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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

॥ श्रीः ॥ त्रिपुरारहस्यम् 'ज्ञानप्रभा' हिन्दीव्याख्योपेतम् ( ज्ञानखण्डम् ) प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ श्रीगणेशाय नमः। ॐ नमः कारणानन्दरूपिणी परचिन्मयीं । विराजते जगच्चित्रचित्रदर्पणरूपिणी ॥ १ ॥ श्रुतं कच्चिन्नारदैतत् सावधानेन चेतसा । माहात्म्यं त्रिपुराख्याया यच्छ्रुतिः परसाधनम् ॥ २ ॥ प्रथम अध्याय ॥ १ ॥ परशुरामकी जिज्ञासा और गुरूपसत्ति स्वात्मन्येवात्मना नित्यं भासयन्ती जगत्त्रयम् । वन्दे तां त्रिपुरातीतां त्रिपुरां स्वात्मदेवताम् ॥ सर्वकारण ब्रह्मानन्द ही जिनका स्वरूप है, जो शुद्ध चैतन्यस्वरूप हैं और जो इस जगत-रूप चित्रके प्रतिबिम्बित करनेवाले चिन्मय दर्पणरूपसे विराजमान हैं, उन त्रिपुरादेवीको नमस्कार है ॥ १ ॥ [ श्रीहारितायन मुनि¹ बोले—] नारद ! क्या तुमने श्री त्रिपुरादेवी- का माहात्म्य सावधान चित्तसे सुना ? इसका तो श्रवण ही श्रेष्ठ मुक्ति- का साधन है ॥ २ ॥ १. यह कथा श्रीहारितायन मुनिने नारदजीको सुनायी है। पहले इसके माहात्म्य खण्डमें त्रिपुरादेवीके माहात्म्यका वर्णन है। उसके श्रवणसे हृदयमें जिज्ञासा जाग्रत् होनेपर जिन्हें ज्ञानका अधिकार प्राप्त हो चुका है उन मुमुक्षु पुरुषोंके लिए अब ज्ञानखण्ड आरम्भ किया जाता है।

२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अथ ते कथयाम्यद्य ज्ञानखण्डं महाद्भुतम् । यच्छ्रुत्वा न पुनः क्वापि मनुष्यः शोकमृच्छति ॥ ३ ॥ वैदिकं वैष्णवं शैवं शाक्तं पाशुपतं तथा। विज्ञानं सम्यगालोच्य यदेतत्प्रविनिश्चितम् ॥ ४ ॥ नैतद्विज्ञानसदृशमन्यन्मानसमारुहेत् । यथा श्रीदत्तगुरुणा भार्गवाय निरूपितम् ॥ ५ ॥ उपपत्त्युपलब्धिभ्यां समेतं बहु चित्रितम् । अत्रोक्तेनापि नो वेद यदि कश्चिद्विमूढधीः ॥ ६ ॥ स केवलं दैवहतः स्थाणुरेव न संशयः । न तस्य स्यादपि ज्ञानं साक्षाच्छिवनिरूपितम् ॥ ७ ॥ तत्ते शृणु समाख्यास्ये ज्ञानखण्डात्मना स्थितम् । अहो सतामद्भुतं हि वृत्तं सर्वगुणोत्तरम् ॥ ८ ॥ यन्मत्तोप्येष देवर्षिः शुश्रूषत्यपि किञ्चन । अनुग्राहकता चैषा सतां सहजसम्भवा ॥ ९ ॥ अब मैं तुम्हें बड़ा ही विचित्र ज्ञानखण्ड सुनाता हूँ, जिसे श्रवण कर लेनेपर मनुष्य फिर कभी [जन्म-मरणरूप] शोकको प्राप्त नहीं होता ॥ ३ ॥ इस सिद्धान्तका वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त और पाशुपत सभी दर्शनोंका भली भाँति विचार करके निश्चय किया गया है ॥ ४ ॥ दूसरा कोई भी मतवाद ऐसा नहीं है जो इस सिद्धान्तके समान बुद्धिमें आरूढ़ हो सके। सद्गुरु श्रीदत्तात्रेयजीने परशुरामजीके प्रति इसका निरूपण किया है ॥ ५ ॥ यह युक्ति और उपलब्धिसे सम्पन्न और बड़ा ही विचित्र है। यदि किसी मूढ़मतिको यहाँ बतायी हुई बातोंसे भी परमार्थका बोध न हो तो उसे निःसन्देह भाग्यहीन और कोरा ठूँठ ही समझना चाहिये। उसे स्वयं श्रीशंकरजी उपदेश करें तो भी ज्ञान नहीं हो सकता ॥ ६-७ ॥ अच्छा सुनो, अब मैं ज्ञानखण्डके रूपमें स्थित वह ज्ञान तुम्हें सुनाता हूँ। अहो ! सत्पुरुषोंका व्यवहार सचमुच बड़ा ही अनोखा और सबसे बढ़कर होता है; तभी तो आप स्वयं देवर्षि मुझसे यह यत्किञ्चित् ज्ञानकथा सुनना चाहते हैं। सत्पुरुषोंमें इस प्रकार कृपा

प्रथमोऽध्यायः । ३ यथा घ्राणोल्लासकता मृगनाभेः स्वतः स्थिता । एवं दत्तात्रेयमुखाच्छ्रुत्वा माहात्म्यवैभवम् ॥ १० ॥ रामः सर्वजनारामो जामदग्न्यः शुभाशयः । भक्त्यापहृतसच्चित्तस्तूष्णीं किञ्चिद्बभूव ह ॥ ११ ॥ अथासाद्य बहिर्वृत्तिं भरितानन्दलोचनः । रोमाञ्चपीवरवपुः स्वान्तरानन्दनिर्भरः ॥ १२ ॥ हर्षो नायन्त्रोमकूपविभेदान्निर्गमन्निव । प्रणाम दत्तगुरुं दण्डवच्चरणान्तिके ॥ १३ ॥ उत्थाय हर्षभरितः प्राह गद्गदसुस्वरः । धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं श्रीगुरो त्वत्प्रसादतः ॥ १४ ॥ यस्य मे करुणासिन्धुस्तुष्टः साक्षाद्गुरुः शिवः । यस्मिंस्तुष्टे ब्रह्मपदमपि स्यात् तृणसम्मितम् ॥ १५ ॥ करनेका सहज स्वभाव होता ही है, जिस प्रकार कि कस्तूरीमें घ्राणेन्द्रियको आनन्दित करनेका गुण स्वभावसे ही रहता है ॥८-१० पू०॥ जमदग्निपुत्र परशुरामजीने इस प्रकार श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे त्रिपुरदेवीके माहात्म्यका उत्कर्ष सुना तो उनका हृदय निर्मल हो गया । वे सभी जीवोंमें माँकी झाँकी करके प्रेममग्न हो गये, भक्ति- भावसे उनका हृदय आप्लावित हो गया और थोड़ी देरके लिये वे कुछ मौन-से हो गये ॥ १० उ०-११ ॥ फिर बाह्यवृत्ति होनेपर उनके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छलक आये, शरीर पुलकावलीसे पूर्ण हो गया और हृदय आनन्दसे सराबोर हो गया ॥१२॥ उनके हृदयमें न समा सकनेके कारण मानो हर्ष रोमकूपोंके द्वारा पुलकावलीके रूपमें छलकने लगा । उन्होंने सद्गुरु श्रीदत्तात्रेयजीको, उनके चरणोंमें दण्डवत् पड़कर प्रणाम किया ॥ १३ ॥ फिर उठकर हर्षातिरेकसे गद्गदकण्ठ हो प्रार्थना की, 'गुरुदेव ! आपके कृपाप्रसादसे मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ ॥ १४ ॥ इसीसे मेरे प्रति साक्षात् शिवस्वरूप करुणासागर गुरुदेव भी प्रसन्न हो गये हैं, जिनके प्रसन्न होनेपर ब्रह्मपद भी तृणके समान तुच्छ हो जाता है ॥ १५ ॥

