त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मां सङ्गतेन तेषां वै समाहुर्व्यभिचारिणीम् । जना मूढा सर्व एव कुशला निर्मलां विदुः ॥ १०७ ॥ महासती मे जननी विशुद्धा निर्मलाकृतिः । आकाशादपि विस्तीर्णा सूक्ष्मा च परमाणुतः ॥ १०८ ॥ सर्वज्ञानाप्यकिञ्चिज्ज्ञा सर्वकर्त्र्यपि निष्क्रिया । सर्वाश्रयाप्यनाधारा सर्वाधाराप्यनाश्रिता ॥ १०९ ॥ सर्वरूपाप्यरूपा सा सर्वयुक्ताप्यसंयुता । सर्वत्र भासमानापि न ज्ञेया केनचित् क्वचित् ॥ ११० ॥ उनकी संगतिके कारण ही मूढ पुरुष तो मुझे व्यभिचारिणी कहने लगे थे। परन्तु जो कुशल (विवेकी) पुरुष थे वे सब मुझे निर्दोष ही समझते थे ॥ १०७ ॥ मेरी माता परम सती थी। वह मानसिक और शारीरिक दोषों- से शून्य, आकाशसे भी अधिक विस्तीर्ण और परमाणुसे भी सूक्ष्म थी ॥ १०८ ॥ वह सब कुछ जानती थी, तथापि [ अभिमानशून्य होनेके कारण ] मानो कुछ नहीं जानती, इसी प्रकार सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करती थी, सबकी आश्रय होकर भी किसीका आधार¹ नहीं थी तथा सबकी आधार होते हुए भी स्वयं निराधार² थी ॥ १०९ ॥ वह सर्वरूप होकर भी स्वयं रूपहीन थी, सबसे संयुक्त होनेपर भी सर्वथा असंयुक्त³ ( असंग ) थी और सर्वत्र भासमान होनेपर भी किसी- के द्वारा कभी जानी नहीं जा सकती थी ॥ ११० ॥ १. शुद्धचितिमें ही सबका भास होता है, इसलिये वह सबका आश्रय तो है किन्तु वास्तवमें उसमें किसीकी सत्ता नहीं है इसलिये उसे किसी आधेयका आधार नहीं कह सकते । २. सब उसीमें भासते हैं इसलिये वह सबका आधार है परन्तु उसका कोई अन्य प्रकाशक नहीं है, वह स्वयंप्रकाश है, इसलिये निराधार है । ३. क्योंकि उससे भिन्न किसीकी सत्ता ही नहीं है ।