भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

पञ्चमोऽध्यायः। ७३ महानन्दाप्यनानन्दा मातापितृविवर्जिता । मादृशयस्तनयास्तस्याः सन्ति संख्याविवर्जिताः ॥ १११ ॥ यथा तरङ्गा जलधेरसंख्यः सोदरीगणः । सर्वास्ता मत्समाचारा राजपुत्र भवन्ति वै ॥ ११२ ॥ महामन्त्रवती चाहं सर्वैरेतैः सखीगणैः । सङ्गता तत्परा चापि मातृतुल्या स्वरूपतः ॥ ११३ ॥ अस्मिन् पुरे सखीपुत्रो यदा श्रान्तो भवत्यलम् । तदा मातुः समुत्सङ्गेऽस्थिरः शेते सुनिर्भरम् ॥ ११४ ॥ अस्थिरस्तु यदा सुप्तस्तदा तस्य सुतादयः । स्वापं समधिगच्छन्ति नान्यो जागर्ति कश्चन ॥ ११५ ॥ तदा तद्रक्षति पुरमस्थिरस्य प्रियः सखा । प्रचाराख्यः प्रतिचरन् पूर्वद्वारयुगे मुहुः ॥ ११६ ॥ वह परमानन्दमयी होनेपर भी निरानन्द१ तथा माता-पितासे रहित थी। हाँ, मेरी-जैसी उसकी अगणित सन्तानें अवश्य थीं ॥ १११ ॥ जिस प्रकार समुद्रकी तरंगें होती हैं उसी प्रकार मेरी अगणित बहिनें थीं। राजकुमार ! वे सब मेरे ही समान आचरणवाली हैं ॥ ११२ ॥ मैं बड़ी भारी मन्त्रशक्तिसे सम्पन्न हूँ, इसीसे इन सब सखियोंके साथ उन्हींके अनुकूल रहते हुए भी स्वरूपतः अपनी माताके समान निर्मलस्वभाव ही रहती हूँ ॥ ११३ ॥ इस पुरमें जब मेरी सखीका पुत्र अस्थिर बहुत थक जाता तो वह निश्चिन्त होकर अपनी माँकी गोदमें सो जाता ॥ ११४ ॥ जब अस्थिर सो जाता तो उसके पुत्रादि भी निद्रादेवीकी गोदमें चले जाते। फिर और कोई भी जगा न रहता ॥ ११५ ॥ उस समय अस्थिरका प्रचार नामक प्रिय सखा३ पूर्वके दोनों द्वारों४ में आते-जाते इस नगरकी रक्षा करता ॥ ११६ ॥ १. स्वरूपतः आनन्दस्वरूपा होनेपर भी कोई निमित्त न होनेके कारण उसमें आनन्दका आविर्भाव नहीं होता। २. अघटितघटनापटीयसी मायाशक्तिसे । ३. प्राण । ४. दोनों नासिकारन्ध्रोंमें ।