट्वम्ललवणानि च ॥ ७४ ॥ कटुतिक्तानि चित्रात्मरसानि विविधान्यपि । आस्वादयन्नात्मजेन समेतोऽथान्तिमः सुतः ॥ ७५ ॥ निनाय पितरं स्थाने स्वीयेऽत्यन्तविचित्रिते । तत्रोपालभतानेकपुष्पाणि च फलानि च ॥ ७६ ॥ दीर्घ गोलाकार थे। कोई देखनेमें सुन्दर और कोई भयानक जान पड़ते थे ॥ ६६-७० ॥ इसीप्रकार कोई घृणाके योग्य, कोई तेजोमय, कोई उग्र और कोई अन्धकाररूप थे, जहाँ दृष्टि काम नहीं करती थी। उनमेंसे कोई हितकर और कोई अहितरूप जान पड़ता था। इस प्रकार जब पिता अस्थिर तरह-तरहके पदार्थ देख रहा था तब चौथा पुत्र¹ उसे अपने विचित्र भवनमें ले गया ॥ ७१-७२ पू० ॥ वहाँ क्रमशः अनेकों पुष्प और फल उसके दृष्टिगोचर हुए। उसने अनेकों सरस पेय, लेह्य, चोष्य और भक्ष्य पदार्थों का आस्वादन किया। उनमें कोई अमृतके समान मधुर, कोई खट्टे रसवाले, कोई कड़वे, कोई चरपरे और कोई कसैले थे। कोई नमकीन, कोई खटमिट्ठे, कोई कड़वे खट्टे और नमकीन तीन रसवाले और कोई कटु और तिक्त थे। इस प्रकार जब वह अनेकों प्रकारके रसोंवाले विभिन्न पदार्थोंका अपने पुत्र के साथ आस्वादन कर रहा था उसी समय उसका अन्तिम पुत्र² उसे अपने अत्यन्त विचित्र स्थानमें ले गया। वहाँ भी उसे अनेकों पुष्प और फल मिले ॥ ७२ उ०-७६ ॥ १. रसनेन्द्रिय । २. घ्राणेन्द्रिय ।
पञ्चमोऽध्यायः । ६७ तृणान्यन्यान्योषधीश्च भावानन्यांश्च सर्वतः । सुगन्धान् पूतिगन्धांश्च मृदुगन्धोग्रगन्धकान् ॥ ७७ ॥ मोहगन्धान् ज्ञानगन्धान्मूर्च्छागन्धान्विचित्रितान् । पुत्राणां भवने चैवं प्रविशन् निविशन्नपि ॥ ७८ ॥ हितेषु रमते क्वापि विषीदत्यहिते क्वचित् । सदा गमागमपरः पुत्राणां भवने बभौ ॥ ७९ ॥ ते पुत्राः पितृवात्सल्यात् पितृहीना न च क्वचित् । स्पृशन्ति विषयांश्चित्रान् स्वल्पं वापि कदाचन ॥ ८० ॥ अस्थिरस्तु पुत्रगृहे भुक्त्वा तान् विषयान् बहून् । मुषित्वाऽन्यांश्च विषयान् गुप्त्या नयति स्वं पदम् ॥ ८१ ॥ पत्न्या चपलया साकं रहः पुत्रैर्विना स्वयम् । भुनक्त्यतितरां नित्यमथान्या चपला स्वसा ॥ ८२ ॥ महाशना पतिं वव्रे मनःकान्तं तमस्थिरम् । तस्यामतितरां सक्तो यदाभूदस्थिरोऽपि वै ॥ ८३ ॥ वहां उसने सब ओर वनस्पति, ओषधि और अन्य वस्तुओंका भी अनुभव किया। उनमें कोई अच्छी गंधवाली, कोई दुर्गन्धयुक्त, कोई भीनी गंधवाली और कोई उग्र गन्धयुक्त थी। किन्हींकी गन्ध मुग्ध कर देनेवाली, किन्हींकी सचेत करनेवाली और किन्हींकी मूर्च्छित कर देने- वाली थी। इस प्रकार अनेकों विचित्र पदार्थ अनुभव किये ॥७७-७८ पू०॥ पुत्रोंके भवनोंमें इसी तरह जाते-आते वह कहीं तो हितकारी वस्तुएँ मिलनेपर उन्हींमें रम जाता और कहीं अहितकर पदार्थ मिलने पर ऊबने लगता। अतः वह बराबर अपने पुत्रोंके भवनोंकी ओर आने-जानेमें ही लगा रहता था ॥ ७८ उ०-७९ ॥ वे पुत्र बड़े पितृभक्त थे, अतः पिताको साथ लिये बिना उन विचित्र विषयोंमेंसे कभी किसीको थोड़ा-सा छूतेतक नहीं थे ॥ ८० ॥ किन्तु अस्थिर उन अनेकों विषयोंको पुत्रोंके भवनोंमें भोगता और उनमेंसे कुछको गुप्त रूपसे चुराकर अपने घर ले आता ॥ ८१ ॥ वहाँ पुत्रोंके बिना एकान्तमें अपनी पत्नी चपलाके साथ नित्य ही उन्हें खूब भोगता। कुछ काल बीतनेपर चपलाकी एक बहिन १. हृदयदेशमें। २. स्वप्नादिसें।
६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तदा तस्याः प्रीतये स भोगाहरणतत्परः । तेनानीतं बह्वपि च भक्षयित्वा क्षणमात्रतः ॥ ८४ ॥ पुनर्बुभुक्षयाक्रान्ता भोगाहरणहेतवे । सदा प्रियं सन्दिशति सोऽप्याहर्तुं सदेक्षते ॥ ८५ ॥ पुत्रैः पञ्चभिरानीतं प्रियेणापि सुसंभृतम् । भुक्त्वा क्षणेन भूयोऽपि सा बुभुक्षाप्रपीडिता ॥ ८६ ॥ भोगाहृतौ सन्दिशति प्रियं पुत्रांश्च सर्वदा । ततः सा स्वल्पकालेन सुषुवे पुत्रयोर्युगम् ॥ ८७ ॥ ज्वालामुखस्तयोर्ज्येष्ठो निन्द्यवृत्तस्तथापरः । सदा मातुः प्रियतमौ तौ पुत्रौ संबभूवतुः ॥ ८८ ॥ महाशनाने उस अस्थिरको अपने मनोऽनुकूल देखकर पतिरूपसे वरण कर लिया ॥ ८२-८३ पू० ॥ अस्थिरकी भी अब उसमें अत्यन्त आसक्ति हो गयी और वह उसकी प्रसन्नताके लिये सर्वदा तरह-तरहके भोग लानेमें तत्पर रहने लगा ॥ ८३ उ०-८४ पू० ॥ वह जो कुछ लाता उसे क्षणमात्रमें ही चट करके वह पुनः भोगा- कांक्षासे व्याकुल हो जाती और अपने प्रियतमको सर्वदा नये-नये भोग लानेके लिये प्रेरित करती रहती । तथा वह भी सदा उन्हें लाने की ही ताकमें लगा रहता ॥ ८४ उ०-८५ ॥ पाँचों पुत्र तरह-तरहके भोग लाते और पति भी खूब पेट भरता रहता । किन्तु महाशना एक क्षणमें सबको स्वाहा करके भूखसे व्याकुल ही बनी रहती ॥ ८६ ॥ वह सर्वदा अपने प्रेमी और पुत्रोंको भोग लानेमें ही जोतती रहती । फिर कुछ समयमें ही उसके दो पुत्र हुए ॥ ८७ ॥ उनमें बड़ा था ज्वालामुख² और छोटा था निन्द्यवृत्त³ । वे दोनों पुत्र अपनी माँके बड़े ही लाड़िले थे ॥ ८८ ॥ १. आशा; विषयभोगोंसे कभी तृप्त न होनेके कारण इसे 'महाशना' कहा है । २. क्रोध । ३. लोभ ।
पञ्चमोऽध्यायः । ६६ महाशनायामासक्तः संश्लिष्यति यदास्थिरः । तदा ज्वालामुखज्वालालीढसर्वकलेवरः ॥ ८९ ॥ अस्थिरः पीडितोऽत्यन्तं गाढमूर्छामुपेति हि । कदाचिन्निन्यवृत्तेन सङ्गतः प्रियसूनुना ॥ ९० ॥ सर्वैर्निन्द्यतामेति मृततुल्यो हि जायते । एवं यदास्थिरो जातो दुःखभोगैकतत्परः ॥ ९१ ॥ तदा सखी मे स्वभावसती पुत्रेऽस्थिराह्वये । अतिवात्सल्यतस्तेन सङ्गता तस्य दुःखतः ॥ ९२ ॥ दुःखभारसमाक्रान्ता निन्यवृत्तेन सङ्गता । ज्वालामुखेन च तथा पौत्रेणाश्लेषिता सती ॥ ९३ ॥ सुदग्धा निन्दिता लोकैर्मृतप्राया बभूव ह । तां सदानुगता चाहं लुप्तप्रायाभवं प्रिय ॥ ९४ ॥ अस्थिर महाशनामें अत्यन्त आसक्त होकर जब उसका आलिंगन करता तो कभी तो ज्वालामुखकी ज्वालाओंसे सारा शरीर व्याप्त हो जाने के कारण अत्यन्त पीडित होता और उसे गहरी मूर्च्छा हो जाती। तथा कभी प्रिय पुत्र निन्यवृत्तका सम्पर्क होनेपर सबकी निन्दाका पात्र बनकर मृतकतुल्य हो जाता ॥ ८६-६१ पू० ॥ इस प्रकार अस्थिर सर्वदा केवल दुःखभोगमें ही डूबा रहने लगा। तब स्वभावसे ही सनी मेरी सखीका भी अपने पुत्र अस्थिरमें अत्यन्त स्नेह होनेके कारण उससे तादात्म्य हो गया। अतः उसके दुःखसे वह भी दुःखाक्रान्त हो गयी। क्रमशः निन्यवृत्त और ज्वालामुखसे भी उनका सम्पर्क बढ़ा और उन पौत्रोंके संस्पर्श से उसे जो दाह और लोकनिन्दा मिली उससे वह मृतप्राय हो गयी। मैं तो सदा उसीके अनुरूप रहती थी, अतः प्रियतम ! उसके साथ मानो मैं भी लुप्त हो गयी ॥ ६१ उ०-६४ ॥ १. अर्थात् जब जीवकी उपाधिवृद्धि रजोगुण-तमोगुणरूप लोभ एवं क्रोधसे व्याप्त हो गया तो चित्स्वरूपका भान न होनेके कारण मानो जीवात्मा लुप्त हो गया।
७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं बहूनि वर्षाणि सख्या दुःखेन दुःखिता । अस्थिरोऽभूदस्वतन्त्रो महाशनापरिग्रहात् ॥ ९५ ॥ पुरं प्राप दशद्वारं केनचित् कर्मणा क्वचित् । तस्मिन्महाशनायुक्तो पुत्रैर्मात्रादिभिर्युतः ॥ ९६ ॥ न्यवसत् स सुखप्रेप्सुर्दुःखं भुञ्जन् दिवानिशम् । पुत्राभ्यां दग्धसर्वाङ्गो निन्दितश्चानुवासरम् ॥ ९७ ॥ इतस्ततः समाकृष्टः प्रियाभ्यां सर्वदा हि सः । पुत्राणां पञ्चभवनं प्रविशन् निविशन्नपि ॥ ९८ ॥ अत्यन्तं श्रान्तिमायाति न सुखं लभते क्वचित् । एवं पुत्रस्य दुःखेन सखी मेऽत्यन्तदुःखिता ॥ ९९ ॥ अभून्मूर्च्छितकल्पा सा एवं तत्पुर आवसत् । ज्वालामुखनिन्द्यवृत्तयुता या सा महाशना ॥ १०० ॥ इस प्रकार अनेकों वर्षोंतक मैं अपनी सखीके दुःखसे दुःखित रही। इधर अस्थिर महाशनाके जालमें फँसकर बिलकुल पराधीन हो गया ॥ ९५ ॥ किसी कर्मवश एक दिन वह दस द्वारवाले एक नगरमें जा पहुँचा। उसमें वह महाशना-सहित अपनी माता और पुत्रादिके साथ रहने लगा। वहाँ रहकर वह पाना तो सुख चाहता था, परन्तु रात-दिन भोगना पड़ता था उसे दुःख ही ॥ ९६-९७ पू० ॥ अपने दो प्रिय पुत्रोंके द्वारा नित्यप्रति इधर-उधर आकर्षित होकर उसे सर्वाङ्गमें दाह और लोकनिन्दाका सामना करना पड़ता। तथा दूसरे पुत्रोंके पाँच निवासस्थानोंमें जाने-आनेसे अत्यन्त थकान हो जाती। सुख उसे कभी नहीं मिलता था ॥ ९७ उ०-९९ पू० ॥ इस प्रकार पुत्रके दुःखसे मेरी सखी भी अत्यन्त दुःखित होकर मूर्च्छित-सी हो गयी। इस तरह अपने पुत्र ज्वालामुख और निन्द्यवृत्तके साथ वह महाशना उस पुरमें रहने लगी ॥ ९९ उ०-१०० ॥ १. शरीर।
