त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) ये सब दो अवस्था, दो पदार्थ और दो वृत्तियोंके बीचकी सन्धियाँ हैं। इनमें किसी भी अवस्था, पदार्थ या वृत्तिकी स्थिति न रहनेके कारण चित्त निर्विषय रहता है। यह निर्विषय चित्त ही वास्तवमें शुद्ध चिति है। यही परम पद है, यही सर्वेश्वर है और यही सम्पूर्ण प्रपञ्चका आधार है। समस्त पदार्थोंके रूपमें यही भास रहा है। परन्तु स्वरूपतः उसमें किसी भी पदार्थकी सत्ता नहीं है। इस प्रकार निर्विकल्प समाधिमें स्थित होनेपर ही परमतत्त्वका साक्षात्कार होता है। परन्तु साक्षात्कार हो जानेपर तत्त्ववेत्ताको सर्वदा उसी अवस्थामें स्थित रहनेकी आवश्यकता नहीं है। उसका स्वरूप तो नित्यसिद्ध ही है, किसी अवस्थाविशेषमें उसे सीमित नहीं किया जा सकता। सारी अवस्थाएँ उसीमें तो प्रतिभासित होती हैं। अतः वह किसी भी स्थितिमें रहे स्वरूपस्थ ही है। उसे अपनेसे भिन्न कुछ भी प्रतीत नहीं होता। इस प्रकार हम देखते हैं कि साधनोंमें भेद होनेपर भी इन दोनों मार्गोका अनुसरण करनेवाले साधकोंकी अन्तिम स्थिति तो एक ही होती है। ये दोनों ही साधन श्रुतिसम्मत हैं और दोनोंके द्वारा एक हो शुद्ध चेतनका साक्षात्कार होता है। वास्तवमें तो भारतीय मनी- षियोंने परम तत्त्वकी उपलब्धिके लिये जितने साधनोंकी उद्भावना की है उनके द्वारा अन्तमें एक ही वस्तुकी उपलब्धि होती है। जिस प्रकार नगरके सभी मार्ग घूम-फिरकर एक ही राजप्रासादपर पहुँच जाते हैं; उसी प्रकार परमपदकी प्राप्तिके सभी साधनोंका साध्य एक ही तत्त्व है। अपनी-अपनी भावना और साधनाके अनुसार उस एककी ही अनेक रूपोंमें उपलब्धि होती है। सब साधकोंकी योग्यता और रुचि एक-सी नहीं होती। अतः अधिकार-भेदके कारण साधन-भेद भी आवश्यक है। इस साधन-भेदसे ही सम्प्रदाय-भेदकी सृष्टि हुई है। इसलिये विचार करनेसे निश्चय होता है कि समाजकी यथायोग्य आध्यात्मिकी प्रगतिके लिये सम्प्रदायभेद भी उपयोगी ही है। किन्तु सभी सम्प्रदायोंका गन्तव्य स्थान तो एक ही है; अतः लक्ष्यकी एकता होनेके कारण उनमें संघर्षका कोई भी कारण नहीं है। जो लोग साधनमें ही साध्य-बुद्धि कर लेते हैं उन्हींमें अविवेकवश साम्प्रदायिक