भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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( १२ ) संघर्षकी सृष्टि होती रहती है। किन्तु विभिन्न अधिकारियोंके लिये सम्प्रदायभेद जितना आवश्यक है समाजके आध्यात्मिक विकासमें साम्प्रदायिक संघर्ष उतना ही घातक भी है। अतः जो महानुभाव सब प्रकारके सम्प्रदायभेदोंमें एक ही अभिन्न साध्यको देखते हैं वे ही वास्तवमें सबके एकमात्र आराध्य परमपदका रहस्य जाननेवाले हैं। जिनकी उसपर दृष्टि रहती है उनके लिये संसारमें कहीं किसी प्रकारका विरोध नहीं रहता। उन्हें तो सर्वत्र उस एकका ही लीलाविलास प्रतीत होता है। वे इस विश्वब्रह्माण्डमें सर्वत्र उसीकी झाँकी कर अपने प्रियतमके प्रेममें छके रहते हैं। ऐसे महापुरुष ही सच्चे परमार्थदर्शी हैं। वे सभीके आदर्श होते हैं और सभी उनकी वन्दना करते हैं। इस प्रकार संक्षेपमें इस ग्रन्थके विषयपर यत्किञ्चित् प्रकाश डालने- का प्रयत्न किया गया है। आशा है, जिज्ञासुजन इसके अनुशीलन द्वारा यथायोग्य लाभ उठाकर अपना जीवन सार्थक करेंगे। हमें खेद है कि पुस्तकमें छपाईकी कई अशुद्धियाँ रह गयी हैं। उनका हम अन्तमें ‘शुद्धिपत्र’में संशोधन कर दिये हैं। पाठकोंसे प्रार्थना है कि उन्हें वे शुद्धिपत्रके अनुसार सुधार लें, नहीं तो कई जगह पुस्तकका भाव समझनेमें भूल होगी। श्रीकृष्णआश्रम, वृन्दावन     विनीत— कार्त्तिक शु० ६, सं० २०२३ वि०    सनातन देव