त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पञ्चमोऽध्यायः । ६६ महाशनायामासक्तः संश्लिष्यति यदास्थिरः । तदा ज्वालामुखज्वालालीढसर्वकलेवरः ॥ ८९ ॥ अस्थिरः पीडितोऽत्यन्तं गाढमूर्छामुपेति हि । कदाचिन्निन्यवृत्तेन सङ्गतः प्रियसूनुना ॥ ९० ॥ सर्वैर्निन्द्यतामेति मृततुल्यो हि जायते । एवं यदास्थिरो जातो दुःखभोगैकतत्परः ॥ ९१ ॥ तदा सखी मे स्वभावसती पुत्रेऽस्थिराह्वये । अतिवात्सल्यतस्तेन सङ्गता तस्य दुःखतः ॥ ९२ ॥ दुःखभारसमाक्रान्ता निन्यवृत्तेन सङ्गता । ज्वालामुखेन च तथा पौत्रेणाश्लेषिता सती ॥ ९३ ॥ सुदग्धा निन्दिता लोकैर्मृतप्राया बभूव ह । तां सदानुगता चाहं लुप्तप्रायाभवं प्रिय ॥ ९४ ॥ अस्थिर महाशनामें अत्यन्त आसक्त होकर जब उसका आलिंगन करता तो कभी तो ज्वालामुखकी ज्वालाओंसे सारा शरीर व्याप्त हो जाने के कारण अत्यन्त पीडित होता और उसे गहरी मूर्च्छा हो जाती। तथा कभी प्रिय पुत्र निन्यवृत्तका सम्पर्क होनेपर सबकी निन्दाका पात्र बनकर मृतकतुल्य हो जाता ॥ ८६-६१ पू० ॥ इस प्रकार अस्थिर सर्वदा केवल दुःखभोगमें ही डूबा रहने लगा। तब स्वभावसे ही सनी मेरी सखीका भी अपने पुत्र अस्थिरमें अत्यन्त स्नेह होनेके कारण उससे तादात्म्य हो गया। अतः उसके दुःखसे वह भी दुःखाक्रान्त हो गयी। क्रमशः निन्यवृत्त और ज्वालामुखसे भी उनका सम्पर्क बढ़ा और उन पौत्रोंके संस्पर्श से उसे जो दाह और लोकनिन्दा मिली उससे वह मृतप्राय हो गयी। मैं तो सदा उसीके अनुरूप रहती थी, अतः प्रियतम ! उसके साथ मानो मैं भी लुप्त हो गयी ॥ ६१ उ०-६४ ॥ १. अर्थात् जब जीवकी उपाधिवृद्धि रजोगुण-तमोगुणरूप लोभ एवं क्रोधसे व्याप्त हो गया तो चित्स्वरूपका भान न होनेके कारण मानो जीवात्मा लुप्त हो गया।
७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं बहूनि वर्षाणि सख्या दुःखेन दुःखिता । अस्थिरोऽभूदस्वतन्त्रो महाशनापरिग्रहात् ॥ ९५ ॥ पुरं प्राप दशद्वारं केनचित् कर्मणा क्वचित् । तस्मिन्महाशनायुक्तो पुत्रैर्मात्रादिभिर्युतः ॥ ९६ ॥ न्यवसत् स सुखप्रेप्सुर्दुःखं भुञ्जन् दिवानिशम् । पुत्राभ्यां दग्धसर्वाङ्गो निन्दितश्चानुवासरम् ॥ ९७ ॥ इतस्ततः समाकृष्टः प्रियाभ्यां सर्वदा हि सः । पुत्राणां पञ्चभवनं प्रविशन् निविशन्नपि ॥ ९८ ॥ अत्यन्तं श्रान्तिमायाति न सुखं लभते क्वचित् । एवं पुत्रस्य दुःखेन सखी मेऽत्यन्तदुःखिता ॥ ९९ ॥ अभून्मूर्च्छितकल्पा सा एवं तत्पुर आवसत् । ज्वालामुखनिन्द्यवृत्तयुता या सा महाशना ॥ १०० ॥ इस प्रकार अनेकों वर्षोंतक मैं अपनी सखीके दुःखसे दुःखित रही। इधर अस्थिर महाशनाके जालमें फँसकर बिलकुल पराधीन हो गया ॥ ९५ ॥ किसी कर्मवश एक दिन वह दस द्वारवाले एक नगरमें जा पहुँचा। उसमें वह महाशना-सहित अपनी माता और पुत्रादिके साथ रहने लगा। वहाँ रहकर वह पाना तो सुख चाहता था, परन्तु रात-दिन भोगना पड़ता था उसे दुःख ही ॥ ९६-९७ पू० ॥ अपने दो प्रिय पुत्रोंके द्वारा नित्यप्रति इधर-उधर आकर्षित होकर उसे सर्वाङ्गमें दाह और लोकनिन्दाका सामना करना पड़ता। तथा दूसरे पुत्रोंके पाँच निवासस्थानोंमें जाने-आनेसे अत्यन्त थकान हो जाती। सुख उसे कभी नहीं मिलता था ॥ ९७ उ०-९९ पू० ॥ इस प्रकार पुत्रके दुःखसे मेरी सखी भी अत्यन्त दुःखित होकर मूर्च्छित-सी हो गयी। इस तरह अपने पुत्र ज्वालामुख और निन्द्यवृत्तके साथ वह महाशना उस पुरमें रहने लगी ॥ ९९ उ०-१०० ॥ १. शरीर।
पञ्चमोऽध्यायः। ७१ शून्याख्यया पोषिता च मूढेन श्वशुरेण च। तथा सपत्न्या चपलाख्ययात्यन्तं समेधिता ॥ १०१ ॥ अस्थिरं स्ववशे चक्रे पतिं तत्पुरसंस्थिता। सखीप्रीत्या तत्र चाहमवसं तत्परा सती ॥ १०२ ॥ सखीदुःखाद्धतप्राया सर्वेषां रक्षणोद्यता। यद्यहं तत्र न स्यां वै क्षणमात्रमपि प्रिय ॥ १०३ ॥ न भवेत्तत्र चैकोऽपि मया सर्वं हि रक्षितम्। शून्या शून्यतां प्राप्ता मूढेन मूढतामपि ॥ १०४ ॥ अस्थिरेणास्थिरत्वञ्च चापल्यं चपलायुता। ज्वालामुखाज्ज्वलत्ताञ्च निन्द्यवृत्तात्तदात्मताम् ॥ १०५ ॥ सखीसंयोगतश्चैवमभवन्तत्तदाकृतिः। सखीं यदि विमुञ्चामि सा नश्येत् क्षणमात्रतः ॥ १०६ ॥ अपने शून्यसंज्ञक मूढ श्वशुरसे वह खूब पोषित हुई तथा चपला नामकी सौतने भी उसका अच्छी तरह पोषण किया ॥ १०१ ॥ उस पुरमें रहकर उसने अपने पति अस्थिरको पूर्णतया अपने अधीन कर लिया। सखीके प्रेमवश मैं भी उसके अनुकूल रहकर उसी स्थानपर बनी रही ॥ १०२ ॥ सखीके दुःखसे यद्यपि मैं प्रायः मर-सी गयी थी, तो भी मैं सबकी रक्षा करती रहती थी। प्यारे! यदि मैं वहाँ एक क्षण भी न रहती तो उनमेंसे एक भी न बचता; मैंने ही उन सबको बचाये रखा १ ॥ १०३-१०४ पू० ॥ मैं शून्या (अविद्या) के सम्पर्कसे शून्यरूप, मूढके संगसे मूढ- रूप, अस्थिरके साथसे अस्थिरस्वरूप, चपलाके सहवाससे चप- लतारूप, ज्वालामुखके कारण ज्वलनरूप और निन्द्यवृत्तके तादात्म्य- से तद्रूप हो गयी थी ॥ १०४ उ०-१०५ ॥ इस प्रकार सखीका संयोग रहनेसे मुझे ये सब आकार धारण करने पड़े। यदि मैं सखीको छोड़ देती तो वह एक क्षणमें ही मर जाती ॥ १०६ ॥ १. क्योंकि जीवात्माके रहनेपर ही ये सब जीवित रहते हैं।
७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मां सङ्गतेन तेषां वै समाहुर्व्यभिचारिणीम् । जना मूढा सर्व एव कुशला निर्मलां विदुः ॥ १०७ ॥ महासती मे जननी विशुद्धा निर्मलाकृतिः । आकाशादपि विस्तीर्णा सूक्ष्मा च परमाणुतः ॥ १०८ ॥ सर्वज्ञानाप्यकिञ्चिज्ज्ञा सर्वकर्त्र्यपि निष्क्रिया । सर्वाश्रयाप्यनाधारा सर्वाधाराप्यनाश्रिता ॥ १०९ ॥ सर्वरूपाप्यरूपा सा सर्वयुक्ताप्यसंयुता । सर्वत्र भासमानापि न ज्ञेया केनचित् क्वचित् ॥ ११० ॥ उनकी संगतिके कारण ही मूढ पुरुष तो मुझे व्यभिचारिणी कहने लगे थे। परन्तु जो कुशल (विवेकी) पुरुष थे वे सब मुझे निर्दोष ही समझते थे ॥ १०७ ॥ मेरी माता परम सती थी। वह मानसिक और शारीरिक दोषों- से शून्य, आकाशसे भी अधिक विस्तीर्ण और परमाणुसे भी सूक्ष्म थी ॥ १०८ ॥ वह सब कुछ जानती थी, तथापि [ अभिमानशून्य होनेके कारण ] मानो कुछ नहीं जानती, इसी प्रकार सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करती थी, सबकी आश्रय होकर भी किसीका आधार¹ नहीं थी तथा सबकी आधार होते हुए भी स्वयं निराधार² थी ॥ १०९ ॥ वह सर्वरूप होकर भी स्वयं रूपहीन थी, सबसे संयुक्त होनेपर भी सर्वथा असंयुक्त³ ( असंग ) थी और सर्वत्र भासमान होनेपर भी किसी- के द्वारा कभी जानी नहीं जा सकती थी ॥ ११० ॥ १. शुद्धचितिमें ही सबका भास होता है, इसलिये वह सबका आश्रय तो है किन्तु वास्तवमें उसमें किसीकी सत्ता नहीं है इसलिये उसे किसी आधेयका आधार नहीं कह सकते । २. सब उसीमें भासते हैं इसलिये वह सबका आधार है परन्तु उसका कोई अन्य प्रकाशक नहीं है, वह स्वयंप्रकाश है, इसलिये निराधार है । ३. क्योंकि उससे भिन्न किसीकी सत्ता ही नहीं है ।
पञ्चमोऽध्यायः। ७३ महानन्दाप्यनानन्दा मातापितृविवर्जिता । मादृशयस्तनयास्तस्याः सन्ति संख्याविवर्जिताः ॥ १११ ॥ यथा तरङ्गा जलधेरसंख्यः सोदरीगणः । सर्वास्ता मत्समाचारा राजपुत्र भवन्ति वै ॥ ११२ ॥ महामन्त्रवती चाहं सर्वैरेतैः सखीगणैः । सङ्गता तत्परा चापि मातृतुल्या स्वरूपतः ॥ ११३ ॥ अस्मिन् पुरे सखीपुत्रो यदा श्रान्तो भवत्यलम् । तदा मातुः समुत्सङ्गेऽस्थिरः शेते सुनिर्भरम् ॥ ११४ ॥ अस्थिरस्तु यदा सुप्तस्तदा तस्य सुतादयः । स्वापं समधिगच्छन्ति नान्यो जागर्ति कश्चन ॥ ११५ ॥ तदा तद्रक्षति पुरमस्थिरस्य प्रियः सखा । प्रचाराख्यः प्रतिचरन् पूर्वद्वारयुगे मुहुः ॥ ११६ ॥ वह परमानन्दमयी होनेपर भी निरानन्द१ तथा माता-पितासे रहित थी। हाँ, मेरी-जैसी उसकी अगणित सन्तानें अवश्य थीं ॥ १११ ॥ जिस प्रकार समुद्रकी तरंगें होती हैं उसी प्रकार मेरी अगणित बहिनें थीं। राजकुमार ! वे सब मेरे ही समान आचरणवाली हैं ॥ ११२ ॥ मैं बड़ी भारी मन्त्रशक्तिसे सम्पन्न हूँ, इसीसे इन सब सखियोंके साथ उन्हींके अनुकूल रहते हुए भी स्वरूपतः अपनी माताके समान निर्मलस्वभाव ही रहती हूँ ॥ ११३ ॥ इस पुरमें जब मेरी सखीका पुत्र अस्थिर बहुत थक जाता तो वह निश्चिन्त होकर अपनी माँकी गोदमें सो जाता ॥ ११४ ॥ जब अस्थिर सो जाता तो उसके पुत्रादि भी निद्रादेवीकी गोदमें चले जाते। फिर और कोई भी जगा न रहता ॥ ११५ ॥ उस समय अस्थिरका प्रचार नामक प्रिय सखा३ पूर्वके दोनों द्वारों४ में आते-जाते इस नगरकी रक्षा करता ॥ ११६ ॥ १. स्वरूपतः आनन्दस्वरूपा होनेपर भी कोई निमित्त न होनेके कारण उसमें आनन्दका आविर्भाव नहीं होता। २. अघटितघटनापटीयसी मायाशक्तिसे । ३. प्राण । ४. दोनों नासिकारन्ध्रोंमें ।
