उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ७३ इत्येवं सर्वदाऽऽत्मानं विद्यात्सर्वं समाहितः । विदित्वा मां स्वदेहस्थमृषिर्मुक्तो ध्रुवो भवेत् ॥२५॥ इतीति—इस प्रकार सर्वदा समाहित चित्त से सबको आत्मस्वरूप समझे और अपने देह में स्थित मुझको जानकर वह सर्वदर्शी ऋषि निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त हो जाय ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार शास्त्र और आचार्य के द्वारा नित्य-मुक्तत्वादिलक्षण आत्मा का ज्ञान कराया गया। अतः उक्त- लक्षण अद्वितीय आत्मा के श्रवण-मनन-निदिध्यासन से युक्त होकर मुमुक्षु व्यक्ति सर्वदा 'अहं ब्रह्मास्मि'=मैं ब्रह्म हूँ ऐसा समझे। अपने को ब्रह्म समझनेवाला वह सर्वदर्शी ऋषि निश्चित ही मुक्त हो जाता है ॥ २५ ॥ कृतकृत्यश्च सिद्धश्च योगी ब्राह्मण एव च। य* एवं वेद तत्त्वार्थमन्यथा ह्यात्महा भवेत् ॥२६॥ कृतकृत्य इति—जो मनुष्य इस वास्तविक सत्य को समझता है, वही कृतकृत्य, सिद्ध, योगी और वास्तविक ब्राह्मण है, अन्यथा मनुष्य आत्मघाती ही होगा ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'स ब्राह्मणः' इस श्रुति१ से यह स्पष्ट है कि वही मुख्य (वास्तविक) ब्राह्मण है, जो उक्त सत्य को समझता है अर्थात् अपने स्वरूप (आत्मस्वरूप) को यानी 'मैं ब्रह्म हूँ' समझता है। इस प्रकार की आत्मनिष्ठा जिसमें नहीं होती उसे आत्महा अर्थात् आत्मघाती कहा गया है। श्रीमद्भागवत में कहा है— 'नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा२ ॥ यह मनुष्य शरीर समस्त शुभफलों की प्राप्ति का मूल है, यह सत्कर्मियों के लिये सुलभ, और दुष्कर्मियों के लिए अत्यन्त दुर्लभ है। इस संसारसागर से पार जाने के लिए यह एक सुदृढ़ नौका है। शरणग्रहणमात्र से ही गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवार का संचालन करने लगते हैं। और स्मरणमात्र से ही मैं अनुकूल वायु के रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो इस शरीर के द्वारा संसारसागर से पार नहीं हो जाता, वह तो अपने हाथों अपने आत्मा का हनन—अधःपतन कर रहा है। यह समझना चाहिये ॥ २६ ॥ वेदार्थो निश्चितो ह्येष समासेन मयोदितः । संन्यासिभ्यः प्रवक्तव्यः शान्तेभ्यः शिष्टबुद्धिना ॥२७॥ वेदार्थ इति—मैंने वेद का यह निश्चित अर्थ संक्षेप से बताया। शास्त्र और आचार्य के द्वारा जिसकी बुद्धि सुशिक्षित है ऐसा शिष्टबुद्धि पुरुष, शम-दमादिसाधनसम्पन्न संन्यासियों के प्रति उपर्युक्त वेदार्थ का उपदेश करे ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी ग्रन्थकार अपने ग्रन्थोक्त प्रकरण की उक्तियों की प्रामाणिकता तथा प्रतिपत्तिसौकर्य को सूचित कर रहे हैं— जो कुछ मैंने कहा है, वह वेदार्थ है। अतः उसकी प्रामाणिकता में कोई सन्देह ही नहीं है। और उस वेदार्थ का ज्ञान प्राप्त करने में अब कोई कठिनाई भी नहीं है, क्योंकि मैंने उसे संक्षेप से बता दिया है। अतः आचार्य से उपदिष्ट एवं शास्त्रपरिशीलन से परिपक्व बुद्धिसम्पन्न पुरुष, शमादिसाधनसम्पन्न संन्यासियों के प्रति उस वेदार्थ का उपदेश किया करे। संन्यासाश्रम प्राप्त किये संन्यासीमात्र को नहीं ॥ २७ ॥ ॥ इति त्रयोदशमचक्षुष्ट्वप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. (बृ. उ. ३।८।१०) २. (श्रीमद्भागवत—११।२०।१७)
- यदेवं—पाठान्तरम् । १०