४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मृत्युरप्यात्मतां याति यस्मात्तुष्टाद्गुरोर्नृनु । ममाकाण्डादेव गुरुः सोऽद्य तुष्टो महेश्वरः ॥ १६ ॥ मन्ये सर्वं मया प्राप्तमित्येव कृपया गुरोः । नाथ माहात्म्यमखिलं श्रुतं त्वत्कृपयाधुना ॥ १७ ॥ तामुपासितुमिच्छामि त्रिपुरां परमेश्वरीम् । तदुपास्तिक्रमं ब्रूहि मह्यं सुकृपया गुरो ॥ १८ ॥ इति सम्प्रार्थितो दत्तगुरुरालक्ष्य भार्गवे । योग्यतां त्रिपुरोपास्तौ सच्छ्रद्धाभक्तिबृंहिताम् ॥ १९ ॥ क्रमेण दीक्षयामास त्रिपुरोपास्तिहेतवे । जामदग्न्योऽपि सम्प्राप्य त्रैपुरं दीक्षणं शुभे ॥ २० ॥ सर्वदीक्षासमधिकं पूर्णतत्त्वप्रबोधनम् । मन्त्रयन्त्रवासनाभिरन्वितमखिलं क्रमम् ॥ २१ ॥ तथा जिन सद्गुरुदेवके प्रसन्न होनेपर मृत्यु भी अपना आत्मा ही हो जाता है, आज वे मेरे शिवस्वरूप गुरुदेव अकारण ही मुझपर प्रसन्न हैं ॥ १६ ॥ उन गुरुदेवकी कृपासे, मुझे ऐसा जान पड़ता है, आज सभी पदार्थ मुझे प्राप्त हो गये हैं। हे नाथ ! आपकी कृपासे अब मैंने श्रीत्रिपुरादेवीका माहात्म्य तो सारा सुन लिया ॥ १७ ॥ अतः मैं उन भगवती त्रिपुराकी उपासना करना चाहता हूँ। गुरुदेव ! आप कृपा करके मुझसे उनकी उपासनाका क्रम कहिये' ॥ १८ ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने देखा कि त्रिपुरादेवीके प्रति श्रद्धा और भक्तिकी अधिकताके कारण वे उनकी उपासनाके अधिकारी हो गये हैं। अतः उन्होंने क्रमशः त्रिपुरोपासनाके लिये उन्हें दीक्षा दी ॥ १८-२० पू० ॥ इस प्रकार शुभ मुहूर्त्तमें परशुरामजीने त्रिपुरोपासनाकी दीक्षा प्राप्त की, जो सभी प्रकारकी दीक्षाओंसे श्रेष्ठ है और पूर्णतत्त्वका बोध करानेवाली है। जिस प्रकार भौंरा कमलसे रस ग्रहण करता है

प्रथमोऽध्यायः । ३ प्राप्य श्रीगुरुवक्त्राब्जाद्रसं मधुकरो यथा । तृप्तान्तरङ्ग आनन्दमादितो भार्गवस्तदा ॥ २२ ॥ श्रीनाथेनाभ्यनुज्ञातस्त्रिपुरासाधनोद्यतः । परिक्रम्य गुरुं नत्वा महेन्द्राद्रिमुपाययौ ॥ २३ ॥ तत्र निर्माय वसतिं शुभामतिसुखावहाम् । अभूदुपासनपरो वर्षद्वादशकं तदा ॥ २४ ॥ नित्यनैमित्तिकपरः पूजाजपपरायणः । सदा श्रीत्रिपुरेशान्या मूर्तिध्यानैकतत्परः ॥ २५ ॥ एवं तस्यात्यगात्कालो द्वादशाब्दो निमेषवत् । अथैकदा सुखासीनो जामदग्न्योऽनुचिन्तयत् ॥ २६ ॥ पुरा यत्प्राह संवर्तो मया स्वभ्यर्थितः पथि । तन्मया नैव विदितमंशेनापि तदा ननु ॥ २७ ॥ उसी प्रकार उन्होंने गुरुदेवके मुखकमलसे मन्त्र, यन्त्र और वासना आदि भावोंसे युक्त उपासनाका सभी क्रम प्राप्त किया ॥२० उ०-२२ पू०॥ इससे उनका अन्तःकरण तृप्त हो गया और वे आनन्दातिरेकसे मस्त हो गये। फिर त्रिपुरादेवीको सिद्ध करनेके लिये उद्यत हो उन्होंने गुरुदेवकी आज्ञा ली, चलते समय परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया और फिर महेन्द्रपर्वतपर चले आये ॥ २२ उ०-२३ ॥ वहाँ उन्होंने एक सुन्दर और अत्यन्त आनन्ददायिनी कुटिया बनायी और फिर बारह वर्षोंके लिये त्रिपुरादेवीकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ २४ ॥ वे विधिवत् नित्य-नैमित्तिक कार्योंका अनुष्ठान करते, पूजा और मन्त्रजपमें तत्पर रहते तथा सर्वदा ही एकमात्र भगवती त्रिपुराके स्वरूपका ध्यान करते रहते ॥ २५ ॥ इस प्रकार उनका बारह वर्षका समय एक निमेषके समान व्यतीत हो गया। तब एक दिन आनन्दसे बैठे हुए वे जमदग्निनन्दन सोचने लगे ॥ २६ ॥ पहले कभी मार्गमें चलते हुए मेरे प्रश्न करनेपर मुझसे महर्षि संवर्तने जो बात कही थी वह उस समय मेरी समझमें कुछ भी नहीं आयो ॥ २७ ॥