७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अस्थिरस्यापि या माता सखी मे तनयेन सा । तस्याः सखी च या श्वश्रूरसती या स्वभावतः ॥ ११७ ॥ सा समाच्छाद्य तान् सर्वान् पुत्रेण सह रक्षति । एवं सर्वेषु सुप्तेषु प्राप्य स्वां मातरं तदा ॥ ११८ ॥ आनन्दिताहं भवामि मात्राश्लिष्टा चिरं ननु । पुनस्तानुत्थितान् शीघ्रमनुसंधामि चान्वहम् ॥ ११९ ॥ अस्थिरस्य सखा योऽयं प्रचाराख्यो महाबलः । स सर्वानस्थिरमुखान् पोषयत्यनुवासरम् ॥ १२० ॥ स एको बहुधा भूत्वा पुरञ्च पुरवासिनः । व्याप्य रक्षत्यनुदिनं सर्वान् संश्लेषयत्यपि ॥ १२१ ॥ तं विना ते हि विश्लिष्टा नष्टाः स्युरपि सर्वथा । सूत्रेण हीना मणयो मालाबद्धा यथा पृथक् ॥ १२२ ॥ अस्थिरकी माता मेरी सखी भी अपने पुत्रके साथ निद्राके वशीभूत हो जाती । उस अवस्था में उसकी सखी, जो उसकी असत्स्व- भाववाली सास भी थी, अपने पुत्रके सहित उन सबको आच्छादित करके उनकी रक्षा करती थी ॥ ११७-११८ पू० ॥ इस प्रकार जब सब सो जाते तो मैं अपनी माताके पास जाती और चिरकालतक उसका आलिंगन पाकर आनन्दमग्न हो जाती थी । फिर जब वे सब उठते तो नित्यप्रति तुरन्त ही मैं भी उनसे तादात्म्य स्थापित कर लेती ॥ ११८ उ०-११९ ॥ अस्थिरका जो यह महाबली प्रचार नामक सखा था वह नित्यप्रति अस्थिर आदि सभी परिवारका पोषण करता था ॥ १२० ॥ वह एक ही अनेकरूप होकर उस नगर और नगरनिवासियोंमें व्याप्त हो जाता, नित्यप्रति सबकी रक्षा करता और सबका अपने-अपने विषयोंसे सम्पर्क कराता ॥ १२१ ॥ उसके बिना तो वे सब इसी प्रकार छिन्न-भिन्न होकर सर्वथा नष्ट १. अविद्या या शून्या । २. मोह । ३. सुषुप्तिमें जीवका अपने शुद्धस्वरूप या शुद्धचितिसे संयोग हो जाता है; जैसा कि यह श्रुति कहती है—'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति।'
पञ्चमोऽध्यायः । ७५ स एव माञ्च सङ्गम्य सर्वैः संयोजयत् पुरम् । मया संजीवितोऽत्यन्तं सूत्रधारो हि तत्पुरे ॥ १२३ ॥ जीर्णे तु तत्पुरे चान्यत् पुरं तान्नयति द्रुतम् । एवं प्रचारं संश्रित्य पुराणामधिपोऽभवत् ॥ १२४ ॥ बहूनामस्थिरो नूनं विचित्राणां क्रमेण वै । सतीपुत्रोऽप्यस्थिरः स संश्रितोऽपि महाबलम् ॥ १२५ ॥ मया च भावितोऽत्यन्तं सर्वथा दुःखभागभूत् । चपलामहाशनाभ्यां पत्नीभ्यां सुसमागमत् ॥ १२६ ॥ ज्वालामुखनिन्द्यवृत्ताभिधपुत्रयुगेन च । अन्यैः पुत्रैः पञ्चभिः स सर्वत्राभिविकर्षितः ॥ १२७ ॥ महाक्लेशपरीतात्मा सुखलेशविवर्जितः । इतस्ततः क्वचित् पुत्रैः पञ्चभिः स विकर्षितः ॥ १२८ ॥ हो जाते जैसे मालामें पिरोये हुए मनके तागा न रहनेपर बिखर जाते हैं ॥ १२२ ॥ मेरे साथ मिलकर वह प्रचार ही सबके साथ उस पुरका संयोग कराता है तथा मेरे द्वारा अनुप्राणित होकर वही उस पुरमें सबको प्रेरित करनेवाला प्रधान सूत्रधार है ॥ १२३ ॥ जब वह नगर बहुत जीर्ण हो जाता है, तो वही उन सबको तुरन्त दूसरे नगरमें ले जाता है। इस प्रकार प्रचारका आश्रय पाकर अस्थिर क्रमशः तरह-तरहके अनेकों नगरोंका स्वामी हो गया ॥ १२४-१२५ पू० ॥ अस्थिर साध्वी माताका पुत्र था, उसे महाबली प्रचारका आश्रय प्राप्त था और मेरे द्वारा भी उसका पोषण होता था, तथापि वह सब प्रकार दुःखका ही भागी रहा ॥ १२५ उ०-१२६ पू० ॥ उसका चपला और महाशना दो पत्नियोंसे समागम रहा तथा ज्वालामुख और निन्द्यवृत्त इन दो एवं अन्य पाँच पुत्रोंके द्वारा सब ओर उसकी खींच-तान रही ॥ १२६ उ०-१२७ ॥ इससे उसका हृदय अत्यन्त क्लेशमें डूबा रहा, सुख तो लेशमात्र भी उसे नहीं मिला। कभी तो उसके पाँचों पुत्र उसे इधर-उधर घसीटते ॥ १२८ ॥
७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे क्वचिच्चपलायात्यन्तं चालितः खेदमीयिवान् । क्वचिन्महाशनाहेतोरशनाथें प्रधावति ॥ १२९ ॥ क्वचिज्ज्वालामुखाक्षिप्तो निर्दग्धापादमस्तकः । महामूर्च्छां समायाति चाविदंस्तत्प्रतिक्रियाम् ॥ १३० ॥ निन्द्यवृत्तं क्वचित् प्राप्य गर्हितो भर्त्सितः परैः । मृततुल्यं स्वमात्मानं मन्यते शोकसन्ततः ॥ १३१ ॥ दुष्टपत्नीपुत्रसहितो मोहितो दुष्कुलोद्भवः । पत्नीपुत्रैः समाक्रान्तो नीयमानस्तु तैः सदा ॥ १३२ ॥ उवास तैर्विचित्रेषु पुरेषूच्चावचेषु हि । क्वचित् कान्तारकीर्णेषु क्रव्यादाकुलभूमिषु ॥ १३३ ॥ क्वचिदत्यन्ततप्तेषु क्वचिच्छीतजडेषु च । क्वचित् पूतिवहास्थेषु क्वचिद्गाढतमःसु च ॥ १३४ ॥
