भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अस्थिरस्यापि या माता सखी मे तनयेन सा । तस्याः सखी च या श्वश्रूरसती या स्वभावतः ॥ ११७ ॥ सा समाच्छाद्य तान् सर्वान् पुत्रेण सह रक्षति । एवं सर्वेषु सुप्तेषु प्राप्य स्वां मातरं तदा ॥ ११८ ॥ आनन्दिताहं भवामि मात्राश्लिष्टा चिरं ननु । पुनस्तानुत्थितान् शीघ्रमनुसंधामि चान्वहम् ॥ ११९ ॥ अस्थिरस्य सखा योऽयं प्रचाराख्यो महाबलः । स सर्वानस्थिरमुखान् पोषयत्यनुवासरम् ॥ १२० ॥ स एको बहुधा भूत्वा पुरञ्च पुरवासिनः । व्याप्य रक्षत्यनुदिनं सर्वान् संश्लेषयत्यपि ॥ १२१ ॥ तं विना ते हि विश्लिष्टा नष्टाः स्युरपि सर्वथा । सूत्रेण हीना मणयो मालाबद्धा यथा पृथक् ॥ १२२ ॥ अस्थिरकी माता मेरी सखी भी अपने पुत्रके साथ निद्राके वशीभूत हो जाती । उस अवस्था में उसकी सखी, जो उसकी असत्स्व- भाववाली सास भी थी, अपने पुत्रके सहित उन सबको आच्छादित करके उनकी रक्षा करती थी ॥ ११७-११८ पू० ॥ इस प्रकार जब सब सो जाते तो मैं अपनी माताके पास जाती और चिरकालतक उसका आलिंगन पाकर आनन्दमग्न हो जाती थी । फिर जब वे सब उठते तो नित्यप्रति तुरन्त ही मैं भी उनसे तादात्म्य स्थापित कर लेती ॥ ११८ उ०-११९ ॥ अस्थिरका जो यह महाबली प्रचार नामक सखा था वह नित्यप्रति अस्थिर आदि सभी परिवारका पोषण करता था ॥ १२० ॥ वह एक ही अनेकरूप होकर उस नगर और नगरनिवासियोंमें व्याप्त हो जाता, नित्यप्रति सबकी रक्षा करता और सबका अपने-अपने विषयोंसे सम्पर्क कराता ॥ १२१ ॥ उसके बिना तो वे सब इसी प्रकार छिन्न-भिन्न होकर सर्वथा नष्ट १. अविद्या या शून्या । २. मोह । ३. सुषुप्तिमें जीवका अपने शुद्धस्वरूप या शुद्धचितिसे संयोग हो जाता है; जैसा कि यह श्रुति कहती है—'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति।'