६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विस्मृतश्च मया यस्मात्प्राङ् न पृष्टं गुरुं प्रति । माहात्म्यं त्रिपुराशक्तेः श्रुतं श्रीगुरुवक्त्रतः ॥ २८ ॥ परन्तु तन्न विदितं यत्संवर्त्तः पुराऽब्रवीत् । मया सृष्टिप्रसङ्गेन पृष्टं किञ्चिद्गुरुं प्रति ॥ २९ ॥ तदा कटकृदाख्यानं वर्णयित्वा च मे गुरुः । नाब्रवीदप्रकृततस्तन्मे तत्तादृशं स्थितम् ॥ ३० ॥ लोकस्य गतिमेतान्तु न जानाम्यपि लेशतः । कस्मादिदं समुदितं जगदाडम्बरं महत् ॥ ३१ ॥ कुत्र वा गच्छति पुनः कुत्र संस्थानमृच्छति । अस्थिरन्तु प्रपश्यामि सर्वं सर्वत्र किञ्चन ॥ ३२ ॥ व्यवहारः स्थिरप्रायः कस्मादेतदपीदृशम् । चित्रां जगत्प्रवृत्तिं प्रपश्याम्यविमर्शिनीम् ॥ ३३ ॥ फिर मैं उसे भूल गया, इसलिये गुरुजीसे भी नहीं पूछा। हाँ, गुरुदेवके मुखारविन्दसे मैंने भगवती त्रिपुराका माहात्म्य अवश्य सुना ॥ २८ ॥ परन्तु जो बात पहले संवर्तजीने कही थी वह मुझे तब भी मालूम नहीं हुई। मैंने गुरुजीसे भी सृष्टिके प्रसंगमें कुछ पूछा तो अवश्य था ॥ २९ ॥ तब उन्होंने इसे कटकृत् आख्यान¹ बतलाकर अप्रासंगिक होनेके कारण इस विषयमें कुछ भी नहीं कहा और यह बात वहीं रह गयी ॥३०॥ किन्तु मुझे लोककी इस गति-विधिका लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। यह इतना बड़ा विश्वप्रपञ्च कहाँ से खड़ा हो गया ॥ ३१ ॥ कहाँ यह जा रहा है और कहाँ जाकर स्थिर होगा। जहाँ भी जो कुछ है वह सभी मुझे अस्थिर दिखायी देता है ॥ ३२ ॥ [ और जब सभी पदार्थ अस्थिर हैं तब उनके आश्रित रहनेवाला 'यह मेरा है, यह तेरा है' ] इस प्रकारका व्यवहार भी कैसे स्थिर हो १. 'कटकृत्' कहते हैं चटाई बुननेवालेको। वे चटाई बुनते हुए जैसे जहाँ- वहाँकी अनेकों अप्रासंगिक बातें करते रहते हैं उसी प्रकार प्रस्तुत विषय न होनेके कारण उस समय श्रीदत्तात्रेयजीने सृष्टिविषयक चर्चाको 'कटकृत् आख्यान' कहा ।

१. अध्याय १-५: दत्तात्रेय-परशुराम संवाद, संसार-दोष एवं हेमचूड़-हेमलेखा आख्यान

प्रथमोऽध्यायः। ७ अहो यथान्धानुगतो ह्यन्धश्चेष्टति तादृशः। लोकस्य व्यवहारो वै सर्वस्याप्यभिलक्षितः ॥ ३४ ॥ निदर्शनं ह्यात्मकृतिरत्र मे सर्वथा भवेत् । नूनं मम शैशवे किं जातं तन्मे न भावितम् ॥ ३५ ॥ कौमारे चान्यथा वृत्तं तारुण्येऽपि ततोऽन्यथा। इदानीमन्यथैवास्ति व्यापारो मम सर्वथा ॥ ३६ ॥ किम्भूतफलमेतेषां तन्न वेद्मि कथञ्चन। यद्यत्काले यच्च यच्च क्रियते येन येन वै ॥ ३७ ॥ सम्यगेवेति तद्बुद्ध्या फलावष्टम्भपूर्वकम् । फलं किं तत्र सम्प्राप्तं केन वा सुखमात्मनः ॥ ३८ ॥ यच्चापि लोके फलवदविमृश्यफलं हि तत् । न फलं तदहं मन्ये पुनर्यस्मात्करोति सः ॥ ३९ ॥ सकता है ? संसारका यह सारा व्यवहार मुझे बड़ा ही विचित्र जान पड़ता है। इसमें विचार कुछ भी नहीं जान पड़ता ॥ ३३ ॥ अजी, जैसे अन्धेके पीछे चलनेवाला अन्धा भी उसी ओर चलाँ जाता है वैसे ही यह सम्पूर्ण लोकका व्यवहार दिखायी देता है ॥ ३४ ॥ [ औरोंके विषयमें क्या कहा जाय ] इस विषयमें मेरे लिये अपना व्यवहार ही पूरा दृष्टान्त है। अवश्य ही, बचपनमें क्या हुआ, सो तो मुझे स्मरण नहीं है ॥ ३५ ॥ किन्तु कुमार-अवस्था में मेरा दूसरा ही व्यवहार था और युवावस्था में उससे सर्वथा भिन्न तथा अब मेरा आचरण उससे भी एकदम निराला है ॥ ३६ ॥ किन्तु उन आचरणोंका फल क्या हुआ यह मैं कुछ नहीं जानता। जिस-जिस व्यक्तिके द्वारा जिस-जिस समय जो-जो कर्म 'यह उचित ही है' ऐसा समझकर फलको सामने रखते हुए किया जाता है, उनमेंसे किसीको क्या कोई फल मिला ? क्या कोई सुखी हुआ ? ॥ ३७-३८ ॥ लोकमें जो फल-जैसा जान पड़ता है वह अविचार-दृष्टि से ही फल है। मैं उसे फल नहीं मानता, क्योंकि फिर भी तो वह फलप्राप्तिके लिये उद्योग करता ही है ॥ ३६ ॥