पञ्चमोऽध्यायः। ७१ शून्याख्यया पोषिता च मूढेन श्वशुरेण च। तथा सपत्न्या चपलाख्ययात्यन्तं समेधिता ॥ १०१ ॥ अस्थिरं स्ववशे चक्रे पतिं तत्पुरसंस्थिता। सखीप्रीत्या तत्र चाहमवसं तत्परा सती ॥ १०२ ॥ सखीदुःखाद्धतप्राया सर्वेषां रक्षणोद्यता। यद्यहं तत्र न स्यां वै क्षणमात्रमपि प्रिय ॥ १०३ ॥ न भवेत्तत्र चैकोऽपि मया सर्वं हि रक्षितम्। शून्या शून्यतां प्राप्ता मूढेन मूढतामपि ॥ १०४ ॥ अस्थिरेणास्थिरत्वञ्च चापल्यं चपलायुता। ज्वालामुखाज्ज्वलत्ताञ्च निन्द्यवृत्तात्तदात्मताम् ॥ १०५ ॥ सखीसंयोगतश्चैवमभवन्तत्तदाकृतिः। सखीं यदि विमुञ्चामि सा नश्येत् क्षणमात्रतः ॥ १०६ ॥ अपने शून्यसंज्ञक मूढ श्वशुरसे वह खूब पोषित हुई तथा चपला नामकी सौतने भी उसका अच्छी तरह पोषण किया ॥ १०१ ॥ उस पुरमें रहकर उसने अपने पति अस्थिरको पूर्णतया अपने अधीन कर लिया। सखीके प्रेमवश मैं भी उसके अनुकूल रहकर उसी स्थानपर बनी रही ॥ १०२ ॥ सखीके दुःखसे यद्यपि मैं प्रायः मर-सी गयी थी, तो भी मैं सबकी रक्षा करती रहती थी। प्यारे! यदि मैं वहाँ एक क्षण भी न रहती तो उनमेंसे एक भी न बचता; मैंने ही उन सबको बचाये रखा १ ॥ १०३-१०४ पू० ॥ मैं शून्या (अविद्या) के सम्पर्कसे शून्यरूप, मूढके संगसे मूढ- रूप, अस्थिरके साथसे अस्थिरस्वरूप, चपलाके सहवाससे चप- लतारूप, ज्वालामुखके कारण ज्वलनरूप और निन्द्यवृत्तके तादात्म्य- से तद्रूप हो गयी थी ॥ १०४ उ०-१०५ ॥ इस प्रकार सखीका संयोग रहनेसे मुझे ये सब आकार धारण करने पड़े। यदि मैं सखीको छोड़ देती तो वह एक क्षणमें ही मर जाती ॥ १०६ ॥ १. क्योंकि जीवात्माके रहनेपर ही ये सब जीवित रहते हैं।
७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मां सङ्गतेन तेषां वै समाहुर्व्यभिचारिणीम् । जना मूढा सर्व एव कुशला निर्मलां विदुः ॥ १०७ ॥ महासती मे जननी विशुद्धा निर्मलाकृतिः । आकाशादपि विस्तीर्णा सूक्ष्मा च परमाणुतः ॥ १०८ ॥ सर्वज्ञानाप्यकिञ्चिज्ज्ञा सर्वकर्त्र्यपि निष्क्रिया । सर्वाश्रयाप्यनाधारा सर्वाधाराप्यनाश्रिता ॥ १०९ ॥ सर्वरूपाप्यरूपा सा सर्वयुक्ताप्यसंयुता । सर्वत्र भासमानापि न ज्ञेया केनचित् क्वचित् ॥ ११० ॥ उनकी संगतिके कारण ही मूढ पुरुष तो मुझे व्यभिचारिणी कहने लगे थे। परन्तु जो कुशल (विवेकी) पुरुष थे वे सब मुझे निर्दोष ही समझते थे ॥ १०७ ॥ मेरी माता परम सती थी। वह मानसिक और शारीरिक दोषों- से शून्य, आकाशसे भी अधिक विस्तीर्ण और परमाणुसे भी सूक्ष्म थी ॥ १०८ ॥ वह सब कुछ जानती थी, तथापि [ अभिमानशून्य होनेके कारण ] मानो कुछ नहीं जानती, इसी प्रकार सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करती थी, सबकी आश्रय होकर भी किसीका आधार¹ नहीं थी तथा सबकी आधार होते हुए भी स्वयं निराधार² थी ॥ १०९ ॥ वह सर्वरूप होकर भी स्वयं रूपहीन थी, सबसे संयुक्त होनेपर भी सर्वथा असंयुक्त³ ( असंग ) थी और सर्वत्र भासमान होनेपर भी किसी- के द्वारा कभी जानी नहीं जा सकती थी ॥ ११० ॥ १. शुद्धचितिमें ही सबका भास होता है, इसलिये वह सबका आश्रय तो है किन्तु वास्तवमें उसमें किसीकी सत्ता नहीं है इसलिये उसे किसी आधेयका आधार नहीं कह सकते । २. सब उसीमें भासते हैं इसलिये वह सबका आधार है परन्तु उसका कोई अन्य प्रकाशक नहीं है, वह स्वयंप्रकाश है, इसलिये निराधार है । ३. क्योंकि उससे भिन्न किसीकी सत्ता ही नहीं है ।
पञ्चमोऽध्यायः। ७३ महानन्दाप्यनानन्दा मातापितृविवर्जिता । मादृशयस्तनयास्तस्याः सन्ति संख्याविवर्जिताः ॥ १११ ॥ यथा तरङ्गा जलधेरसंख्यः सोदरीगणः । सर्वास्ता मत्समाचारा राजपुत्र भवन्ति वै ॥ ११२ ॥ महामन्त्रवती चाहं सर्वैरेतैः सखीगणैः । सङ्गता तत्परा चापि मातृतुल्या स्वरूपतः ॥ ११३ ॥ अस्मिन् पुरे सखीपुत्रो यदा श्रान्तो भवत्यलम् । तदा मातुः समुत्सङ्गेऽस्थिरः शेते सुनिर्भरम् ॥ ११४ ॥ अस्थिरस्तु यदा सुप्तस्तदा तस्य सुतादयः । स्वापं समधिगच्छन्ति नान्यो जागर्ति कश्चन ॥ ११५ ॥ तदा तद्रक्षति पुरमस्थिरस्य प्रियः सखा । प्रचाराख्यः प्रतिचरन् पूर्वद्वारयुगे मुहुः ॥ ११६ ॥ वह परमानन्दमयी होनेपर भी निरानन्द१ तथा माता-पितासे रहित थी। हाँ, मेरी-जैसी उसकी अगणित सन्तानें अवश्य थीं ॥ १११ ॥ जिस प्रकार समुद्रकी तरंगें होती हैं उसी प्रकार मेरी अगणित बहिनें थीं। राजकुमार ! वे सब मेरे ही समान आचरणवाली हैं ॥ ११२ ॥ मैं बड़ी भारी मन्त्रशक्तिसे सम्पन्न हूँ, इसीसे इन सब सखियोंके साथ उन्हींके अनुकूल रहते हुए भी स्वरूपतः अपनी माताके समान निर्मलस्वभाव ही रहती हूँ ॥ ११३ ॥ इस पुरमें जब मेरी सखीका पुत्र अस्थिर बहुत थक जाता तो वह निश्चिन्त होकर अपनी माँकी गोदमें सो जाता ॥ ११४ ॥ जब अस्थिर सो जाता तो उसके पुत्रादि भी निद्रादेवीकी गोदमें चले जाते। फिर और कोई भी जगा न रहता ॥ ११५ ॥ उस समय अस्थिरका प्रचार नामक प्रिय सखा३ पूर्वके दोनों द्वारों४ में आते-जाते इस नगरकी रक्षा करता ॥ ११६ ॥ १. स्वरूपतः आनन्दस्वरूपा होनेपर भी कोई निमित्त न होनेके कारण उसमें आनन्दका आविर्भाव नहीं होता। २. अघटितघटनापटीयसी मायाशक्तिसे । ३. प्राण । ४. दोनों नासिकारन्ध्रोंमें ।
