त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७ ) उस समय उनकी कोई बात उनकी समझमें नहीं आयी। अतः अब गुरुवर दत्तके पास जाकर उन्होंने इसी विषयमें प्रश्न किया। और उनके मुखारविन्दसे यह सारा उपदेश सुनकर वे सब प्रकारके सन्देहोंसे छूटकर कृतकृत्य हो गये। इससे यह बात सूचित होती है कि जबतक साधक निष्काम कर्म और उपासनाके द्वारा शुद्धान्तःकरण होकर तत्त्व- साक्षात्कारकी योग्यता प्राप्त नहीं कर लेता तबतक संवर्त्त-जैसे तत्त्वनिष्ठ महापुरुषका उपदेश सुननेपर भी वह परमार्थतत्त्वको ग्रहण नहीं कर सकता। त्रिपुरारहस्यके अनुसार परमतत्त्व शुद्ध-चैतन्यस्वरूप है। वह सर्वत्र व्याप्त और सभी प्रकारकी मर्यादाओंसे शून्य है। उसमें अनन्त शक्तियाँ हैं तथा वह पूर्ण-स्वातन्त्र्य-समन्वित है। उसकी शक्तियाँ उससे सर्वथा अभिन्न हैं। सृष्टिसे पूर्व वे उसमें अव्यक्त रूपसे लीन रहती हैं तथा सर्गकाल उपस्थित होनेपर अपनी संकल्पशक्तिसे वह शुद्ध चिति ही दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान इस दृश्यप्रपञ्चको अपनेमें आभासित कर देती है। यद्यपि आकारात्मक देश और क्रियात्मक कालका आभास भी इस चितिशक्तिमें ही होता है, तथापि इनका आधार होनेके कारण यह किसी भी प्रकार उनसे प्रभावित नहीं होती, जिस प्रकार कि दर्पण अपने प्रतिबिम्बित वस्त्वाभासोंसे सर्वथा असंग ही रहता है। यह शुद्धचिति ही सुरासुरवन्दिता त्रिपुरा देवी है। शाक्ततन्त्रोंमें त्रिपुराको ही ललिता, षोडशी, श्रीविद्या, कामेश्वरी, भुवनेश्वरी एवं त्रिपुर- सुन्दरी आदि नामोंसे कहा है। इनका स्वरूप अत्यन्त मनोमुग्धकारी है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र इनके सिंहासनके चार पाद हैं और सदाशिव उसका पट्ट है। यद्यपि इनकी गणना दश महाविद्याओंमें है, तथापि कुछ तन्त्रोंके मतानुसार तो ये स्वयं ही एक स्वतन्त्र महाविद्या हैं। शक्तिसंगमतन्त्रका कथन है कि ये ललिता देवी ही किसी समय 'कृष्ण' संज्ञक पुरुष रूप धारण करती हैं—'कदाचिदाद्या ललिता पुंरूपा कृष्णविग्रहा।' तथापि वैष्णवतन्त्रोंके अनुसार ललिता निकुञ्जेश्वरी श्रीराधिकाजीकी प्रधान सखी हैं। इसमें सन्देह नहीं कि महाविद्या