भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 15

॥ श्रीः ॥ त्रिपुरारहस्यम् 'ज्ञानप्रभा' हिन्दीव्याख्योपेतम् ( ज्ञानखण्डम् ) प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ श्रीगणेशाय नमः। ॐ नमः कारणानन्दरूपिणी परचिन्मयीं । विराजते जगच्चित्रचित्रदर्पणरूपिणी ॥ १ ॥ श्रुतं कच्चिन्नारदैतत् सावधानेन चेतसा । माहात्म्यं त्रिपुराख्याया यच्छ्रुतिः परसाधनम् ॥ २ ॥ प्रथम अध्याय ॥ १ ॥ परशुरामकी जिज्ञासा और गुरूपसत्ति स्वात्मन्येवात्मना नित्यं भासयन्ती जगत्त्रयम् । वन्दे तां त्रिपुरातीतां त्रिपुरां स्वात्मदेवताम् ॥ सर्वकारण ब्रह्मानन्द ही जिनका स्वरूप है, जो शुद्ध चैतन्यस्वरूप हैं और जो इस जगत-रूप चित्रके प्रतिबिम्बित करनेवाले चिन्मय दर्पणरूपसे विराजमान हैं, उन त्रिपुरादेवीको नमस्कार है ॥ १ ॥ [ श्रीहारितायन मुनि¹ बोले—] नारद ! क्या तुमने श्री त्रिपुरादेवी- का माहात्म्य सावधान चित्तसे सुना ? इसका तो श्रवण ही श्रेष्ठ मुक्ति- का साधन है ॥ २ ॥ १. यह कथा श्रीहारितायन मुनिने नारदजीको सुनायी है। पहले इसके माहात्म्य खण्डमें त्रिपुरादेवीके माहात्म्यका वर्णन है। उसके श्रवणसे हृदयमें जिज्ञासा जाग्रत् होनेपर जिन्हें ज्ञानका अधिकार प्राप्त हो चुका है उन मुमुक्षु पुरुषोंके लिए अब ज्ञानखण्ड आरम्भ किया जाता है।