भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

पञ्चमोऽध्यायः । ६७ तृणान्यन्यान्योषधीश्च भावानन्यांश्च सर्वतः । सुगन्धान् पूतिगन्धांश्च मृदुगन्धोग्रगन्धकान् ॥ ७७ ॥ मोहगन्धान् ज्ञानगन्धान्मूर्च्छागन्धान्विचित्रितान् । पुत्राणां भवने चैवं प्रविशन् निविशन्नपि ॥ ७८ ॥ हितेषु रमते क्वापि विषीदत्यहिते क्वचित् । सदा गमागमपरः पुत्राणां भवने बभौ ॥ ७९ ॥ ते पुत्राः पितृवात्सल्यात् पितृहीना न च क्वचित् । स्पृशन्ति विषयांश्चित्रान् स्वल्पं वापि कदाचन ॥ ८० ॥ अस्थिरस्तु पुत्रगृहे भुक्त्वा तान् विषयान् बहून् । मुषित्वाऽन्यांश्च विषयान् गुप्त्या नयति स्वं पदम् ॥ ८१ ॥ पत्न्या चपलया साकं रहः पुत्रैर्विना स्वयम् । भुनक्त्यतितरां नित्यमथान्या चपला स्वसा ॥ ८२ ॥ महाशना पतिं वव्रे मनःकान्तं तमस्थिरम् । तस्यामतितरां सक्तो यदाभूदस्थिरोऽपि वै ॥ ८३ ॥ वहां उसने सब ओर वनस्पति, ओषधि और अन्य वस्तुओंका भी अनुभव किया। उनमें कोई अच्छी गंधवाली, कोई दुर्गन्धयुक्त, कोई भीनी गंधवाली और कोई उग्र गन्धयुक्त थी। किन्हींकी गन्ध मुग्ध कर देनेवाली, किन्हींकी सचेत करनेवाली और किन्हींकी मूर्च्छित कर देने- वाली थी। इस प्रकार अनेकों विचित्र पदार्थ अनुभव किये ॥७७-७८ पू०॥ पुत्रोंके भवनोंमें इसी तरह जाते-आते वह कहीं तो हितकारी वस्तुएँ मिलनेपर उन्हींमें रम जाता और कहीं अहितकर पदार्थ मिलने पर ऊबने लगता। अतः वह बराबर अपने पुत्रोंके भवनोंकी ओर आने-जानेमें ही लगा रहता था ॥ ७८ उ०-७९ ॥ वे पुत्र बड़े पितृभक्त थे, अतः पिताको साथ लिये बिना उन विचित्र विषयोंमेंसे कभी किसीको थोड़ा-सा छूतेतक नहीं थे ॥ ८० ॥ किन्तु अस्थिर उन अनेकों विषयोंको पुत्रोंके भवनोंमें भोगता और उनमेंसे कुछको गुप्त रूपसे चुराकर अपने घर ले आता ॥ ८१ ॥ वहाँ पुत्रोंके बिना एकान्तमें अपनी पत्नी चपलाके साथ नित्य ही उन्हें खूब भोगता। कुछ काल बीतनेपर चपलाकी एक बहिन १. हृदयदेशमें। २. स्वप्नादिसें।