भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

पञ्चमोध्यायः ॥ ५ ॥ एवं सत्सङ्गमाहात्म्यं श्रुत्वाऽत्रिसुतभाषितम् । प्रहृष्टमानसो भूयः प्रष्टुमेवोपचक्रमे ॥ १ ॥ सत्यं प्रोक्तमिदं नाथ भवता शुभकारणम् । सत्सङ्गरूपमेतच्च प्रत्यक्षेणैव भावितम् ॥ २ ॥ यो यथा सङ्गमाप्नोति फलं तस्य तथा भवेत् । स्त्रियोऽपि हेमलेखायाः सङ्गात् सर्वे महाफलाः ॥ ३ ॥ भूय इच्छाम्यहं श्रोतुं हेमचूडस्तया कथम् । बोधितस्तन्ममाचक्ष्व विस्तरेण दयानिधे ॥ ४ ॥ एवं रामेणानुयुक्तो दत्तात्रेय उवाच तम् । शृणु भार्गव वक्ष्यामि कथां परमपावनीम् ॥ ५ ॥


पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ हेमचूडकी विवशता, हेमलताद्वारा अद्भुत उपाख्यानका वर्णन इस प्रकार श्रीदत्तात्रेयजी द्वारा कही हुई सत्संगकी महिमा सुनकर परशुरामके चित्तको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने पुनः प्रश्न किया—॥ १ ॥ “नाथ ! आपने सत्संगको कल्याणका प्रधान कारण बताया, सो ठीक ही है । मैंने तो [ श्रीसंवर्त मुनिके सत्संगद्वारा ] इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी कर लिया ॥ २ ॥ जो जैसा संग करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। हेमलेखा स्त्री थी, तथापि उसके संगसे सभी महान् फलके भागी हुए ॥ ३ ॥ किन्तु यह बात मैं फिर भी सुनना चाहता हूँ कि उसने हेमचूडको किस प्रकार तत्त्वज्ञान कराया । दयानिधे ! वह प्रसंग आप मुझे विस्तार से सुनाइये” ॥ ४ ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर श्रीदत्तात्रेयजीने उनसे कहा, “भृगुनन्दन ! सुनो, मैं तुम्हें वह परम पवित्र कथा सुनाता हूँ ॥ ५ ॥