कभी चपलाके कारण अत्यन्त चंचल होकर उसे महान् दुःख मिलता, कभी महाशनाके कारण वह उसके भोगोंके लिये दौड़-धूप करता रहता ॥ १२९ ॥ कभी ज्वालामुखकी लपेटमें आ जानेसे उसे एड़ीसे चोटीतक ऐसा दाह होता कि घोर मूर्च्छा हो जाती और उसकी कोई चिकित्सा भी न सूझती ॥ १३० ॥ कभी निन्द्यवृत्तका सम्पर्क होनेपर दूसरोंके द्वारा उसे निन्दा और अपमान सहने पड़ते; जिनके कारण शोकाकुल होकर वह अपनेको मृतकतुल्य ही समझता ॥ १३१ ॥ उन दुष्ट पत्नी और पुत्रोंके साथ वह दुष्ट कुलमें उत्पन्न हुआ अस्थिर पत्नी और पुत्रोंसे घिरा तथा सर्वदा उन्हींके द्वारा ले जाया जाता अनेकों प्रकारकी ऊँच-नीच पुरियोंमें रहा ॥ १३२-१३३ पू० ॥ कभी वह वनोंसे व्याप्त एवं मांसभक्षी जीवोंसे पूर्ण भूमियोंमें, कभी अत्यन्त तप्त और कभी शीतसे ठिठुरा देनेवाले प्रदेशोंमें, तथा कभी गन्दी नालियों और कभी घोर अन्धकारमें भटकता रहा ॥ १३३ उ०-१३४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । ७७ एवं भूयोऽतिदुःखेन दुःखितं तनयेऽस्थिरे । सखी च मे दुःखमूढाऽभवद् दुःसङ्गता सदा ॥ १३५ ॥ स्वभावसत्त्वपि मृषा तामन्वहमपि प्रिय । मूढेवात्यन्तमभवं तत्कुटुम्बपरायणा ॥ १३६ ॥ को हि दुःसङ्गतः सौख्यं प्राप्नुयाल्लेशतः क्वचित् । गच्छन् मरुस्थले ग्रीष्मे तृष्णाशान्तिं ययौ नरः ॥ १३७ ॥ एवं चिरतरे काले संवृत्ते मम सा सखी । मोहितात्यन्तखेदेन मया रहसि सङ्गता ॥ १३८ ॥ मदेकसङ्गाद्युक्तिं सा प्राप्यासाद्य च सत्पतिम् । जित्वा स्वतनयं हत्वा बद्ध्वा तत्तनयादिकान् ॥ १३९ ॥ इस प्रकार दुःसंगमें पड़ी मेरी सखी अपने पुत्र अस्थिरके अत्यन्त दुःखसे आतुर होनेपर स्वयं भी सर्वदा दुःखविमूढ रहने लगी ॥ १३५ ॥ प्रियतम ! मैं यद्यपि स्वभावसे तो शुद्ध थी, परन्तु उसके कुटुम्ब की अनुगामिनी होनेके कारण उसके साथ व्यर्थ ही अत्यन्त मूढ-सी हो गयी ॥ १३६ ॥ भला दुःसंगमें पड़कर ऐसा कौन है जो कभी सुख प्राप्त कर सके ? ग्रीष्म ऋतुमें मरुस्थलमें जाकर भी क्या किसी व्यक्तिकी प्यास बुझी है ? ॥ १३७ ॥ इस प्रकार बहुत समय बीत जानेपर जब मेरी वह सखी अत्यन्त खेदसे खिन्न हो गयी तो एक दिन एकान्तमें मुझसे मिली ॐ ॥ १३८ ॥ एकमात्र मेरा ही संग होनेपर उसे जो युक्ति¹ मिली उससे उसने एक सत्पति² प्राप्त किया । फिर [उसकी सहायतासे] उसने अपने पुत्र अस्थिरको जीता तथा उसके पुत्रादिमेंसे किन्हींको³ मार डाला और किन्हींको⁴ बाँध लिया ॥ १३९ ॥ ॐ 'एकान्त में' अर्थात् विषयावभाससे रहित हो 'मुझसे मिली' अर्थात् शुद्ध चिदाकार हो गयी । १. वैराग्य । २. विवेक । ३. क्रोध और लोभको । ४. पाँच ज्ञानेन्द्रियोंको ।
७८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मया सङ्गम्य मन्मातृपुरमासादयद् द्रुतम् । मन्मातरं परिष्वज्य मुहुर्मुहुरकल्मषा ॥ १४० ॥ आनन्दार्णवनिर्मग्नस्वभावाऽभवदञ्जसा । एवं त्वमपि दुर्वृत्तं निगृह्य सखिसम्भवम् ॥ १४१ ॥ प्राप्य स्वमातरं नाथ सुखं नित्यं समाप्नुहि । एतत्ते कथितं नाथ स्वानुभूतं सुखास्पदम् ॥ १४२ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने वन्ध्याख्यायिका पञ्चमोऽध्यायः । मेरा साथ होनेपर वह तुरन्त ही मेरी माताके नगरमें आ गयी और मेरी माताका पुनः पुनः आलिंगन करके निष्पाप हो गयी ॥१४०॥ फिर तो सहज ही में उसका आनन्दसमुद्रमें मग्न रहनेका स्वभाव हो गया। हे नाथ ! इसी प्रकार आप भी मेरी सखीके दुराचारी पुत्रका दमन करके अपनी मातासे भेंट कर नित्य सुख प्राप्त करें। स्वामिन् ! यह मैंने अपने अनुभव किये हुए सुखस्थानका वर्णन किया है ॥ १४१-१४२ ॥ पंचम अध्याय समाप्त । १. शुद्ध चित्स्वरूपमे स्थित हो गयी । २. वस' ३. शुद्धचिति ।
