भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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( ६ ) कहते हैं। और प्रलयकालमें वह लीन रहती है, इसलिये उसे 'अनहं- भाव' कहा जाता है। यद्यपि यह अनहंभाव वेदान्तोक्त मूल अविद्याके समान ही है, तथापि मूला अविद्या ब्रह्ममें अध्यस्त और जडरूपा है तथा यह अनहंभाव उस शुद्धचितिकी इच्छाशक्ति है और उससे सर्वथा अभिन्न है। इस प्रकार अद्वैत-वेदान्त विवर्त्तवादी है और शाक्तदर्शन आभास- वादी। प्रपञ्च दोनोंहीके सिद्धान्तानुसार केवल प्रतीतिमात्र और स्वरूपतः असत् है। किन्तु अद्वैत मतके अनुसार यह प्रतीति भ्रममूलक है और शाक्तमतके अनुसार यह परमार्थ तत्त्वके सहज सामर्थ्यसे होती है। अद्वैत सिद्धान्तमें इसका कारण अनादि अनिर्वचनीया माया है और शाक्तसिद्धान्त कहता है कि इसका कारण परमचितिका स्वातन्त्र्य- मूलक संकल्प है। परन्तु दोनों ही सिद्धान्तोंके अनुसार दृश्यकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जिस प्रकार रज्जुमें भ्रमसे प्रतीत होनेवाला सर्प उससे भिन्न कुछ भी नहीं होता उसी प्रकार दर्पणमें उसकी स्वच्छताके कारण प्रतीत होनेवाला प्रतिबिम्ब भी दर्पणसे भिन्न कुछ नहीं होता। अतः दोनों ही सिद्धान्तोंके अनुसार एक अखण्ड, अद्वैत चिन्मात्र सत्ता ही परमार्थ है और वही दोनोंका लक्ष्य भी है। लक्ष्य एक होनेपर भी जिस प्रकार उपर्युक्त दोनों दर्शनोंके अनुसार उनके लक्षणोंमें भेद है उसी प्रकार उसकी उपलब्धिके साधनोंमें भी अन्तर है। अद्वैतवाद एकमात्र विचारको ही उसकी उपलब्धिका साधन बताता है, क्योंकि उसके अनुसार वह साधकका अपना नित्यसिद्ध स्वरूप ही है। वह उसे नित्य प्राप्त है। केवल अविद्याके कारण ही उसकी अप्राप्तिका भ्रम है। अतः विचारसे अविचार या अविद्याकी निवृत्ति होनेपर उसे स्वयं ही उसकी अनुभूति हो जाती है। इसके लिये उसे गुरुमुखसे वेदान्तोक्त महावाक्योंका अर्थ श्रवण करने की आवश्य- कता होती है, क्योंकि जो वस्तु प्रत्यक्ष सम्मुख होनेपर भी केवल अज्ञान- के कारण अपरिचित रहती है उसका परिचय किसी आप्त पुरुषके कथनके सिवा और किसी प्रकार नहीं हो सकता। अतः जिन शुद्धचित्त जिज्ञासुओंके हृदयमें मल-विक्षेपरूप कोई दोष नहीं होता उन्हें तो