भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

पञ्चमोऽध्यायः । ५५ एवं तस्या वचः श्रुत्वा विषयान् विरसान् विदन् । तेषु सञ्जातनिर्वेदो विमना इव संबभौ ॥ ६ ॥ चिरस्थितविषयजवासनानां वशं गतः । त्यक्तुं वा संगृहीतुं वा नाशकत् सहसा हि सः ॥ ७ ॥ प्रियां न किञ्चित् प्रोवाच राजपुत्रोऽतिलज्जितः । कांश्चिच दिवसानेवमनयच्चिन्तायाकुलः ॥ ८ ॥ विषयेषु प्रसक्तेषु स्मृत्वा तत् प्रियोदितम् । विगर्हन्नेव स्वात्मानं बुभुजे वासनावशः ॥ ९ ॥ वासनावेगवशतो विषयानुगच्छति । दृष्ट्वैव विषयान् दोषान् प्रियाप्रोक्तान् विचिन्तयन् ॥ १० ॥ शोकसंविग्नहृदयो विषीदति मुहुर्मुहुः । एवं तस्याभवच्चित्तं चलदोलास्थितं यथा ॥ ११ ॥

हेमलताके वैसे वचन सुनकर हेमचूडको विषय रसहीन-से दिखायी देने लगे और उनमें रुचि न रहनेके कारण वह उदास-सा हो गया।॥ ६ ॥ विषयजनित वासनाएँ तो उसमें चिरकालसे थीं ही और उनका उसके चित्तपर अधिकार भी था। इसलिये अब वह उन्हें न तो सहसा त्याग सकता था और न रख ही सकता था ॥ ७ ॥ [हेमलताने उसे निरुत्तर कर दिया था, इसलिये] वह राजकुमार बहुत लज्जित हो जानेके कारण अपनी प्रिया हेमलतासे कुछ कह न सका। उसने कुछ दिन इसी प्रकार चिन्ताकुल रहते हुए निकाल दिये ॥ ८ ॥ जब विषय प्राप्त होते तो अपनी प्रियाकी बातें याद करके वह अपनी भर्त्सना करते हुए भी वासनाओंके अधीन होनेके कारण उन्हें भोग लेता ॥ ९ ॥ वासनाओंका वेग होनेके कारण वह विषयोंको देखते ही उनकी ओर खिंच तो जाता, किन्तु फिर अपनी प्रियतमाके कहे हुए दोषोंका विचार आनेपर उसका हृदय शोकसे व्याकुल हो जाता और वह बार- बार विषाद करने लगता। इस प्रकार उसका चित्त झोंका लेते हुए झूलेके समान अस्थिर हो गया ॥ १०-११ ॥