८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्राप्ते फले फलेच्छावान् पुनर्भूयात्कथं वद । यस्मान्नित्यं करोत्येव जनः सर्वः फलेहया ॥ ४० ॥ फलं तदेव सम्प्रोक्तं दुःखहानिः सुखञ्च वा । कर्त्तव्यशेषे नो दुःखनाशो वा सुखमेव वा ॥ ४१ ॥ कर्त्तव्यतैव दुःखानां परमं दुःखमुच्यते । तत्सत्त्वे तु कथन्ते स्तो दुःखाभावः सुखञ्च वा ॥ ४२ ॥ यथा दग्धाखिलाङ्गस्य पादे पाटीरलेपनम् । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४३ ॥ यथा शराविद्धहृदः परिष्वङ्गोऽप्सरोगणैः । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४४ ॥ यथा क्षयामयाविष्टनरस्य गीतसंस्तुतिः । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४५ ॥ यदि फल प्राप्त हो गया तो बताओ, वह पुनः फलकी इच्छावाला क्यों होता है ? तथापि सब लोग फलकी कामनासे कर्म करनेमें लगे ही रहते हैं ॥ ४० ॥ वास्तवमें फल तो उसीको कहा जाता है जिससे दुःखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति हो जाय । जबतक कर्म करना शेष है तबतक न तो दुःखकी निवृत्ति कही जा सकती है और न सुखकी प्राप्ति ॥ ४१ ॥ वास्तवमें कर्त्तव्यता ही सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख कहा जाता है । जबतक वह बनी हुई है तबतक तुझे दुःखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ४२ ॥ जिस प्रकार किसीका सारा शरीर झुलस जाय और उसके पैरपर चन्दनका लेप किया जाय, उसी प्रकार जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४३ ॥ जैसे किसीका वक्षःस्थल बाणोंसे विदीर्ण हो गया हो और फिर अप्सराएँ उसका आलिंगन करें, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४४ ॥ अथवा जैसे कोई पुरुष क्षयरोगसे ग्रस्त हो और उसकी संगीत- द्वारा स्तुति की जाय, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे इस लोकमें सुखकी प्राप्ति बतलाना है ॥ ४५ ॥

प्रथमोऽध्यायः । ६ सुखिनस्ते हि लोकेषु ये कर्त्तव्यतया स्थिताः । पूर्णाशया महात्मानः सर्वदेहसुशीतलाः ॥ ४६ ॥ यदि कर्त्तव्यशेषेऽपि सुखं स्यात्केमचित्क्वचित् । शूलप्रोतेऽपि च नरे स्यात्सुखं गन्धमाल्यजम् ॥ ४७ ॥ अहो महच्चित्रमेतत् · कर्त्तव्यशतसङ्कुले । सुखमस्तीह यस्यार्थे करोत्येव सदा जनः ॥ ४८ ॥ अहो विचारमाहात्म्यं किं वदामि नृणामहम् । अनन्तकर्त्तव्यशैलाक्रान्ताः सौख्यं लभन्ति च ॥ ४९ ॥ तथा सौख्याय यतते सार्वभौमस्तु सर्वदा । तथैव यतते नित्यमपि भिक्षाटने रतः ॥ ५० ॥ पृथक् तौ प्राप्नुतः सौख्यं मन्येते कृतकृत्यताम् । तद्येन यान्ति सर्वेऽपि याम्यहं तानुक्रमात् ॥ ५१ ॥ वास्तवमें लोकमें सुखी तो वे ही हैं, जो कर्त्तव्यके बोझसे सर्वथा मुक्त होकर विराजमान हैं । वे पूर्णकाम होनेके कारण महात्मा हैं और उनके अन्तर्बाह्य सभी अंग शीतल होते हैं ॥ ४६ ॥ यदि कर्त्तव्यका भार रहते हुए भी किसीको कभी सुख होना सम्भव हो तो शूलीसे बिंध जानेपर भी मनुष्यको चन्दन और माला द्वारा सुख प्राप्त हो सकता है ॥ ४७ ॥ अहो ! यह बड़ी ही विचित्र बात है कि सैकड़ों कर्त्तव्योंके भारसे लदे होनेपर भी मनुष्य यह समझता है कि इसीमें सुख है और उसीके लिये सदा प्रयत्न भी करता रहता है ॥ ४८ ॥ मैं लोगोंके इस अविचारकी महिमा (!) कहाँतक कहूँ कि वे अनन्त कर्त्तव्यरूप पर्वतोंके भारसे दबे रहकर भी अपनेको सुखी मानते रहते हैं ॥ ४९ ॥ जिस प्रकार कोई सार्वभौम सम्राट् सर्वदा सुखप्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है उसी प्रकार भिखारी भी निरन्तर सुख ही की खोजमें रहता है ॥ ५० ॥ और दोनोंको अलग-अलग सुख भी मिलते हैं, जिन्हें पाकर वे अपनेको कृत-कृत्य मानते हैं । तो क्या जिस क्रमसे सब लोग चल

१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्ड अनालोच्य फलञ्चापि यथान्धोऽन्धानुगस्तथा । तदलं मेधयानेन भूयो गत्वा दयानिधिम् ॥ ५२ ॥ विजिज्ञासितजिज्ञास्यो विचिकित्साम्बुधेः परम् । पारं प्रपत्स्ये सुशुभं गुरुवाक्प्लवमाश्रितः ॥ ५३ ॥ इति व्यवस्य सहसा जामदग्न्यः शुभाशयः । प्रतस्थे तद्गिरिवराद् गुरुदर्शनकाङ्क्षया ॥ ५४ ॥ गन्धमादनशैलेन्द्रं प्राप्य शीघ्रमपश्यत । गुरुं पद्मासनासीनं भूभास्वन्तमिव स्थितम् ॥ ५५ ॥ प्रणाम पादपीठं पुरतो भुवि दण्डवत् । शिरसाऽपीडयत्पादपद्मं निजकराश्रितम् ॥ ५६ ॥ अथैवं प्रणतं रामं दत्तात्रेयः प्रसन्नधीः । आशीर्भिर्योजयामास समुत्थापयदादरात् ॥ ५७ ॥


रहे हैं उन्हींके समान परिणामपर कोई ध्यान न देकर अन्धेके पीछे चलनेवाले अन्धेके समान मैं भी उसीका अनुसरण करूँ? ॥५१-५२ पू०॥ अच्छा, अब इस अविचारको छोड़कर फिर दयाके भण्डार श्रीगुरुदेवके ही पास चलूँ और उनसे अपने जिज्ञास्य विषयकी जिज्ञासा करूँ। इस प्रकार गुरुवाक्यरूप नौकाका आश्रय लेकर मैं इस संशयसागरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जो सब प्रकार मंगलमय है ॥ ५२ उ०-५३ ॥ ऐसा निश्चय कर विशुद्ध अन्तःकरणवाले परशुरामजी गुरुदेवके दर्शनोंकी लालसासे तत्काल उस महेन्द्र पर्वतसे चल पड़े ॥ ५४ ॥ वहाँसे शीघ्र ही गन्धमादन पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने भूर्लोकके सूर्यके समान तेजस्वी गुरुदेवको पद्मासनसे विराजमान देखा ॥ ५५ ॥ उन्होंने गुरुदेवकी चरणपादुकाओंके सम्मुख पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम किया और फिर अपने हाथोंमें उनके चरणकमलोंको लेकर उनपर सिर रखा ॥ ५६ ॥ परशुरामको इस प्रकार प्रणाम करते देखकर गुरु दत्तात्रेयका अन्तःकरण प्रसन्न हो गया, उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और फिर आदरपूर्वक उठाया ॥ ५७ ॥

