भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं बहूनि वर्षाणि सख्या दुःखेन दुःखिता । अस्थिरोऽभूदस्वतन्त्रो महाशनापरिग्रहात् ॥ ९५ ॥ पुरं प्राप दशद्वारं केनचित् कर्मणा क्वचित् । तस्मिन्महाशनायुक्तो पुत्रैर्मात्रादिभिर्युतः ॥ ९६ ॥ न्यवसत् स सुखप्रेप्सुर्दुःखं भुञ्जन् दिवानिशम् । पुत्राभ्यां दग्धसर्वाङ्गो निन्दितश्चानुवासरम् ॥ ९७ ॥ इतस्ततः समाकृष्टः प्रियाभ्यां सर्वदा हि सः । पुत्राणां पञ्चभवनं प्रविशन् निविशन्नपि ॥ ९८ ॥ अत्यन्तं श्रान्तिमायाति न सुखं लभते क्वचित् । एवं पुत्रस्य दुःखेन सखी मेऽत्यन्तदुःखिता ॥ ९९ ॥ अभून्मूर्च्छितकल्पा सा एवं तत्पुर आवसत् । ज्वालामुखनिन्द्यवृत्तयुता या सा महाशना ॥ १०० ॥ इस प्रकार अनेकों वर्षोंतक मैं अपनी सखीके दुःखसे दुःखित रही। इधर अस्थिर महाशनाके जालमें फँसकर बिलकुल पराधीन हो गया ॥ ९५ ॥ किसी कर्मवश एक दिन वह दस द्वारवाले एक नगरमें जा पहुँचा। उसमें वह महाशना-सहित अपनी माता और पुत्रादिके साथ रहने लगा। वहाँ रहकर वह पाना तो सुख चाहता था, परन्तु रात-दिन भोगना पड़ता था उसे दुःख ही ॥ ९६-९७ पू० ॥ अपने दो प्रिय पुत्रोंके द्वारा नित्यप्रति इधर-उधर आकर्षित होकर उसे सर्वाङ्गमें दाह और लोकनिन्दाका सामना करना पड़ता। तथा दूसरे पुत्रोंके पाँच निवासस्थानोंमें जाने-आनेसे अत्यन्त थकान हो जाती। सुख उसे कभी नहीं मिलता था ॥ ९७ उ०-९९ पू० ॥ इस प्रकार पुत्रके दुःखसे मेरी सखी भी अत्यन्त दुःखित होकर मूर्च्छित-सी हो गयी। इस तरह अपने पुत्र ज्वालामुख और निन्द्यवृत्तके साथ वह महाशना उस पुरमें रहने लगी ॥ ९९ उ०-१०० ॥ १. शरीर।