त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआमुख भारतीय वाङ्मयमें अध्यात्मतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली अनेकों पद्धतियाँ हैं। उन सभीका मूल आधार वेद हैं। यह ठीक है कि बौद्ध- जैन आदि कुछ सम्प्रदायोंने अपनी विचारधाराको वेदमूलक नहीं माना, और कहीं-कहीं वैदिक सिद्धान्तोंसे अपना तीव्रतर मतभेद भी प्रकट किया है; तथापि उनके मौलिक सिद्धान्तोंकी छाया भी कहीं-कहीं श्रुतियोंमें मिल ही जाती है। अस्तु, इस समय उनके विषयमें हमें कुछ भी विचार करना नहीं है। वेदानुसारिणी पद्धतियोंमें सूत्र, स्मृति, तन्त्र और पुराण आदिकी गणना की जाती है। प्रस्तुत ग्रन्थ तान्त्रिक साहित्यके अन्तर्गत है। तन्त्रोंका क्षेत्र अत्यन्त विशाल है। तथापि सामान्यतया उसे शैव, शाक्त और वैष्णव तीन विभागोंमें विभक्त किया जा सकता है। गाणपत्य, सौर आदि अन्य तन्त्र भी न्यूनाधिक रूपसे इन्हींके अन्तर्गत आ जाते हैं। तान्त्रिक साधनाके द्वारा साधकको बहुत शीघ्र अपने अभीष्ट लक्ष्यकी प्राप्ति हो सकती है। अन्य साध- नाओंसे इसकी मुख्य विलक्षणता यह है कि यह ज्ञानके साथ साधकको ऐश्वर्यकी प्राप्ति भी करा देती है। तन्त्रोंका मत है कि ज्ञान हो जानेपर भी जबतक साधकमें घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुलाभिमान, शील और जाति ये आठ प्रतिबन्ध रहते हैं तबतक उसके जीवत्वकी निवृत्ति नहीं होती। तन्त्र इन आठ प्रतिबन्धोंको 'अष्ट पाश' कहता है और जो इनसे मुक्त हो जाता है उसीको शिवत्वकी प्राप्ति बतलाता है- 'घृणा लज्जा भयं शंका जुगुप्सा चेति पञ्चमी। कुलं शीलं तथा जातिरष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः॥ पाशबद्धो भवेज्जीवः पाशमुक्तः सदाशिवः॥' तन्त्रोंकी ही दूसरी संज्ञा 'आगम' भी है। शाक्त आगमोंमें 'त्रिपुरा- रहस्य' एक प्रधान ग्रन्थ है। इसकी श्लोकसंख्या बारह हजार बतायी