षष्ठोऽध्यायः एवं प्रियावचः श्रुत्वा हेमचूड़ोऽतिविस्मितः । हसन् पप्रच्छ तां कान्तामविद्वान् विदुषीं तदा ॥ १ ॥ प्रिये प्रोक्तं यदेतत्ते खचित्रमिव भाति मे । निरालम्बं················जानाम्येतदशेषतः ॥ २ ॥ नूनं तदप्सरोद्भूता ऋषिणा वर्द्धिता वने । संसृष्टयौवनाद्यापि न तारुण्यमलङ्कृता ॥ ३ ॥ वक्ष्यस्यनेकसाहस्रवर्षाणामिव संस्थितिम् । भूतग्रस्तोक्तिसदृशवचसा तेऽतिमात्रतः ॥ ४ ॥ असन्दर्भेण किमहं विबुद्ध्यामि यथार्थतः । वदते सा सखी क्वास्ते बद्धश्च सखि पुत्रकः ॥ ५ ॥ षष्ठ अध्याय ॥ ६ ॥ हेमचूड़का अविश्वास, हेमलता-द्वारा श्रद्धा-विश्वासकी प्रशंसा अपनी प्रियतमाके ऐसे वचन सुनकर हेमचूड़को बड़ा विस्मय हुआ । वह तत्त्वज्ञा है—यह बात वह नहीं जानता था । अतः उसने हँसकर उससे पूछा ॥ १ ॥ “प्रिये ! तुमने जो कुछ कहा है वह मुझे आकाशमें भासते हुए चित्रके समान जान पड़ता है । मैं तो इसे सर्वथा निराधार समझता हूँ ॥ २ ॥ तुम्हारा जन्म उस अप्सरासे ही तो हुआ है, और ऋषिजीने तुम्हें पाल-पोषके बड़ा किया है। अभी यौवनका तो तुम्हें स्पर्श ही हुआ है, हाँ, तरुणाई ( किशोरावस्था ) पूरी हो चुकी है ॥ ३ ॥ तो भी तुम अपनी सहस्रों वर्षोंकी स्थिति बतला रही हो । तुम्हारी बातोंसे तो तुम्हारा कथन बहुत-कुछ भूतग्रस्तोंका-सा जान पड़ता है ॥ ४ ॥ तुम्हारे कथनका कोई मेल नहीं है, फिर मैं ठीक-ठीक क्या समझूँ ? बताओ, तुम्हारी वह सखी कहाँ है और उसके द्वारा बाँधा हुआ उसका पुत्र कौन है ? ॥ ५ ॥
८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे पुराणि तानि वा कुत्र संस्थितानि तदीरय । अस्तु किं तेन वृत्तेन वद मे क्व च सा सखी ॥ ६ ॥ सखीं न प्राप्तवान् मातुरहं तत् प्रतिचारय । आर्यास्ति मेऽवरोधे स्वे पितुर्मेऽन्या नहि प्रिया ॥ ७ ॥ सा वा सखी मे कुत्रास्ते तत्पुत्रो वा वद द्रुतम् । मन्येऽहं ते वचो लोके वन्ध्यापुत्रसमाश्रयम् ॥ ८ ॥ यथाह कश्चिन्नटीको विदूषकवचोविधौ । वन्ध्यापुत्रः समारूढः प्रतिबिम्बमहारथम् ॥ ९ ॥ शुक्त्यारोपितहैरण्यभूषणैर्भूषिताङ्गकः । आयुधैर्नरशृङ्गोत्थैर्युद्ध्वा गगनकानने ॥ १० ॥ हत्वा भविष्यद्राजानं जित्वा गन्धर्वपत्तनम् । मरीचिस्रोतसि स्वाप्नकामिनीभिर्हि खेलति ॥ ११ ॥ यह भी बताओ, वे नगर कहाँ हैं। अथवा और सब बातें रहने दो, मुझे केवल इतना बता दो वह सखी कहाँ है ॥ ६ ॥ माताजीसे मुझे तो कोई सखी नहीं मिली। मेरी माताजी अपने महलमें हैं, तुम उनसे पूछ लो। उनसे भिन्न मेरे पिताजीकी कोई और स्त्री नहीं है ॥ ७ ॥ इसलिये शीघ्र ही बताओ मेरी वह सखी तथा उसका पुत्र कहाँ हैं ! मुझे तो तुम्हारी बात लोकमें वन्ध्यापुत्रके समान अलीक जान पड़ती है ॥ ८ ॥ [ तुम्हारा कथन ऐसा ही है ] जैसे विदूषककी भूमिकाका अभिनय करते समय कोई नाटकका पात्र कहे—"एक वन्ध्यापुत्र प्रतिबिम्बके महान् रथपर चढ़ा हुआ है ! ९ ॥ उसने सीपीमें आरोपित सुवर्णके आभूषणोंसे अपने सब अंग सजाये हुए हैं। मनुष्यके सींगोंसे बने हुए शस्त्रोंसे आकाशमें प्रतीत होनेवाले वनमें युद्ध करके उसने एक भावी राजाका वध किया और गन्धर्वनगरको जीतकर मरुमरीचिकाके स्रोतमें स्वप्नकी स्त्रियोंके साथ क्रीडा कर रहा है ॥ १०-११ ॥
षष्ठोऽध्यायः । ८१ तथा तव वचो मन्ये सर्वथाऽसङ्गतं ननु । श्रुत्वैवं प्रियवाक्यं सा चतुरा प्राह तं पुनः ॥ १२ ॥ नाथ प्रोक्तं मया यत्ते तत् कथं स्यादपार्थकम् । न मादृशानां वचनं निरालम्बं क्वचिद्भवेत् ॥ १३ ॥ मृषा हि तपसां हन्त्री सत्यशीलेषु सा कुतः । तपस्विनां कुले कस्माच्छ्वित्रे सौन्दर्यवद्भवेत् ॥ १४ ॥ यो योजयति जिज्ञासुमन्यार्थेन ह्यसत्यतः । तस्य नोर्ध्वं न चाधस्ताल्लोकेऽस्ति सुखसाधनम् ॥ १५ ॥ शृणु राजसुतोक्तिं मे लोके तैमिरिकः क्वचित् । समदृष्टिं नैति शीघ्रमञ्जनानां वचोगणैः ॥ १६ ॥ असत्यमेव जानाति हितप्रोक्तं च मूढधीः । तत्त्वां प्रियाहं जिज्ञासुमसतैर्योजयामि किम् ॥ १७ ॥ मैं तो तुम्हारे कथनको इसी प्रकार सर्वथा असंगत मानता हूँ।" प्रियतमकी यह बात सुनकर उस चतुर नारीने उससे पुनः कहा ॥ १२ ॥ "नाथ ! मैंने आपसे जो कुछ कहा है वह असंगत कैसे हो सकता है। मुझ-जैसों का भाषण निराधार कभी नहीं हो सकता ॥ १३ ॥ मिथ्या भाषण तो तपस्याको नष्ट करनेवाला है। तपस्वियोंके कुलमें उत्पन्न हुए सत्यनिष्ठ व्यक्तियोंमें वह कोढ़में सुन्दरताके समान कैसे रह सकता है ? ॥ १४ ॥ जो पुरुष असत्य बोलकर किसी जिज्ञासुको दूसरे विषयोंमें लगा देता है उसे ऊपर और नीचेके किसी लोकमें सुखकी उपलब्धि नहीं होती ॥ १५ ॥ राजकुमार ! मेरी बातपर ध्यान दो। देखो, लोकमें जिसे तिमिर रोग हो गया हो उसे अञ्जनवाचक शब्दोंको उच्चारण करनेसे ही शुद्ध दृष्टि नहीं मिल जाती ॥ १६ ॥ मूढबुद्धि पुरुष तो हितकी बातोंको भी असत्य ही समझते हैं। भला, आपकी प्रिया होकर भी आप जिज्ञासुको मैं असत्यके साथ कैसे जोड़ सकती हूँ ॥ १७ ॥ ६ त्रि० ज्ञा०
