त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६ ) जाती है। इसके तीन खण्ड हैं—माहात्म्य, चर्या और ज्ञान। प्रस्तुत ग्रन्थ ज्ञानखण्ड है। इसकी श्लोकसंख्या २१६३ है। माहात्म्यखण्ड ६६८७ श्लोकोंका ग्रन्थ बताया जाता है। चर्या खण्ड लुप्त हो चुका है। उसकी कोई प्रति अभीतक उपलब्ध नहीं हो सकी। ज्ञानखण्डपर श्रीमत्- श्रीनिवासबुधविरचित 'तात्पर्यदीपिका' नामकी संस्कृत टीका है। पहले मूल ग्रन्थका अनुवाद मराठी भाषामें हुआ था। उसीका हिन्दी अनुवाद श्रीमाधवराव सप्रेने (जो लोकमान्य तिलक द्वारा विरचित गीतारहस्यके भी हिन्दी-अनुवादक थे) 'दत्तभार्गवसंवाद' नामसे किया था। प्रायः चालीस वर्ष हुए यह ग्रन्थ नागपुर-निवासी सेठ नागरमल पोद्दारने प्रकाशित किया था। अब यह अप्राप्य है। परमार्थप्रेमियोंको यह ग्रन्थ अत्यन्त उपादेय और रुचिकर जान पड़ा। अतः प्रायः दस वर्ष हुए उसी पुस्तकको अविकल रूपसे 'त्रिपुरारहस्य' नामसे दिल्लीनिवासी श्रीनारा- यणदासजी मुलतानीने प्रकाशित किया था। किन्तु उनकी तथा उनके कुछ मित्रोंकी इच्छा थी कि इसे मूल और अनुवादसहित भी प्रकाशित कराना चाहिये। अतः उन्हींके प्रेमपूर्ण अनुरोधसे प्रस्तुत ग्रन्थ तैयार हुआ है। आशा है, इसके द्वारा जिज्ञासुओंकी अच्छी सेवा हो सकेगी। दिल्लीसे जो प्रति प्रकाशित हुई है उसमें प्रकाशकके अनुरोधसे इन पंक्तियोंके लेखकने ही भूमिका लिखी थी। यह आमुख प्रायः अविकल रूपसे उसीकी प्रतिलिपि है। इस ग्रन्थके प्रणेता महर्षि हारितायन हैं। उन्होंने अवधूतशिरोमणि दत्तात्रेय और परशुरामजीका यह संवाद देवर्षि नारदको सुनाया है। परशुरामजीने पहले भगवान् दत्तात्रेयके मुखारविन्दसे भगवती त्रिपुरा देवीकी महिमा सुनी। इससे उनके हृदयमें श्रीत्रिपुरसुन्दरीके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव उदित हुआ। गुरुवर दत्तसे देवीकी उपासनाका सब क्रम जानकर उन्होंने महेन्द्र पर्वतपर जा बारह वर्षतक बड़ी तत्परतासे देवीकी उपासना की। उपासनामें तल्लीन रहते हुए ही उनके चित्तको इस सृष्टिचक्र और परमार्थ तत्त्वकी समस्या आन्दोलित करने लगी। पहले इस विषयमें वे मुनिवर संवर्त्तसे जिज्ञासा कर चुके थे। परन्तु