भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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( ८ ) ललितासुन्दरी और श्रीराधाकृष्णसहचरी ललिताके स्वरूप, शक्ति एवं लीलाओंमें बहुत अधिक अन्तर है। अतः चिद्रूपिणी होनेके कारण तत्त्वतः तो इनका अभेद हो सकता है, किन्तु उपासना-भेद होनेके कारण लीलाभूमिमें इनकी एकता नहीं हो सकती। यहाँ एक बात विचारणीय है। त्रिपुरारहस्य द्वारा प्रतिपादित शुद्ध- चिति यद्यपि आपातदृष्टिसे अद्वैतसिद्धान्त द्वारा स्थापित शुद्धचिन्मात्र परब्रह्मसे अभिन्न जान पड़ती है, परन्तु दार्शनिक दृष्टिसे ऐसी बात नहीं है। इसमें सन्देह नहीं तत्त्वतः तो ये एक ही हैं, परन्तु दोनों दार्शनिक इसे एक रूपमें नहीं देखते। ये दोनों ही इसे स्वयंप्रकाश तथा देश- काल और वस्तुके परिच्छेदसे शून्य बताते हैं। यही नहीं, इन दोनों ही दार्शनिकोंके मतमें यह दृश्यप्रपञ्च सर्वथा असत् और मायाका विलासमात्र है; परन्तु फिर भी इनके दृष्टिकोणोंमें एक सूक्ष्म अन्तर है। अद्वैत सिद्धान्त ब्रह्मको सर्वथा निर्विशेष, निर्विकार, निर्गुण और कूटस्थ-नित्य प्रतिपादित करता है। तथा इस दृश्यप्रपञ्चको वह सद्- सदूसे विलक्षण अनिर्वचनीया मायाकी महिमासे, मन्दान्धकारमें पड़ी हुई रज्जुमें भ्रमसे ही प्रतीत होनेवाले सर्प, दण्ड एवं धारा आदि विकल्पोंके समान, केवल प्रतीतिमात्र मानता है। उसकी दृष्टिमें संसार कभी उत्पन्न नहीं हुआ। अतः वह उसका विवर्त्तमात्र है। किन्तु त्रिपुरा- रहस्य उस परमार्थतत्त्वमें अनन्त शक्ति और पूर्णस्वातन्त्र्य स्वीकार करता है। उसके मतानुसार शुद्धचिति अपने पूर्णस्वातन्त्र्यके कारण अपने अमोघ संकल्पद्वारा भित्तिरूप अपने ही ऊपर इस जगच्चित्रको आभासित कर देती है। दर्पणमें जैसे सामनेके पदार्थोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है उसी प्रकार शुद्धचितिमें उसके संकल्पवश यह जगच्चित्र प्रतिबिम्बित हो उठता है। यह उसका सहज-सामर्थ्य है। अतः यह शाक्तदर्शन यद्यपि शाङ्कर सिद्धान्तकी भाँति अद्वैतवादी ही है, तथापि इसके द्वारा स्थापित अद्वैततत्त्व अकर्ता, अभोक्ता, निर्गुण और निर्वि- शेष नहीं है। वह शक्तिमय और विमर्शरूप है। 'विमर्श' उसकी क्रिया- शक्तिका नाम है। वह क्रियाशक्ति उसमें सर्वदा विद्यमान रहती है। सृष्टिकालमें वह व्यक्त हो जाती है, अतः उस समय इसे 'बाह्याभास'