८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अप्यसत्यं मयोक्तं यत्तद्विमर्शय सद्धिया । लोके हि कुशलो मर्त्यः सर्वव्यवहृतौ ननु ॥ १८ ॥ परीक्ष्यैकांशतः सर्वमभिजानाति संस्थितिम् । निदर्शनं प्रदास्यामि तुभ्यमत्र समीक्ष्य ॥ १९ ॥ यः पुरा विषयः सर्वो बभूवाभीष्टसाधनम् । चिरान्मद्वचनात् सोऽद्य कुतो न सुखसाधनम् ॥ २० ॥ स एवाद्य साधयति सुखमन्येषु वै कुतः । एतन्निदर्शनेनैव स्वमतं वेत्तुमर्हसि ॥ २१ ॥ शृणु राजन् यदि वरं ऋज्व्या निर्मलया धिया । अनाश्वासो रिपुलोको भवेदाप्तोक्तिषु स्थिरः ॥ २२ ॥ श्रद्धा माता प्रपन्नं स वत्सलेव सुतं सदा । रक्षति प्रौढभीतिभ्यः सर्वथा नहि संशयः ॥ २३ ॥ यदि मेरी कही हुई बात झूठी भी हो तो भी आप अपनी सूक्ष्म बुद्धिसे इसपर विचार करें । लोकमें मनुष्य तो सभी प्रकारके व्यवहारमें कुशल होता है ॥ १८ ॥ वह केवल एक अंशकी ही परीक्षा करके सारी परिस्थितिको जान लेता है। विचार करनेके लिये आपको मैं एक अनुभवका स्मरण कराती हूँ ॥ १९ ॥ पहले चिरकालसे जो विषय आपके लिये सुखके साधन बने हुए थे, मेरी बातें सुनकर अब वे क्यों सुखदायक नहीं रहे ? ॥ २० ॥ वे ही इस समय भी दूसरोंको सुख क्यों देते हैं ? इतने अनुभवसे ही आप मेरे कथनके विषयमें अपना निर्णय समझ सकते हैं ॥ २१ ॥ राजन् ! जो श्रेष्ठ बचन है उसे सरल भावसे सुनिये । विश्वसनीय पुरुषोंके वचनोंमें विश्वास न करना—यह अपना पक्का शत्रु ही है॥ २२ ॥ श्रद्धा साक्षात् माता है। जो उसकी शरण लेता है वह स्नेहमयी अपने बच्चेकी तरह सर्वदा उसकी बड़ीसे बड़ी आपत्तियोंसे रक्षा करती है—इसमें सन्देह नहीं ॥ २३ ॥
षष्ठोऽध्यायः। ८३ आप्तेष्वश्रद्दधत् मूढं जहाति श्रीः सुखं यशः। स भवेत् सर्वतो हीनो यः श्रद्धारहितो नरः ॥ २४ ॥ श्रद्धा हि जगतां धात्री श्रद्धा सर्वस्य जीवनम् । अश्रद्धो मातृविषये बालो जीवेत् कथं वद ॥ २५ ॥ अश्रद्दधस्तरुणः पत्न्यां कथं स सुखमेधते । तथापत्येषु स्थविरः कथमीयात् सतीं गतिम् ॥ २६ ॥ अश्रद्धो वा भुवं कस्माद् विकर्षेत् कर्षकः किल । न प्रवृत्तिर्भवेत् क्वापि त्यागे वा सङ्ग्रहेऽपि वा ॥ २७ ॥ श्रद्धावैधुर्ययोगेन विनश्येज्जगतां स्थितिः। एकान्तग्रहणाल्लोकप्रवृत्तिरिति चेच्छृणु ॥ २८ ॥ एकान्तग्रहणे वापि श्रद्धा कस्मात् प्रतिष्ठिता । जो मूर्ख आप्तपुरुषोंमें श्रद्धा नहीं करता उसे श्री, सुख और यश त्याग देते हैं। जो पुरुष श्रद्धाहीन है वह सभी तरहसे हीन हो जाता है ॥ २४ ॥ श्रद्धा सम्पूर्ण संसारको धारण (पालन) करनेवाली है, श्रद्धा ही सबका जीवन है। बताइये, यदि मातापर विश्वास न हो तो बालक कैसे जीवित रहे ॥ २५ ॥ यदि युवा पुरुष अपनी पत्नीमें विश्वास न करें तो उसे सुख कैसे मिल सकता है और यदि वृद्धका बालकोंमें विश्वास न हो तो वह भी कैसे चैनसे रह सकता है ॥ २६ ॥ किसानको यदि [ आगामी धान्यप्राप्तिमें ] विश्वास न हो तो वह भूमिको कैसे जोतेगा ? विश्वास न होनेपर तो त्याग या संग्रह किसीमें भी प्रवृत्ति नहीं हो सकती ॥ २७ ॥ श्रद्धा या विश्वासका अभाव हो जानेपर तो जगत्की स्थिति ही नष्ट हो जायगी। यदि कहो कि संसारका व्यवहार तो व्याप्तिग्रहणसे होता है, तो सुनो ॥ २८ ॥ व्याप्तिग्रहणमें भी भला, क्यों विश्वास होता है [ क्योंकि समान १. जो बात एक परिस्थितिमें प्रत्यक्ष देखी जाती है, वैसी ही परिस्थिति आने पर वह उसी प्रकार होगी—इसका नाम ‘व्याप्तिग्रहण’ है।
८४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राप्येकान्तशरणः श्रद्धाशरण एव हि ॥ २९ ॥ तस्माच्छ्रद्धामृते लोकोऽवसीदेद्ध्वसन् ध्रुवम् । तस्माच्छ्रद्धां दृढां प्राप्य सुखमात्यन्तिकं व्रज ॥ ३० ॥ श्रद्धाऽवरे न कार्येति मन्यसे यदि तच्छृणु । इयञ्च श्रद्धयैवास्ते प्रवृत्तिर्नृपतेः सुत ॥ ३१ ॥ तत् कथं ते प्रवृत्तिः स्यादिति श्रुत्वा प्रियावचः । हेमचूडः प्राह पुनः प्रियां कुशलभाषिणीम् ॥ ३२ ॥ नूनं प्रिये सर्वथैव श्रद्धातव्यं यदा भवेत् । श्रद्धा सत्सु विधातव्या यथा श्रेयः समाप्नुयात् ॥ ३३ ॥ असत्सु नो विधातव्या श्रद्धा श्रेयोऽभिवाञ्छिना । अन्यथान्तः सुनिशिते कुटिले वडिशे यथा ॥ ३४ ॥ परिस्थितिमें परिणाम भी समान ही होगा—यह भी श्रद्धा या विश्वास ही है ।] वहाँ भी व्याप्तिग्रहणका आश्रय लेना तो श्रद्धाका आश्रय लेना ही है ॥ २९ ॥ अतः यह निश्चय है कि श्रद्धाके बिना तो श्वास लेते भी नहीं बनेगा और लोक नष्ट हो जायगा। इसलिये आप सुदृढ़ श्रद्धा सम्पादन करके आत्यन्तिक सुख प्राप्त करें ॥ ३० ॥ यदि आप सोचते हों कि [ स्त्री-मूर्ख आदि ] निकृष्ट व्यक्तियोंमें तो विश्वास नहीं करना चाहिये, तो राजकुमार ! सुनिये, आपकी ऐसी प्रवृत्ति भी तो विश्वासके आधारपर ही होती है। नहीं तो आपको ऐसा विचार भी कैसे हो सकता था।" अपनी प्रियाका ऐसा भाषण सुनकर हेमचूडने उस हितकर भाषण करनेवाली प्रियतमासे पुनः कहा ॥ ३१-३२ ॥ “प्रिये ! [ तुम्हारे कथनानुसार ] यदि श्रद्धा करना सर्वथा अनिवार्य ही हो तो भी सत्पुरुषोंमें ही श्रद्धा करनी चाहिये, जिससे कि श्रेयकी प्राप्ति हो ॥ ३३ ॥ जिसे श्रेयकी इच्छा हो उसे असत्पुरुषोंमें विश्वास नहीं करना चाहिये, नहीं तो बाहरसे सरल और भीतरसे टेढ़ी एवं तीक्ष्ण वडिश
षष्ठोऽध्यायः। ८५ बहिः समे सुपिष्टेन मीनानां नाशमाप्नुयात् । तस्मात् सत्स्वेव कर्त्तव्या श्रद्धा नासत्सु कुत्रचित् ॥ ३५ ॥ असत्सु कृत्वा श्रद्धां ये नाशमीयुः परेऽपि च । सत्सु श्रेयोयुजः श्रद्धावशतस्ते निदर्शनम् ॥ ३६ ॥ अतः प्रतीत्यैव युक्ता कर्तुं श्रद्धा न चान्यथा । तत् कथं ते प्रवृत्तिः स्यादिति प्रश्नः कथं तव ॥ ३७ ॥ इत्युक्ता हेमलेखा सा पुनराह पतिं प्रियम् । शृणु राजकुमारेदं प्रोच्यमानं मया वचः ॥ ३८ ॥ यदात्थ त्वं कथं प्रश्न इति तत्र ब्रवीमि ते । अथ सन् वा ह्यसन् वायमिति ते निश्चयः कुतः ॥ ३९ ॥ सत्यस्मिन् निश्चये भूयाच्छुभं सच्छ्रद्धयेह वै । सोऽपि लक्षणतः स्याच्चेच्छ्रद्धा लक्षणसङ्गता ॥ ४० ॥ (बंसी) पर विश्वास करनेवाली मछलियोंके समान नष्ट होनेका प्रसंग उपस्थित होगा। अतः सत्पुरुषोंपर ही श्रद्धा करे, किन्हीं भी असत्पुरुषोंपर नहीं ॥ ३४-३५ ॥ यह बात, असत्पुरुषोंपर श्रद्धा करनेसे जो नाशको प्राप्त हुए हैं और सत्पुरुषोंपर श्रद्धा करनेसे जो कल्याणके भागी हुए हैं, उन्हें सूचित करनेके लिये दृष्टान्तरूप है ॥ ३६ ॥ इसलिये पहले परखकर ही श्रद्धा करनी उचित है, अन्यथा नहीं। ऐसी स्थितिमें 'श्रद्धा किये बिना तुम्हारा व्यवहार कैसे हो सकता है' तुम्हारा यह प्रश्न कैसे सम्भव है ?" ॥ ३७ ॥ इस तरह पूछे जानेपर हेमलेखाने अपने प्रिय पतिसे पुनः कहा, “राजकुमार ! मैं जो बात कहती हूं वह सुनिये ॥ ३८ ॥ आपने जो कहा कि तुम्हारा प्रश्न कैसे हो सकता है, उसमें मेरा कथन यह है कि आप यह निश्चय कैसे करते हैं कि अमुक पुरुष अच्छा है या बुरा ॥ ३९ ॥ यह निश्चय हो जानेपर ही इस बातका निर्णय हो सकेगा कि सत्पुरुषमें श्रद्धा करनेसे ही हित हो सकता है। यदि कहें कि इसका निश्चय लक्षणोंसे होता है तब तो श्रद्धा लक्षणोंके अधीन हुई । [ अब यह प्रश्न होता है कि लक्षणोंका ज्ञान कैसे हो ? ] ॥ ४० ॥
८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्रमाणाल्लक्षणज्ञानमिति चेत्तत्र संशृणु । अश्रद्धस्य प्रमाणं किं भवेत्तत् सुनिरूप्यताम् ॥ ४१ ॥ अन्यथा हि प्रमाता नोऽविसंवाद्येत कुत्रचित् । तस्माच्छ्रद्धां समाश्रित्य लोकः सर्वः प्रवर्त्तते ॥ ४२ ॥ तत्प्रकारं प्रवक्ष्यामि शृणु निश्चलचेतसा । अनवस्थिततर्को वा ह्यतर्को वापि सर्वथा ॥ ४३ ॥ श्रेयो न प्राप्नुयाल्लोक इह वापि परत्र वा । तत्रातर्कस्य कालेन भवेच्छ्रेयः कदांचन ॥ ४४ ॥ अनवस्थिततर्कस्य न श्रेयः स्यात् कथञ्चन । पुरा सह्यगिरौ गोदावरीतीरे हि कौशिकः ॥ ४५ ॥ न्यवसच्छान्तसुमतिर्ज्ञातलोकः सतत्त्वकः । तस्य शिष्यास्तु शतशः स्थिता गुरुसमाश्रयात् ॥ ४६ ॥ यदि कहें कि लक्षणोंका ज्ञान [ शास्त्रवचन आदि ] प्रमाणसे हो सकता है, तो सुनिये। जिसे श्रद्धा है ही नहीं उसके लिये प्रमाण क्या हो सकता है—यह बताइये ॥ ४१ ॥ [ यदि आगमको ही विश्वसनीय प्रमाण न माना जाय, दूसरोंके कथनको भी प्रमाणरूप मान लें ] तबतो प्रमाताका कोई भी बात अवि- श्वसनीय नहीं जान पड़ेगी। अतः सब लोग श्रद्धाका आश्रय लेकर ही चल रहे हैं ॥ ४२ ॥ मैं आपको श्रेयःप्राप्तिका प्रकार समझाती हूँ, स्थिरचित्त होकर सुनिये। जो पुरुष शुष्क तर्क करता है और जो बिलकुल तर्क नहीं करता उसका इस लोक या परलोकमें कल्याण नहीं हो सकता ॥४३-४४ पू० ॥ उनमेंसे भी तर्क न करनेवालेका तो कभी कल्याण हो भी सकता है, परन्तु शुष्क तर्क करनेवालेका तो किसी प्रकार कल्याण होना सम्भव नहीं है ॥ ४४ उ०-४५ पू० ॥ पूर्वकालमें सह्यपर्वतकी ओर गोदावरीके तीरपर कौशिक मुनि रहते थे। वे बड़े शान्त, सुमति और संसारके रहस्य ( वास्तविक स्वरूप ) को जाननेवाले थे। अपने गुरुदेवका आश्रय पाकर उनके सैकड़ों शिष्य भी वहीं रहते थे ॥ ४५ उ०-४६ ॥