प्रथमोऽध्यायः । ११ वत्सोत्तिष्ठ चिरादद्य त्वां पश्यामि समागतम् । ब्रूहि स्वात्मभवं वृत्तं निरामयतया स्थितम् ॥ ५८ ॥ अथोत्थाय गुरूक्त्या स गुर्वादिष्टाम्यविष्टरः । उपविश्य प्रसन्नात्मा बद्धाञ्जलिपुटोऽब्रवीत् ॥ ५९ ॥ श्रीगुरो ! करुणासिन्धो ! त्वत्कृपामृत आप्लुतः । कथं स परिभूयेत विधिसृष्टैरथामयैः ॥ ६० ॥ त्वत्कृपात्मामृतकरमण्डलान्तःस्थितन्तु माम् । सन्तापयेत्कथं व्याधिश्चण्डांशुरतिभीषणः ॥ ६१ ॥ आन्तरं बाह्यमपि ते कृपयानन्दितं मम । सदा स्थितं किन्तु भवत्पादाब्जवियुतिं विना ॥ ६२ ॥ नान्यद्रुजावहं किञ्चिदासीन्मे लेशतः क्वचित् । तद्भवच्चरणाम्भोजदर्शनादद्य वै पुनः ॥ ६३ ॥ सम्पूर्णता सदापन्ना सर्वथा श्रीगुरो ननु । तत् किञ्चिच्चिरसंवृतं हृदि मे परिवर्तते ॥ ६४ ॥ [ फिर कहने लगे-] 'बेटा ! उठो । आज बहुत काल पश्चात् भेंट हुई । अपना वृत्तान्त सुनाओ । स्वस्थ तो रहे ?' ॥ ५८ ॥ गुरुदेवके इस प्रकार कहनेपर परशुराम उठे और उनके बतलाये हुए आसनपर बैठकर प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़कर बोले ॥ ५९ ॥ 'करुणासागर गुरुदेव ! जो आपके कृपामृतमें डुबकी लगा चुका है वह विधाताके रचे रोगादिसे कैसे आक्रान्त हो सकता है ॥ ६० ॥ मैं तो आपके कृपामय चन्द्रमण्डलके भीतर स्थित हूँ। फिर व्याधिरूप अत्यन्त भीषण भास्कर मुझे कैसे सन्तप्त कर सकता ? ॥ ६१ ॥ मैं तो बाहर-भीतर सर्वदा आपकी कृपासे आनन्दित हूँ। आपके चरणकमलोंके वियोगके सिवा और किसी व्याधिका मुझे कभी कहीं लेशमात्र भी पता नहीं है। सो आज आपके चरणारविन्दों- का दर्शन करके वह कमी भी सब प्रकार पूरी हो गयी है। तथापि बहुत दिनोंसे एक बात मेरे हृदयमें खटकती रहती है ॥ ६२-६४ ॥

१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्प्रष्टुं त्वाभिवाञ्छामि चिरसंशयितान्तरः । आज्ञप्तो भवताद्याहं पृच्छामि विचिकित्सितम् ॥ ६५ ॥ संश्रुत्यैवं भार्गवोक्तिं दत्तात्रेयो दयानिधिः । सम्प्रहृष्टमना राममूचे प्रीत्याथ भार्गवम् ॥ ६६ ॥ पृच्छ भार्गव यत्तेऽद्य प्रष्टव्यं चिरसम्भृतम् । तव भक्त्या प्रसन्नोऽस्मि प्रब्रवीमि तवेप्सितम् ॥ ६७ ॥ इति श्रीमदितिहासोत्तमे त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भार्गवप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः। उसके कारण चिरकालसे मेरा अन्तःकरण संशयापन्न रहता है, वह मैं आपसे पूछना चाहता हूँ। यदि आज्ञा हो तो आज आपसे अपनी शंका पूछूँ ॥ ६५ ॥ परशुरामका ऐसा कथन सुनकर दयानिधि दत्तात्रेयजीका हृदय आनन्दित हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर भृगुनन्दन परशुरामसे कहा ॥ ६६ ॥ 'भार्गव ! तुम्हारे चित्तमें चिरकालसे जो प्रश्न बसा हुआ है वह पूछो। मैं तुम्हारे भक्तिभावसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहते हो वह मैं बताऊँगा' ॥ ६७ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ।

द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ प्रश्रयावनतो भूत्वा सम्प्रष्टुमुपचक्रमे । इत्याज्ञप्तो जामदग्न्यः प्रणम्याऽत्रिसुतं मुनिम् ॥ १ ॥ भगवन् गुरुनाथार्य सर्वज्ञ करुणानिधे ! पुरा मे नृपवंशेषु क्रोधः कारणतो ह्यभूत् ॥ २ ॥ तद्भूयो निहतं क्षात्रं सगर्भं सस्तनन्धयम् । मया त्रिःसप्तकृत्वो वै क्षत्रासृग्भरिते हृदे ॥ ३ ॥ सन्तर्पिताः पितृगणास्तुष्टा मद्भक्तिगौरवात् । मत्क्रोधं शामयामासुः शान्तः पित्राज्ञयाप्यहम् ॥ ४ ॥ सम्प्रत्ययोध्यामध्यास्ते यः श्रीरामो हरिः स्वयम् । क्रोधान्धस्तेन भूयोऽहं सङ्गतो वलदर्पितः ॥ ५ ॥ द्वितीय अध्याय ॥ २ ॥ परशुरामका प्रश्न, गुरुदेवका आश्वासन इस प्रकार आज्ञा मिलनेपर परशुरामजीने अत्रिनन्दन श्रीदत्तात्रेय मुनिको प्रणाम किया और अत्यन्त विनीत होकर पूछने लगे ॥ १ ॥ भगवन् ! आप मेरे गुरुदेव, स्वामी और पूज्य हैं । करुणानिधे ! आप सभी कुछ जानते हैं । बहुत दिनोंकी बात है; एक विशेष कारणसे मुझे क्षत्रिय वंशोंके प्रति क्रोध हुआ था ॥ २ ॥ अतः मैंने इक्कीस बारमें गर्भ और बच्चोंको भी न छोड़कर सम्पूर्ण क्षत्रियोंका संहार कर डाला था और उनके रक्तसे कुण्ड भर दिये थे ॥ ३ ॥ उस रक्तसे मैंने पितरोंका तर्पण किया । मेरे ऐसे भक्तिभावसे पितृगण प्रसन्न हुए और उन्होंने मेरे क्रोधको शान्त किया । इस प्रकार पितरोंकी आज्ञासे शान्त होनेपर भी [ जब मुझे मालूम हुआ कि ] अभी अयोध्यामें स्वयं भगवान् विष्णु रामरूपसे विराजमान हैं तो मैं बलके घमण्डसे क्रोधान्ध होकर उनसे जा भिड़ा ॥ ४-५ ॥

