त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे चक्रुरायतनं श्रेष्ठं विचित्रमतिविस्तृतम् । पितरं स्ववशे चक्रुर्मात्रा सम्यग् विभाविताः ॥ ५७ ॥ आनयन्ति स्वायतनं पितरं तं क्षणे क्षणे । तत्रास्थिरो ज्येष्ठसुतायतनं विनिविश्य तु ॥ ५८ ॥ अशृणोद्विविधान् शब्दान् सुस्वरानितरानपि । क्वचिन्मधुरसङ्गीतं क्वचिद्वाद्यं सुमङ्गलम् ॥ ५९ ॥ ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्रानाथर्वणानपि । शास्त्रागमेतिहासांश्च भूषणानाञ्च सिञ्जितम् ॥ ६० ॥ भृङ्गसंघस्य गीतञ्च पिकपञ्चमसुस्वरम् । एवं मनोहराञ् शब्दान् शृण्वन् पुत्रनिदेशतः ॥ ६१ ॥ प्रीतः पुत्रवशं प्रागादथ पुत्रोऽन्यथादिशत् । विरुद्धान् कर्णकटुकानशृणोद्भैरवान् रवान् ॥ ६२ ॥ सिंहादिगर्जितं मेघनिर्घोषमशनेस्तथा । विशाल और सुन्दर निवासस्थान¹ बनवाये। फिर माताके द्वारा परिपुष्ट होकर उन्होंने पिताको अपने अधीन कर लिया ॥ ५६-५७ ॥ वे क्षण-क्षणमें पिताको अपने निवासस्थानमें बुला लेते थे। एक बार अस्थिरने अपने सबसे बड़े पुत्रके² भवनमें जाकर नाना प्रकारके बड़े सुरीले तथा अन्य प्रकारके भी शब्द सुने ॥ ५८-५६ पू० ॥ वहाँ उसने कभी मधुर संगीत और कभी मंगलमय बाजे सुने। कभी ऋक्, यजु, साम और अथर्ववेदके मन्त्र तथा शास्त्र, आंगम और इतिहास सुने एवं कभी आभूषणोंकी झनकार भ्रमर-निकरकी गुंजार और कोकिलका सुमधुर पञ्चम स्वर भी सुनाई दिया ॥ ५६ उ०-६१ पू० ॥ इस प्रकार उस पुत्रके संकेतसे मनोहर शब्द सुनकर वह बड़ा प्रसन्न हुआ और उसके अधीन हो गया। अब उसी पुत्रने उसे दूसरा रंग दिखाया। उसने अपनी रुचिके विरुद्ध अनेकों कठोर और भयानक शब्द भी सुने ॥ ६१ उ०-६२ ॥ सिंहादि हिंस्र पशुओंकी गर्जना, बादल और बिजलीकी कड़कड़ाहट, १. इन्द्रियगोलक। २. श्रवणेन्द्रिय।