७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अस्थिरस्यापि या माता सखी मे तनयेन सा । तस्याः सखी च या श्वश्रूरसती या स्वभावतः ॥ ११७ ॥ सा समाच्छाद्य तान् सर्वान् पुत्रेण सह रक्षति । एवं सर्वेषु सुप्तेषु प्राप्य स्वां मातरं तदा ॥ ११८ ॥ आनन्दिताहं भवामि मात्राश्लिष्टा चिरं ननु । पुनस्तानुत्थितान् शीघ्रमनुसंधामि चान्वहम् ॥ ११९ ॥ अस्थिरस्य सखा योऽयं प्रचाराख्यो महाबलः । स सर्वानस्थिरमुखान् पोषयत्यनुवासरम् ॥ १२० ॥ स एको बहुधा भूत्वा पुरञ्च पुरवासिनः । व्याप्य रक्षत्यनुदिनं सर्वान् संश्लेषयत्यपि ॥ १२१ ॥ तं विना ते हि विश्लिष्टा नष्टाः स्युरपि सर्वथा । सूत्रेण हीना मणयो मालाबद्धा यथा पृथक् ॥ १२२ ॥ अस्थिरकी माता मेरी सखी भी अपने पुत्रके साथ निद्राके वशीभूत हो जाती । उस अवस्था में उसकी सखी, जो उसकी असत्स्व- भाववाली सास भी थी, अपने पुत्रके सहित उन सबको आच्छादित करके उनकी रक्षा करती थी ॥ ११७-११८ पू० ॥ इस प्रकार जब सब सो जाते तो मैं अपनी माताके पास जाती और चिरकालतक उसका आलिंगन पाकर आनन्दमग्न हो जाती थी । फिर जब वे सब उठते तो नित्यप्रति तुरन्त ही मैं भी उनसे तादात्म्य स्थापित कर लेती ॥ ११८ उ०-११९ ॥ अस्थिरका जो यह महाबली प्रचार नामक सखा था वह नित्यप्रति अस्थिर आदि सभी परिवारका पोषण करता था ॥ १२० ॥ वह एक ही अनेकरूप होकर उस नगर और नगरनिवासियोंमें व्याप्त हो जाता, नित्यप्रति सबकी रक्षा करता और सबका अपने-अपने विषयोंसे सम्पर्क कराता ॥ १२१ ॥ उसके बिना तो वे सब इसी प्रकार छिन्न-भिन्न होकर सर्वथा नष्ट १. अविद्या या शून्या । २. मोह । ३. सुषुप्तिमें जीवका अपने शुद्धस्वरूप या शुद्धचितिसे संयोग हो जाता है; जैसा कि यह श्रुति कहती है—'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति।'
पञ्चमोऽध्यायः । ७५ स एव माञ्च सङ्गम्य सर्वैः संयोजयत् पुरम् । मया संजीवितोऽत्यन्तं सूत्रधारो हि तत्पुरे ॥ १२३ ॥ जीर्णे तु तत्पुरे चान्यत् पुरं तान्नयति द्रुतम् । एवं प्रचारं संश्रित्य पुराणामधिपोऽभवत् ॥ १२४ ॥ बहूनामस्थिरो नूनं विचित्राणां क्रमेण वै । सतीपुत्रोऽप्यस्थिरः स संश्रितोऽपि महाबलम् ॥ १२५ ॥ मया च भावितोऽत्यन्तं सर्वथा दुःखभागभूत् । चपलामहाशनाभ्यां पत्नीभ्यां सुसमागमत् ॥ १२६ ॥ ज्वालामुखनिन्द्यवृत्ताभिधपुत्रयुगेन च । अन्यैः पुत्रैः पञ्चभिः स सर्वत्राभिविकर्षितः ॥ १२७ ॥ महाक्लेशपरीतात्मा सुखलेशविवर्जितः । इतस्ततः क्वचित् पुत्रैः पञ्चभिः स विकर्षितः ॥ १२८ ॥ हो जाते जैसे मालामें पिरोये हुए मनके तागा न रहनेपर बिखर जाते हैं ॥ १२२ ॥ मेरे साथ मिलकर वह प्रचार ही सबके साथ उस पुरका संयोग कराता है तथा मेरे द्वारा अनुप्राणित होकर वही उस पुरमें सबको प्रेरित करनेवाला प्रधान सूत्रधार है ॥ १२३ ॥ जब वह नगर बहुत जीर्ण हो जाता है, तो वही उन सबको तुरन्त दूसरे नगरमें ले जाता है। इस प्रकार प्रचारका आश्रय पाकर अस्थिर क्रमशः तरह-तरहके अनेकों नगरोंका स्वामी हो गया ॥ १२४-१२५ पू० ॥ अस्थिर साध्वी माताका पुत्र था, उसे महाबली प्रचारका आश्रय प्राप्त था और मेरे द्वारा भी उसका पोषण होता था, तथापि वह सब प्रकार दुःखका ही भागी रहा ॥ १२५ उ०-१२६ पू० ॥ उसका चपला और महाशना दो पत्नियोंसे समागम रहा तथा ज्वालामुख और निन्द्यवृत्त इन दो एवं अन्य पाँच पुत्रोंके द्वारा सब ओर उसकी खींच-तान रही ॥ १२६ उ०-१२७ ॥ इससे उसका हृदय अत्यन्त क्लेशमें डूबा रहा, सुख तो लेशमात्र भी उसे नहीं मिला। कभी तो उसके पाँचों पुत्र उसे इधर-उधर घसीटते ॥ १२८ ॥
७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे क्वचिच्चपलायात्यन्तं चालितः खेदमीयिवान् । क्वचिन्महाशनाहेतोरशनाथें प्रधावति ॥ १२९ ॥ क्वचिज्ज्वालामुखाक्षिप्तो निर्दग्धापादमस्तकः । महामूर्च्छां समायाति चाविदंस्तत्प्रतिक्रियाम् ॥ १३० ॥ निन्द्यवृत्तं क्वचित् प्राप्य गर्हितो भर्त्सितः परैः । मृततुल्यं स्वमात्मानं मन्यते शोकसन्ततः ॥ १३१ ॥ दुष्टपत्नीपुत्रसहितो मोहितो दुष्कुलोद्भवः । पत्नीपुत्रैः समाक्रान्तो नीयमानस्तु तैः सदा ॥ १३२ ॥ उवास तैर्विचित्रेषु पुरेषूच्चावचेषु हि । क्वचित् कान्तारकीर्णेषु क्रव्यादाकुलभूमिषु ॥ १३३ ॥ क्वचिदत्यन्ततप्तेषु क्वचिच्छीतजडेषु च । क्वचित् पूतिवहास्थेषु क्वचिद्गाढतमःसु च ॥ १३४ ॥
कभी चपलाके कारण अत्यन्त चंचल होकर उसे महान् दुःख मिलता, कभी महाशनाके कारण वह उसके भोगोंके लिये दौड़-धूप करता रहता ॥ १२९ ॥ कभी ज्वालामुखकी लपेटमें आ जानेसे उसे एड़ीसे चोटीतक ऐसा दाह होता कि घोर मूर्च्छा हो जाती और उसकी कोई चिकित्सा भी न सूझती ॥ १३० ॥ कभी निन्द्यवृत्तका सम्पर्क होनेपर दूसरोंके द्वारा उसे निन्दा और अपमान सहने पड़ते; जिनके कारण शोकाकुल होकर वह अपनेको मृतकतुल्य ही समझता ॥ १३१ ॥ उन दुष्ट पत्नी और पुत्रोंके साथ वह दुष्ट कुलमें उत्पन्न हुआ अस्थिर पत्नी और पुत्रोंसे घिरा तथा सर्वदा उन्हींके द्वारा ले जाया जाता अनेकों प्रकारकी ऊँच-नीच पुरियोंमें रहा ॥ १३२-१३३ पू० ॥ कभी वह वनोंसे व्याप्त एवं मांसभक्षी जीवोंसे पूर्ण भूमियोंमें, कभी अत्यन्त तप्त और कभी शीतसे ठिठुरा देनेवाले प्रदेशोंमें, तथा कभी गन्दी नालियों और कभी घोर अन्धकारमें भटकता रहा ॥ १३३ उ०-१३४ ॥