उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८ उपदेशसाहस्री रहेगी, ऐसी स्थिति में आत्मा की विशुद्धि कैसी समझी जाय ? इसका समाधान यह है कि बाह्य और आभ्यन्तर अर्थात् बाहर-भीतर सर्वत्र एकमात्र आत्मा ही है, उससे पृथक् कोई नहीं है। क्योंकि वह शुद्ध केवल है, इससे यह सिद्ध हुआ कि उसके अतिरिक्त बाहर कोई नहीं है, अर्थात् वाह्याभाव सिद्ध हुआ । तथा वह प्रज्ञानैकरस है, इससे भीतर भी उसके अतिरिक्त कोई नहीं है, यह सिद्ध होता है। उसकी एकरसता को ही 'घने' कह कर स्पष्ट किया है। अर्थात् सैन्धवघन के समान वह विज्ञानघन है । 'हेयम्' यह उपलक्षण है अर्थात् उपादेय का भी उपलक्षक है। अतः ऐसे आत्मा में किसी हेय या उपादेय की कल्पना कैसे कर सकते हैं ? सत्तास्फूर्ति से अनालिङ्गित किसी भी बाह्य या आभ्यन्तर का उल्लेख करना संभव ही नहीं । वे दोनों तो आत्मरूप ही हैं। उससे भिन्न बाहर या भीतर कुछ है ही नहीं, जो वास्तव में उपादेय अथवा हेय बन सके । अतः आत्मा की विशुद्धि मानने में किसी प्रकार का कोई संकोच किया ही नहीं जा सकता ॥ १०॥ य आत्मा नेति नेतीति परापोहेन शेषतः। स चेद्ब्रह्मविदात्मेष्टो यतेतातः परं कथम् ॥११॥ य आत्मेति—'यह स्थूल या सूक्ष्म देह, आत्मा नहीं है'—इस रीति से अनात्म वर्ग के निषेध द्वारा जिस आत्मा को अवशिष्ट रखा जाता है, यदि ब्रह्मज्ञानी को वही आत्मा अभीष्ट हो तो वह उसकी प्राप्ति के निमित्त प्रयत्न क्यों करेगा ? ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तुस्वभाव के अनुसार आत्मसम्बन्धी न कोई हेय है और न कोई उपादेय है, यह बता चुके । अब विद्वदनुभव से भी यह बात समझ में आती है। क्योंकि ब्रह्मज्ञानी को तो अपना स्वरूप ही अभीष्ट है, तब जिसे स्व- स्वरूप की प्राप्ति हो चुकी, वह कृतकृत्य हो जाता है, वह क्योंकर पुनः यत्न करेगा ? ॥ ११ ॥ अशनायाद्यतिक्रान्तं ब्रह्मैवास्मि निरन्तरम् । कार्यवान् स्यां कथं चाहं विमृशेदेवमञ्जसा ॥१२॥ अशनायेति—मैं क्षुधा¹-पिपासा (भूख-प्यास) से रहित हूँ। मैं सदा-सर्वदा ब्रह्मरूप हो हूँ। अतः मैं क्रियावान् कैसे हो सकता हूँ, इस प्रकार उचित विचार करना चाहिये ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह ब्रह्म (आत्मतत्त्व) कूटस्थ निर्विशेष है, स्वानुभवगम्य है। अतः आत्मज्ञानी स्वयं ही उसका निश्चय करे। अर्थात् वह आत्मतत्त्व परानुभवगम्य नहीं है। शास्त्र और आचार्योपदेश के अनुसार आत्मज्ञानी स्वयं उसका विवेक करे। 'मैं² षडूर्मिवर्जित ब्रह्म ही हूँ' यह निश्चय करे। यह निश्चय होनेपर कार्यवत्त्व वचन तो अनुभवविरुद्ध हो जाता है। अतः अनुभव विरुद्ध को कैसे स्वीकार किया जा सकेगा ? ॥ १२ ॥ पारगस्तु यथा[दा] नद्यास्तत्स्थः पारं धियासति । आत्मज्ञश्चेत्तथा[दा] कार्यं कर्तुमन्यदिहेच्छति ॥१३॥ पारग इति—यदि कोई व्यक्ति आत्मवित् है तो उसकी अन्य किसी कार्य करने की इच्छा करना वैसा ही है जैसे नदी के पार पहुँचा हुआ व्यक्ति उस तट पर खड़ा होकर भी पार जाने की इच्छा करे । अभिप्राय यह है कि आत्म- ज्ञान हो जाने पर व्यक्ति कृतकार्य हो जाता है, तदनन्तर उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त रीति से विमर्श करने पर भी विविदिषावाक्यसिद्ध वेदानुवचनादि को सत्त्वशुद्धि का हेतु माना गया है, अतः ज्ञानोत्पत्ति में हेतुभूत व्यापार का परित्याग करना कैसे संभव हो सकता है ? इस आशंका का समाधान यह १. (बृ. उ. ३।५।१) २. (बृ. उ. १।३।४)