१४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तेन दर्पाद्भगवता च्यावितश्च पराजितः । जीवन्कथञ्चिन्निर्यातो ब्रह्मण्येनानुकम्पिना ॥ ६ ॥ अथ मामुपसम्प्राप्तो निर्वेदः परिभावितम् । ततोऽत्यन्तं पथि मया बहुधा परिदेवितम् ॥ ७ ॥ संवर्त्तमवधूतेन्द्रं मार्गेऽकस्मात्समासदम् । भस्मच्छन्नाग्निवद् गूढं कथञ्चिदविदन्तदा ॥ ८ ॥ सन्तप्त इव नीहारं तं सर्वाङ्गसुशीतलम् । सङ्गम्यैवातिशिशिरभावमासादयन्तदा ॥ ९ ॥ मया स्वस्थितिमापृष्टः प्राहामृतसुपेशलम् । सुसारपिण्डवत्सर्वं निष्कृष्य प्रत्यपादयत् ॥ १० ॥ नाहं तदशकं ग्रहीतुं रङ्को राज्ञीं यथा तथा । भूयः सम्प्रार्थितः सोऽथ भवन्तं मे विनिर्दिशत् ॥ ११ ॥ तब भगवान्ने मुझे परास्त करके उस दर्पसे नीचे गिराया। वे बड़े ब्राह्मणभक्त और दयालु थे, इसलिये किसी प्रकार जीवित छोड़ दिया ॥ ६ ॥ इस प्रकार परास्त होनेपर मुझे बड़ा वैराग्य हुआ और वहाँ से लौटते समय मार्गमें मैं बहुत खेद करता रहा ॥ ७ ॥ मार्गमें अकस्मात् अवधूतशिरोमणि संवर्तजीसे मेरी भेंट हो गयी। वे भस्मसे ढके अग्निके समान अपने स्वरूपको छिपाये हुए थे। अतः मैं बड़ी कठिनतासे उन्हें पहचान सका ॥ ८ ॥ जिस प्रकार घामसे तपे हुए पुरुषको कुहरा आ जानेसे बड़ी शान्ति मिलती है, उसी प्रकार उन सर्वाङ्गशीतल महापुरुषका समागम होनेसे मुझे उस समय बड़ी शान्ति मिली ॥ ९ ॥ मैंने जब उनकी स्थितिके विषयमें प्रश्न किया तो उन्होंने अमृतके समान बड़ा ही मधुर उत्तर दिया और सभी शास्त्रोंका सारसर्वस्व निकालकर तत्त्वका प्रतिपादन किया ॥ १० ॥ किन्तु जैसे महादरिद्री राजलक्ष्मीको ग्रहण नहीं कर पाता उसी प्रकार मैं उनकी बात समझ नहीं सका। जब मैंने उनसे पुनः प्रार्थना की तो उन्होंने आपके पास जानेका आदेश दिया ॥ ११ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । १५ तद्भवचरणद्वन्द्वं तत आसादितं मया । अन्धो जनसमायोगमिवात्यन्तसुखावहम् ॥ १२ ॥ तन्मे न विदितं किञ्चित्संवर्त्तमुनिराह यत् । श्रुतं माहात्म्यमखिलं त्रिपुराभक्तिकारकम् ॥ १३ ॥ सा भवद्रूपिणी देवी हृदि नित्यं समाहिता । एवं मे वर्त्तमानस्य किं फलं समवाप्यते ॥ १४ ॥ भगवन् कृपया ब्रूहि यत्संवर्त्तः पुरावदत् । अविदित्वा च तन्नास्ति क्वचिच्च कृतकृत्यता ॥ १५ ॥ तदुक्तमविदित्वा तु यद्यच्च क्रियते मया । तद्वालक्रीडनमिव प्रतिभाति समन्ततः ॥ १६ ॥ पुरा मया हि बहुशः क्रतुभिर्दक्षिणोच्छ्रयैः । प्रभृतान्नगणैरिष्टा देवाः शक्रमुखा ननु ॥ १७ ॥ अतः मैं वहाँ से आपके चरणयुगलकी शरणमें आया हूँ, जैसे कोई [अकेला भटकता हुआ] अन्धा अत्यन्त सुखदायक जनसमाजमें आ जाय ॥ १२ ॥ मुझसे संवर्त्त मुनिने जो कुछ कहा वह मैंने कुछ भी नहीं समझा। आपके मुखारविन्दसे पहले मैंने भगवती त्रिपुरामें भक्तिभाव जागृत करनेवाला माहात्म्य पूरा सुना था ॥ १३ ॥ वह त्रिपुरादेवी साक्षात् आपका ही स्वरूप है। वह सर्वदा मेरे हृदयमें विराजमान है। इस स्थितिमें रहते हुए मुझे किस फलकी प्राप्ति होगी ॥ १४ ॥ इसके सिवा भगवन् ! संवर्त्तजीने मुझसे पहले जो बात कही थी, कृपया वह भी समझा दीजिये, क्योंकि उसे बिना समझे कभी कृतकृत्यता प्राप्त नहीं हो सकती ॥ १५ ॥ उनकी कही हुई बातको समझे बिना मैं जो कुछ भी करता हूँ वह मुझे सब प्रकार बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें मैंने यज्ञोंद्वारा इन्द्रादि देवताओंका पूजन किया था। उन यज्ञोंमें बड़ी-बड़ी दक्षिणाएँ दी थीं और खूब अन्नदान किया था ॥ १७ ॥

