त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः। ७१ शून्याख्यया पोषिता च मूढेन श्वशुरेण च। तथा सपत्न्या चपलाख्ययात्यन्तं समेधिता ॥ १०१ ॥ अस्थिरं स्ववशे चक्रे पतिं तत्पुरसंस्थिता। सखीप्रीत्या तत्र चाहमवसं तत्परा सती ॥ १०२ ॥ सखीदुःखाद्धतप्राया सर्वेषां रक्षणोद्यता। यद्यहं तत्र न स्यां वै क्षणमात्रमपि प्रिय ॥ १०३ ॥ न भवेत्तत्र चैकोऽपि मया सर्वं हि रक्षितम्। शून्या शून्यतां प्राप्ता मूढेन मूढतामपि ॥ १०४ ॥ अस्थिरेणास्थिरत्वञ्च चापल्यं चपलायुता। ज्वालामुखाज्ज्वलत्ताञ्च निन्द्यवृत्तात्तदात्मताम् ॥ १०५ ॥ सखीसंयोगतश्चैवमभवन्तत्तदाकृतिः। सखीं यदि विमुञ्चामि सा नश्येत् क्षणमात्रतः ॥ १०६ ॥ अपने शून्यसंज्ञक मूढ श्वशुरसे वह खूब पोषित हुई तथा चपला नामकी सौतने भी उसका अच्छी तरह पोषण किया ॥ १०१ ॥ उस पुरमें रहकर उसने अपने पति अस्थिरको पूर्णतया अपने अधीन कर लिया। सखीके प्रेमवश मैं भी उसके अनुकूल रहकर उसी स्थानपर बनी रही ॥ १०२ ॥ सखीके दुःखसे यद्यपि मैं प्रायः मर-सी गयी थी, तो भी मैं सबकी रक्षा करती रहती थी। प्यारे! यदि मैं वहाँ एक क्षण भी न रहती तो उनमेंसे एक भी न बचता; मैंने ही उन सबको बचाये रखा १ ॥ १०३-१०४ पू० ॥ मैं शून्या (अविद्या) के सम्पर्कसे शून्यरूप, मूढके संगसे मूढ- रूप, अस्थिरके साथसे अस्थिरस्वरूप, चपलाके सहवाससे चप- लतारूप, ज्वालामुखके कारण ज्वलनरूप और निन्द्यवृत्तके तादात्म्य- से तद्रूप हो गयी थी ॥ १०४ उ०-१०५ ॥ इस प्रकार सखीका संयोग रहनेसे मुझे ये सब आकार धारण करने पड़े। यदि मैं सखीको छोड़ देती तो वह एक क्षणमें ही मर जाती ॥ १०६ ॥ १. क्योंकि जीवात्माके रहनेपर ही ये सब जीवित रहते हैं।