त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोज्यं वस्त्रं भूषणं वा योषिद्वाहनमेव वा । मित्राणि वापि सुहृदो नैततं सुखयन्ति वै ॥ १२ ॥ नष्टाखिलार्थ इव स शोचत्येव निरन्तरम् । वासनाविवशः सर्वं त्यक्तुं नाशकदञ्जसा ॥ १३ ॥ नोपभोक्तुं तथा शक्तो दोषदृष्टियुतस्ततः । एवं तं शोकवशतो विवर्णवदनेक्षणम् ॥ १४ ॥ हेमलेखा समालक्ष्य कदाचित् सङ्गता रहः । किं नाथ पूर्ववत्त्वं नो लक्ष्यसेऽत्यन्तहर्षितः ॥ १५ ॥ शोचन्तमिव पश्यामि कुत एवं तव स्थितिः । कच्चिच्छरीरमात्मा ते नामयैर्बाध्यते सदा ॥ १६ ॥ भोगेषु रोगभीतिं वै प्रवदन्ति मनीषिणः । त्रिदोषसम्भवे देहे दोषवैषम्यसम्भवाः ॥ १७ ॥
अब उसे भोजन, वस्त्र, आभूषण, स्त्री, सवारी अथवा मित्र या सुहृद्-ये कोई भी सुखी नहीं कर पाते थे ॥ १२ ॥ वह निरन्तर शोकमग्न ही रहता था, मानो उसकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गयी हो । किन्तु वासनाओंके अधीन होनेके कारण वह सहसा सबको छोड़ नहीं सकता था ॥ १३ ॥ साथ ही विषयोंमें दोषदृष्टियुक्त होनेके कारण उन्हें भोगनेका भी साहस नहीं होता था। इस प्रकार जब हेमलताने देखा कि वह शोकाकुल है तथा उसके मुख और नेत्र भी मलिन हो गये हैं तो एक दिन उसने एकान्तमें मिलकर पूछा, "नाथ क्या कारण है आप पहले की तरह खूब प्रसन्न दिखायी नहीं देते ॥ १४-१५ ॥ मैं आपको सदा शोकमग्न-सा ही देखती हूँ। आपकी ऐसी स्थिति क्यों है। क्या आपका शरीररूप आत्मा सर्वदा किन्हीं रोगोंसे पीडित रहता है ? ॥ १६ ॥ विचारवान् पुरुष भोगोंमें रोगकी आशंका बताया करते हैं। शरीर वात, पित्त, कफ इन तीन दोषोंसे बना है, इसलिये इसमें इन दोषों- की विषमता होनी सम्भव ही है ॥ १७ ॥