१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तदल्पफलमेवेति श्रुतं संवर्त्तवक्त्रतः । मन्ये तदहमल्पं यद् दुःखमेवेति सर्वथा ॥ १८ ॥ असुखं नहि दुःखं स्याद् दुःखमल्पं सुखं स्मृतम् । यतः सुखात्यये दुःखं भवेद् गुरुतरं किल ॥ १९ ॥ नैतावदेव चैतस्मादधिकं चास्ति वैभवम् । मृत्यूपयोगो यद्भूयो न तन्न स्यात्कदाचन ॥ २० ॥ एवमेव भवेद्यन्मे क्रियते त्रिपुराविधौ । बालक्रोडेव मे भाति सर्वं तन्मानसं यतः ॥ २१ ॥ एतद्यदुक्तं भवता कर्तुं तस्यादितोऽन्यथा । नियतं चाप्यन्यथा तद्वचोभेदसमाश्रयात् ॥ २२ ॥ आलम्बभेदतश्चापि विविधं प्रतिपद्यते । कथमेतत्क्रतुसममसत्यफलसम्मितम् ॥ २३ ॥ किन्तु संवर्त्तजीके मुखसे सुना कि वे सब तो तुच्छ फल देनेवाले हैं। और जो तुच्छ होता है उसे तो मैं सर्वथा दुःखरूप ही मानता हूँ ॥ १८ ॥ वास्तवमें सुखका अभाव ही दुःख नहीं है, अल्प सुख भी दुःख ही माना जाता है; क्योंकि सुखका अन्त होनेपर भी बड़ा भारी दुःख होता है ॥ १९ ॥ इतना ही नहीं, इस कर्मकाण्डमें एक इससे भी बड़ा भय यह है कि अन्तमें मृत्यु होती है, और ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे वह न हो ॥ २० ॥ त्रिपुरादेवीकी उपासनामें मैं जो कुछ करता हूँ उससे भी ऐसा ही होता है। क्योंकि वह सब भी मानसिक व्यापार ही है, अतः मुझे तो बच्चोंका खेल-सा जान पड़ता है ॥ २१ ॥ आपने जिस विधिसे उपासना करनेको कहा था उस प्रकार भी की जा सकती है और अन्य प्रकार भी। [ कर्मानुष्ठानके समान ] विधिसे भी उसका अनुष्ठान हो सकता है और [ भावकी प्रधानतासे ] बिना विधिके भी; क्योंकि शास्त्रोंमें मतभेद है ही ॥ २२ ॥ इसके सिवा आलम्बन ( इष्टदेव ) के भेदसे भी उपासना अनेक प्रकारकी है। इस प्रकार असत्य फलवाली होनेसे यह यज्ञोंके समान ही क्यों नहीं है ? ॥ २३ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । १७ अप्यसत्यात्मकं यस्मात् कथं सत्यसमं भवेत् । अथापि नित्यकर्त्तव्यमेतन्नास्यावधिः क्वचित् ॥ २४ ॥ लक्षितो मे स भगवन् संवर्त्तः सर्वशीतलः । कर्त्तव्यलेशविषमविषज्वालावनिर्गतः ॥ २५ ॥ हसन्निव लोकतन्त्रमभयं मार्गमाश्रितः । वने दावाग्निसङ्कीर्णे हिमाम्बुस्थगजोपमः ॥ २६ ॥ सर्वकर्त्तव्यवैकल्यामृतसंस्वादनन्दितः । कथमेतां दशां प्राप्तो यच्च मामाह तत्पुरा ॥ २७ ॥ सर्वमेतत् सुकृपया गुरो मे वक्तुमर्हसि । कर्त्तव्यकालभुजगनिगीर्णं मां विमोचय ॥ २८ ॥ इत्युक्त्वा चरणौ मूर्ध्ना गृहीत्वा दण्डवन्नतः । अथ दृष्ट्वा तथाभूतं भार्गवं मुक्तिभाजनम् ॥ २९ ॥ अतः [ कृतिसाध्य होनेके कारण ] असत्यरूप होनेपर भी यह सत्यके समान कैसे हो सकती है ? यदि कहो कि [ 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतꣳसमाः' इस श्रुतिवचन के अनुसार ] यह तो मनुष्यको नित्य करते ही रहना चाहिये, तब तो कभी इसकी समाप्ति ही नहीं होगी ॥ २४ ॥ किन्तु भगवान् संवर्त्त मुनि तो मुझे सब प्रकार शान्त प्रतीत होते थे । वे तो कर्त्तव्यकी लेशमात्र विषमविषमयी ज्वालासे भी मुक्त हो चुके थे ॥ २५ ॥ इस लोकव्यवहारको देखकर उन्हें मानो हँसी आती थी और वे भयशून्य मार्गपर आरूढ थे; जैसे दावाग्निसे व्याप्त वनमें कोई शीतल- जलमें खड़ा हुआ गजराज हो ॥ २६ ॥ वे सर्वकर्त्तव्यविमुक्ति रूप अमृतका आस्वादन करके परम आनन्दित जान पड़ते थे । ऐसी अवस्था उन्हें कैसे प्राप्त हुई, जिसका कि उस समय उन्होंने मुझसे भी वर्णन किया था ॥ २७ ॥ गुरुदेव ! कृपापूर्वक यह सब रहस्य मुझे बताइये । मुझे कर्त्तव्यरूप काले नागने डसा हुआ है, उससे आप मुझे छुड़ा लीजिये ॥ २८ ॥ ऐसा कहकर परशुरामने उनके दोनों चरणोंको सिरपर रखकर दण्डवत् प्रणाम किया । तब परशुरामकी ऐसी स्थिति और उन्हें मुक्तिका

