भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् स्वप्नस्मृत्योर्घटादेर्हि रूपाभासः प्रदृश्यते । पुरा नूनं तदाकारा धीर्दृष्टेत्यनुमीयते ॥ १ ॥ स्वप्नस्मृत्योरिति—स्वप्नकाल और स्मृतिकाल में घट-पटादि पदार्थों का केवल रूपाभास देखा जाता है, इससे यह अनुमान किया जाता है कि पहले अवश्य ही घटपटाकार वृत्ति का अनुभव किया होगा ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व के प्रकरण में यह बताया गया था कि अन्तःकरण के साथ आत्मा का विवेक न होने के कारण संसार की प्रतीति हुआ करती है, स्वतः नहीं। किन्तु जिज्ञासा यह उत्पन्न होती है कि संसार तो प्रत्यक्ष है और अन्तः- करण परोक्ष है। अतः अन्तःकरण (बुद्धि) के अविवेक के कारण संसार की प्रतीति हो नहीं सकती। इस जिज्ञासा के समाधानार्थ इस प्रकरण में अन्तःकरण की परोक्षता का निरसन कर उसकी प्रत्यक्षता को बताते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्त को युक्तिपुरःसर पुष्ट कर रहे हैं। पहिले जो बताया कि संसार की प्रतीति स्वतः नहीं होती, वह तो अन्तःकरण- विषयक अविवेक रहने के कारण आत्मा में संसारित्व की प्रतीति होती है, किन्तु शास्त्र पर अटल विश्वास रखनेवाला अतएव उसे प्रमाण माननेवाला और तदनुसार साधना करने के कारण जिसका अज्ञान और तज्जन्य कार्य निवृत्त हो गया है, ऐसा भाग्यशाली व्यक्ति अपने (आत्मा) को निश्चित रूप से ब्रह्मरूप ही समझने लगता है। क्योंकि स्वप्न में और स्मरणकाल में घट-पटादि विषयों के रूपाभास (आकारावभास) का अनुभव किया जाता है, अतः यह मानना पड़ेगा कि पहले कभी जाग्रदवस्था में अनुभव अवस्था में भी अवश्य ही घट-पटाकारा अन्तःकरणवृत्ति का साक्षात् अनुभव किया होगा। 'स्वप्न और स्मृति दृष्टार्थविषयक होती है', यह नियम है। और स्वप्न तथा स्मृति में बाह्य पदार्थ तो होता नहीं, ऐसी स्थिति में यही स्वीकार करना होगा कि स्वप्न और स्मृतिकाल में उपलभ्यमान विषय (पदार्थ) अन्य कुछ न होकर अर्थाकार हुई वृत्ति से विशिष्ट अन्तःकरण ही है। इससे यह कल्पना की जाती है कि जाग्रत् अवस्था में तथा पूर्वानुभवावस्था में भी अर्थाकारवृत्तिमत् अन्तःकरण ही अपरोक्षरूपेण (प्रत्यक्षतया) अनुभूत हो चुका है। तस्मात् सभी अवस्थाओं में वृत्तिमदन्तःकरण अपरोक्ष है, और उसमें प्रतिफलित चिदाभास है। परन्तु उन दोनों की भिन्नता को न समझ पाने से (अविवेक से) आत्मा में संसारित्व का अवभास (प्रत्यक्ष) होना उचित ही है। एवंच बुद्धि (अन्तःकरण) परोक्ष होने से और संसारप्रतिभास अपरोक्ष होने से बुद्धयविवेकनिबन्धन संसार की प्रतीति आत्मा में नहीं है, इस शंका का समाधान हो जाता है, और बुद्धि की अपरोक्षता सिद्ध हो जाती है ॥ १ ॥ भिक्षामटन्यथा स्वप्ने दृष्टो देहो न स स्वयम् । जाग्रद्दृश्यात्तथा देहाद्दृष्टृत्वादन्य एव सः ॥ २ ॥ भिक्षामिति—जैसे स्वप्नावस्था में भिक्षाटन करते हुए दीखने वाला देह स्वयं स्वप्नद्रष्टा नहीं होता, वैसे ही जाग्रदवस्था में दिखाई देनेवाले देह से भी द्रष्टा होने के कारण वह भिन्न ही है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अन्तःकरण की अपरोक्षता स्पष्ट की गई, उससे यह ज्ञात हुआ कि अन्तःकरणादिसमूह से आत्मा विविक्त (भिन्न) है। इसी को दृष्टान्त देकर बताते हैं—सोये हुए संन्यासी ने स्वप्न में भिक्षार्थ भटकनेवाले जिस देह को देखा, वह देह तो स्वयं द्रष्टा (देखनेवाला) हो नहीं सकता। जैसे देह को आत्मा समझता हुआ भी वह देहरूप (देहात्मक) नहीं होता, वैसे ही जाग्रद् दृश्य देह से भी वह आत्मा पृथक् ही है, क्योंकि वह तो उसका द्रष्टा है। 'देह' शब्द से इन्द्रिय, और अन्तःकरण को भी समझना चाहिये, क्योंकि 'देह' शब्द उपलक्षण है। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा—'विमतो देहादिः न आत्मा, दृश्यत्वात्, स्वप्नदृश्यदेहादिवत् ।' ॥ २ ॥