भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे बीभत्सान् भास्वरान् रौद्राननालोकांश्च दङ्मुखः । क्वचिद्धितं ततोऽन्यश्च पश्यन्तं पितरं पुनः ॥ ७१ ॥ अनयत्तुर्यतनयो भवनं स्वं विचित्रितम् । तत्राससाद पुष्पाणि फलान्यन्यानि च क्रमात् ॥ ७२ ॥ पेयानि लेह्यचोष्याणि भक्ष्याणि रसवन्ति वै । सुधास्वादूनि मधुराण्यन्यान्यम्लरसानि च ॥ ७३ ॥ कटुकानि च तिक्तानि कषायान्यपि कानिचित् । क्षाराणि मधुराम्लानि कट्वम्ललवणानि च ॥ ७४ ॥ कटुतिक्तानि चित्रात्मरसानि विविधान्यपि । आस्वादयन्नात्मजेन समेतोऽथान्तिमः सुतः ॥ ७५ ॥ निनाय पितरं स्थाने स्वीयेऽत्यन्तविचित्रिते । तत्रोपालभतानेकपुष्पाणि च फलानि च ॥ ७६ ॥ दीर्घ गोलाकार थे। कोई देखनेमें सुन्दर और कोई भयानक जान पड़ते थे ॥ ६६-७० ॥ इसीप्रकार कोई घृणाके योग्य, कोई तेजोमय, कोई उग्र और कोई अन्धकाररूप थे, जहाँ दृष्टि काम नहीं करती थी। उनमेंसे कोई हितकर और कोई अहितरूप जान पड़ता था। इस प्रकार जब पिता अस्थिर तरह-तरहके पदार्थ देख रहा था तब चौथा पुत्र¹ उसे अपने विचित्र भवनमें ले गया ॥ ७१-७२ पू० ॥ वहाँ क्रमशः अनेकों पुष्प और फल उसके दृष्टिगोचर हुए। उसने अनेकों सरस पेय, लेह्य, चोष्य और भक्ष्य पदार्थों का आस्वादन किया। उनमें कोई अमृतके समान मधुर, कोई खट्टे रसवाले, कोई कड़वे, कोई चरपरे और कोई कसैले थे। कोई नमकीन, कोई खटमिट्ठे, कोई कड़वे खट्टे और नमकीन तीन रसवाले और कोई कटु और तिक्त थे। इस प्रकार जब वह अनेकों प्रकारके रसोंवाले विभिन्न पदार्थोंका अपने पुत्र के साथ आस्वादन कर रहा था उसी समय उसका अन्तिम पुत्र² उसे अपने अत्यन्त विचित्र स्थानमें ले गया। वहाँ भी उसे अनेकों पुष्प और फल मिले ॥ ७२ उ०-७६ ॥ १. रसनेन्द्रिय । २. घ्राणेन्द्रिय ।