१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे दयमानस्वभावोऽथ दत्तो वक्तुमुपाक्रमत् । वत्स भार्गव धन्योऽसि यस्य ते बुद्धिरीदृशी ॥ ३० ॥ अब्धौ निमज्जतो नौकासम्प्राप्तिरिव सङ्गता । एतावदेव सुकृतिः क्रियाभिरुपसङ्गतः ॥ ३१ ॥ स्वात्मानमारोहयति पदे परमपावने । सा देवी त्रिपुरा सर्वहृदयाकाशरूपिणी ॥ ३२ ॥ अनन्यशरणं भक्तं प्रत्येवं रूपिणी द्रुतम् । हृदयान्तःपरिणता मोचयेन्मृत्युजालतः ॥ ३३ ॥ यावत् कर्त्तव्यवेतालान्न बिभेति दृढं नरः । न तावत् सुखमाप्नोति वेतालाविष्टवत् सदा ॥ ३४ ॥ नृणां कर्त्तव्यकालाहिसन्दष्टानां कथं शुभम् । करालगरलज्वालाक्रान्ताङ्गानामिव क्वचित् ॥ ३५ ॥ अधिकारी देखकर सहजदयालु भगवान् दत्तात्रेयने कहना आरम्भ किया—बेटा परशुराम ! तुम्हें ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई, अतः तुम धन्य हो । यह ऐसी है जैसे किसी समुद्रमें डूबनेवालेको नौका मिल जाय ॥ २९-३१ पू० ॥ उपासना आदि क्रियाओंके द्वारा पुण्यवान् पुरुषको यही प्राप्त होता है कि वह अपने-आपको परमपवित्र पदमें आरूढ कर सकता है ॥ ३१ उ०-३२ पू० ॥ देवी त्रिपुरा सभीकी हृदयाकाशस्वरूपा है [—उसका यद्यपि कोई आकार नहीं है—] तथापि अपने अनन्यशरण भक्तके लिये वह तुरन्त मूर्त्तिमती हो जाती है और उसके अन्तःकरणमें आविर्भूत होकर वह उसे मृत्युके पाशसे मुक्त कर देती है ॥ ३२ उ०-३३ ॥ जबतक मनुष्यको इस कर्त्तव्यरूप पिशाचका भारी भय नहीं होता, तबतक उसे सुखकी प्राप्ति नहीं होती, वह भूताविष्ट व्यक्तिके समान विक्षिप्त रहता है ॥ ३४ ॥ भीषण विषकी ज्वालासे जिसके अंग-प्रत्यंगोंमें दाह हो रहा हो उस व्यक्तिके समान कर्त्तव्यरूप काले नागसे डसे हुए पुरुषका कल्याण भला कैसे हो सकता है ? ॥ ३५ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । १६ कर्त्तव्यविषसंसर्गमूर्च्छितं पश्य वै जगत् । अन्धीभूतं न जानाति क्रियां स्वस्य हितात्मिकाम् ॥ ३६ ॥ अन्यथा चेष्टते भूयो मोहमापद्यते पुनः । एवंविधो हि लोकोऽयं कर्त्तव्यविषमूर्च्छितः ॥ ३७ ॥ अनादिकालतो भीमे पच्यते विषसागरे । यथा हि केचित्पथिकाः प्राप्ता विन्ध्यं महानगम् ॥ ३८ ॥ क्षुधाभरसमाक्रान्ताः फलानि ददृशुर्वने । विषमुष्टिफलान्याशु तिन्दुकस्य फलेहया ॥ ३९ ॥ भक्षयामासुरत्यन्तक्षुधानष्टरसेन्द्रियाः । अथ ते तद्विषज्वालाज्वलिताङ्गाः सुपीडिताः ॥ ४० ॥ अन्धीभूता विचिन्वन्तस्तद्विषोष्णप्रशान्तये । अविदित्वा मुष्टिफलं तिन्दुकफलनिषेवणात् ॥ ४१ ॥ मत्वा ज्वालां निजे देहे धत्तूरफलमासदुः । भ्रान्त्या जम्बीरबुद्ध्या तत् सर्वैरासीह सुभक्षितम् ॥ ४२ ॥ देखो, यह सारा संसार कर्त्तव्यरूप विषके संसर्गसे मूर्च्छित होनेके कारण अन्धा हो रहा है, इसलिये इसे अपना हित करनेवाली क्रियाका पता नहीं लगता ॥ ३६ ॥ यह बार-बार उलटे ही कर्म करता है और पुनः पुनः मोहग्रस्त होता रहता है। कर्त्तव्यरूप विषसे मूर्च्छित यह लोक अनादिकालसे इसी प्रकार भीषण विषसमुद्रमें सन्तप्त हो रहा है ॥ ३७-३८ पू० ॥ [ यह बात ऐसी है जैसे—] कुछ यात्री पर्वतराज विन्ध्याचलपर जा पहुँचे। वे भूखसे अत्यन्त व्याकुल थे। वहां वे फल खोजने लगे, और काजूके फल समझकर कुचलाके फल खा गये। अत्यन्त क्षुधातुर होनेके कारण उनकी रसनेन्द्रिय शक्तिहीन हो गयी थी। [ अतः उनके स्वादकी ओर उनका ध्यान नहीं गया ] ॥ ३८ उ०-४० पू० ॥ अब कुचलाके विषकी ज्वालासे उनके अंग-अंगमें जलन होने लगी। उससे उन्हें बड़ी बेचैनी हुई। उन्हें यह तो पता था नहीं कि हमने कुचलाके फल खा लिये हैं, अतः अपने शरीर में उस ज्वालाको काजू खानेका ही परिणाम समझकर वे अन्धे-से होकर उसकी शान्तिके

२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे उन्मत्ताश्च ततोऽभूवन् मार्गाद् भ्रष्टाश्च ते तदा । अन्धीभूयातिगहने पतन्तो निम्नभूमिषु ॥ ४३ ॥ कण्टकैःक्षतसर्वाङ्गा भग्नबाहूरुपादकाः । अधिक्षिपन्तश्चान्योऽन्यं कलहञ्चक्रुरुच्चकैः ॥ ४४ ॥ मुष्टिभिश्च शिलाभिश्च काष्ठैर्जघ्नुः परस्परम् । अथ ते दीर्णसर्वाङ्गाः पुरं कञ्चित् समासदुः ॥ ४५ ॥ निशीथे दैववशतः पुरद्वारमुपाययुः । पुरद्वाराधिपालैस्ते प्रतिरुद्धाः प्रवेशने ॥ ४६ ॥ देशकालानभिज्ञानात् कलहञ्चक्रुरुच्चकैः । अथ ते प्रहृता द्वारपालैरतितरां यदा ॥ ४७ ॥ तदा पलायनपरा बभूवुः परितस्तु ते । पतिताः परिखे केचिद् भक्षिता मकरादिभिः ॥ ४८ ॥

लिये खोज करने लगे तो उन्हें धतूरेके फल मिल गये । भ्रमवश उन सबने उन्हें नीबू समझकर खा लिया ॥ ४० उ०-४२ ॥ इससे वे और भी पागल हो गये और अपने मार्गसे भटककर उस घोर जंगलमें गड्ढोंमें गिरने-पड़ने लगे ॥ ४३ ॥ उनके सारे शरीरमें काँटे लग गये, हाथ-पैर और घुटने घायल हो गये तथा वे एक दूसरेको बुरा-भला कहकर आपसमें बड़ा कलह करने लगे ॥ ४४ ॥ होते-होते वे एक-दूसरेपर घूँसे, पत्थर और लकड़ियाँ चलाने लगे । इससे उनके सब अंग क्षत-विक्षत हो गये । अन्तमें वे किसी नगरके पास जा निकले ॥ ४५ ॥ दैववश वे आधी रातके समय नगरके द्वारपर पहुँचे । उस समय द्वारपालने उन्हें नगरमें प्रवेश करनेसे रोका ॥ ४६ ॥ उन्हें कुछ देश-कालका ज्ञान तो था ही नहीं, इसलिये वे उनके साथ भी झगड़ा करने लगे । अब तो द्वारपालों ने भी उनको खूब पीटा ॥ ४७ ॥ तब वे इधर-उधर भागने लगे । उनमेंसे कुछ तो नगरकी खाईमें गिर गये और वहाँ मकर आदि जलजन्तुओंने उन्हें खा लिया ॥ ४८ ॥