त एकदा गुरुमनुगता लोकस्य संस्थितिम् । निर्णेतुं बुद्धयनुगुणं तदा प्रोचुः परस्परम् ॥ ४७ ॥ तत्राजगाम शृङ्गाख्यो विप्रः कश्चिन्महाबुधः । स सर्वेषां मतं प्रोक्तं दूषयद् बुद्धिकौशलात् ॥ ४८ ॥ अश्रद्धया हतप्रज्ञो विवादनिपुणस्तदा । प्रमाणात् प्रमितं सत्यमित्युक्तेषु द्विजेष्वथ ॥ ४९ ॥ अनवस्थिततर्को वै प्राह तर्कैकसंश्रयः । शृङ्गाख्य आक्षिपन् सर्वान् तत्र वादकथान्तरे ॥ ५० ॥ विप्राः शृणुध्वं मद्वाक्यं सत्यं न क्वापि सिध्यति । प्रमितं यत् प्रमाणेन तत् सत्यमिति हीरितम् ॥ ५१ ॥ तत्र तेन दोषयुजा भवेदप्रमितं ननु । निश्चेतव्या ततस्त्वादौ प्रमाणानामदुष्टता ॥ ५२ ॥
एक दिन गुरुदेवकी अनुपस्थितिमें वे शिष्यगण संसारके स्व- रूपका निर्णय करनेके लिये आपसमें मिलकर अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार प्रतिपादन करने लगे ॥ ४७ ॥ इतने हीमें वहाँ शृङ्ग नामका एक बुद्धिमान् ब्राह्मण आया । उसने अपने बुद्धिकौशलसे उनके कहे हुए सभी मतोंको सदोष सिद्ध कर दिया ॥ ४८ ॥ शास्त्रोंपर श्रद्धा न होनेके कारण उसकी बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो चुकी थी। तथापि विवाद (शुष्क तर्क) करनेमें वह बहुत कुशल था। जब शिष्योंने कहा कि जो बात प्रमाणसे सिद्ध हो वही सत्य है तो उस विचारगोष्ठीमें वह शुष्क तर्क करनेवाला शृङ्ग केवल तर्कका आश्रय लेकर बोला—॥ ४९-५० ॥ "ब्राह्मणो ! मेरी बात सुनो । आप लोगोंने कहा कि जो प्रमाणसे सिद्ध हो वह सत्य है । सो इस प्रकार तो सत्य कभी सिद्ध ही नहीं हो सकता ॥ ५१ ॥ क्योंकि यदि प्रमाण दोषयुक्त होगा तो उसके द्वारा होनेवाला निर्णय अप्रामाणिक होगा। इसलिये सबसे पहले तो प्रमाणोंकी निर्दोषताका निर्णय करना चाहिये ॥ ५२ ॥
८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सा प्रमाणान्तरकृता तत्राप्येवं विचिन्त्यताम् । इत्येवमनवस्थानात् न किञ्चित् प्रमितं भवेत् ॥ ५३ ॥ अतः प्रमाता प्रमितं प्रमाणं वा न सिध्यति । तस्माच्छून्याश्रयो ह्येष विकल्पो विविधः स्थितः ॥ ५४ ॥ सोऽपि शून्यात्मतां प्राप्तः प्रमाणाविषयत्वतः । तस्माच्छून्यं न किञ्चित् स्यादित्येष प्रविनिर्णयः ॥ ५५ ॥ इति शुङ्गवचः श्रुत्वा तेषु केचिद् द्विजाधमाः । तं श्रिता निश्चयाभासं बभूवुः शून्यवादिनः ॥ ५६ ॥ विनाशमीयुस्तन्निष्ठाः शून्यभावं परं गताः । ये द्विजाः सारहृदयास्ते शुङ्गस्य प्रभाषितम् ॥ ५७ ॥ निरूप्य कौशिके तेन समाहितहृदोऽभवन् । तस्मात् मर्वात्मना त्यक्त्वा तर्कं तमनवस्थितम् ॥ ५८ ॥ और उस निर्दोषताका निश्चय होगा अन्य प्रमाणोंसे । फिर उन प्रमाणोंकी निर्दोषताके विषयमें भी इसी प्रकार विचार करना होगा । इस तरह अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित होनेके कारण कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकेगा ॥ ५३ ॥ अतः प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण सिद्ध ही नहीं हो सकते । इसलिये यह जो अनेक प्रकारका आभास प्रतीत हो रहा है उसका आश्रय केवल शून्य ही है ॥ ५४ ॥ वह शून्य भी प्रमाणका विषय न होने के कारण शून्यरूप ( अभाव- मात्र ) ही है । अतः अन्तिम निर्णय यही है कि यह शून्य भी कुछ नहीं है” ॥ ५५ ॥ शुङ्गके ये वचन सुनकर उनमेंसे कुछ अधम ब्राह्मण उसीके इस आभासमात्र निर्णयको मानकर शून्यवादी हो गये । शून्यमें निष्ठा होनेके कारण वे स्वयं भी अत्यन्त शून्यभाव ( जडता ) को प्राप्त होकर नष्ट ही हो गये [ अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्ति उन्हें नहीं हुई ] ॥ ५६-५७ पू० ॥ किन्तु जो शिष्य विचारशील थे उन्होंने शुङ्गका कथन कौशिक मुनिके आगे निवेदन किया और उनसे उन्हें उसका समाधान मिल गया ॥ ५७ उ०-५८ पू० ॥