भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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( १० ) गुरुदेवके उपदेशश्रवणसे ही उस तत्त्वका अप्रतिबद्ध बोध हो जाता है। किन्तु जिनमें चित्तकी अशुद्धिके कारण संशय-विपर्ययरूप प्रतिबन्ध रहता है उन्हें उसकी निवृत्तिके लिये मनन और निदिध्यासन भी करने पड़ते हैं। इनमें मननसे संशय और निदिध्यासनसे विपर्ययकी निवृत्ति होती है; और फिर अखण्डाकार वृत्ति होकर उन्हें प्रतिबन्धशून्य ज्ञान होता है। इस प्रकार अद्वैतमतके अनुसार तो श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन ही ज्ञानके प्रधान साधन हैं। परन्तु शाक्तमतके अनुसार विचार उसका प्रधान साधन नहीं है, प्रत्युत विचारका अभाव होनेपर ही उसका भान होता है—'न तद्वि- चार्यविज्ञेयमविचाराद्विभासते' (६।८२)। इस सिद्धान्तके अनुसार शास्त्र या गुरुपदेशसे तो केवल परोक्ष ज्ञान होता है; उससे मोक्ष नहीं हो सकता। अपरोक्ष ज्ञान तो समाधिका परिपाक होनेपर ही होता है। इसका एक विशेष कारण है। इस सिद्धान्तके अनुसार भी यद्यपि चिति नित्यसिद्धा और सबकी स्वरूपभूता ही है, तथापि उसका तिरोधान अज्ञान या अविचारके कारण नहीं, अपि तु उसकी विमर्शशक्तिसे प्रति- भासित दृश्यवर्गके कारण माना गया है। प्रतिबिम्बका अभिनिवेश रहते हुए जैसे दर्पणका स्पष्ट भान नहीं होता उसी प्रकार जबतक चित्त दृश्य और दर्शनमें अभिनिविष्ट रहता है तबतक उसे उनकी आधारभूता चितिका परिचय नहीं होता। अतः इसके लिये पहले उसे निष्काम कर्म और उपासना के द्वारा सूक्ष्म एवं शुद्ध करना चाहिये। सूक्ष्म चित्त- में ही उस परमतत्त्वका स्फुट स्फुरण होता है। फिर तो व्यवहारमें भी उसका अनुसंधान किया जा सकता है। इस ग्रन्थमें ऐसे कुछ स्थानोंका उल्लेख हुआ है, जहाँ उसका स्वभावतः स्फुरण होता है— १. निद्रा और जागृतिके मध्यकी अवस्था। २. जब चित्त एक वस्तुके आकारको छोड़कर दूसरी वस्तुमें जाने लगे तो उससे पहले दोनों वस्तुओंके मध्यकी स्थिति। ३. एक विचारको छोड़कर दूसरा विचार आरम्भ होनेसे पहलेकी स्थिति।