भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

पञ्चमोऽध्यायः । ६६ महाशनायामासक्तः संश्लिष्यति यदास्थिरः । तदा ज्वालामुखज्वालालीढसर्वकलेवरः ॥ ८९ ॥ अस्थिरः पीडितोऽत्यन्तं गाढमूर्छामुपेति हि । कदाचिन्निन्यवृत्तेन सङ्गतः प्रियसूनुना ॥ ९० ॥ सर्वैर्निन्द्यतामेति मृततुल्यो हि जायते । एवं यदास्थिरो जातो दुःखभोगैकतत्परः ॥ ९१ ॥ तदा सखी मे स्वभावसती पुत्रेऽस्थिराह्वये । अतिवात्सल्यतस्तेन सङ्गता तस्य दुःखतः ॥ ९२ ॥ दुःखभारसमाक्रान्ता निन्यवृत्तेन सङ्गता । ज्वालामुखेन च तथा पौत्रेणाश्लेषिता सती ॥ ९३ ॥ सुदग्धा निन्दिता लोकैर्मृतप्राया बभूव ह । तां सदानुगता चाहं लुप्तप्रायाभवं प्रिय ॥ ९४ ॥ अस्थिर महाशनामें अत्यन्त आसक्त होकर जब उसका आलिंगन करता तो कभी तो ज्वालामुखकी ज्वालाओंसे सारा शरीर व्याप्त हो जाने के कारण अत्यन्त पीडित होता और उसे गहरी मूर्च्छा हो जाती। तथा कभी प्रिय पुत्र निन्यवृत्तका सम्पर्क होनेपर सबकी निन्दाका पात्र बनकर मृतकतुल्य हो जाता ॥ ८६-६१ पू० ॥ इस प्रकार अस्थिर सर्वदा केवल दुःखभोगमें ही डूबा रहने लगा। तब स्वभावसे ही सनी मेरी सखीका भी अपने पुत्र अस्थिरमें अत्यन्त स्नेह होनेके कारण उससे तादात्म्य हो गया। अतः उसके दुःखसे वह भी दुःखाक्रान्त हो गयी। क्रमशः निन्यवृत्त और ज्वालामुखसे भी उनका सम्पर्क बढ़ा और उन पौत्रोंके संस्पर्श से उसे जो दाह और लोकनिन्दा मिली उससे वह मृतप्राय हो गयी। मैं तो सदा उसीके अनुरूप रहती थी, अतः प्रियतम ! उसके साथ मानो मैं भी लुप्त हो गयी ॥ ६१ उ०-६४ ॥ १. अर्थात् जब जीवकी उपाधिवृद्धि रजोगुण-तमोगुणरूप लोभ एवं क्रोधसे व्याप्त हो गया तो चित्स्वरूपका भान न होनेके कारण मानो जीवात्मा लुप्त हो गया।