भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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होगा कि जैसे नदी के परतीर पर प्राप्त होकर और उसी परतीर पर स्थित होकर भी वहीं आने की इच्छा करना जैसे संभव नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही आत्मज्ञ पुरुष भी आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने के कारण कृतकृत्य हो जाता है, उसके लिए कोई कार्य शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने श्रेय प्राप्त कर लिया है ॥ १३ ॥ आत्मज्ञस्यापि यस्य स्याद्धानानोपादानता यदि । न मोक्षार्हः स विज्ञेयो वान्तोऽसौ ब्रह्मणा ध्रुवम् ॥१४॥ आत्मज्ञस्येति—यदि आत्मज्ञान हो जाने पर भी त्याग और ग्रहण की बुद्धि रहती है तो उसे मोक्ष का पात्र नहीं समझना चाहिये । निश्चय ही ब्रह्म ने उसका वमन कर दिया है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे वान्त पदार्थ का ग्रहण नहीं किया जाता, उसी प्रकार ब्रह्म भी उसका परित्याग कर देता है, वह उसे स्वीकार नहीं करता । अर्थात् वह व्यक्ति ब्रह्म में लीन होकर मोक्षानन्द को नहीं पा सकता । अभिप्राय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को ब्रह्म का साक्षात्कार (अपरोक्ष ज्ञान) नहीं होता । जिसे ब्रह्म का सुदृढ़ अपरोक्ष ज्ञान (साक्षात्कार) हो जाता है, वे ही पूर्णकाम-आप्तकाम, कृतकृत्य हो जाते हैं, उनके लिए पुनः कुछ भी प्राप्तव्य शेष नहीं है ॥ १४ ॥ सादित्यं हि जगत्प्राणस्तस्मान्नाहर्निशैव वा । प्राणज्ञस्यापि न स्यातां कुतो ब्रह्मविदोऽद्वये ॥१५॥ सादित्यमिति—आदित्य (सूर्य) के सहित समस्त विश्व, प्राणरूप है (हिरण्यगर्भरूप) है। अतः प्राणो- पासक की दृष्टि में भी न दिन होता है और न रात्रि होती है । तब ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में अर्थात् उसकी अद्वयदृष्टि में विश्वप्रपञ्च की सत्ता कैसे रह सकती है ? ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी “अनागतां तु ये पूर्वामनक्षत्रां तु पश्चिमाम् । सन्ध्यां नोपासते विप्रास्ते कथं ब्राह्मणाः स्मृताः” ॥ उक्त स्मृतिवचन के अनुरोध से ब्रह्मवित् विप्र को भी सन्ध्यावन्दनादि कार्य करना आवश्यक प्रतीत होता है, इस आशंका का समाधान कैमुतिकन्याय से आचार्यपाद ने किया है—जबकि सूर्य (आदित्य) सहित यह सम्पूर्ण जगत्, प्राण (हिरण्यगर्भ) रूप है, तब 'प्राणोऽहमस्मि'—मैं प्राण हूँ, इस प्रकार प्राणात्म-भावापन्न (प्राणज्ञ) उपासक के लिये दिन और रात कैसे होंगे ? क्योंकि उसकी आत्मा तो उदयास्तभावरहित सूर्यरूप है। प्राण, सूत्रात्मा, और हिरण्यगर्भ—ये पर्यायी शब्द हैं। जो व्यक्ति 'मैं प्राण हूँ'—ऐसी उपासना करता है, उसकी दृष्टि में संपूर्ण जगत् प्राण- स्वरूप हो जाता है। भगवती श्रुति ने प्राण और सूर्य में अभेद बताया है। अतः उदयास्तभावरहित सूर्यरूप हो जाने के कारण उसकी दृष्टि में सतत दिन ही रहता है। भगवती श्रुति कहती है—'न१ ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृत् दिवा हैवास्मै भवति'। एवं च भेददर्शी प्राणवित् (प्राणज्ञ) की दृष्टि में भी यदि दिन और रात नहीं होते हैं, तब ब्रह्मवित् (मुख्य ब्रह्मभूत) के सर्वद्वैताभासरहित अद्वयस्वरूप में दिन-रात कैसे हो सकेंगे ? अर्थात् प्राणोपासक जैसे भेददर्शी को दिन-रात का अवभास नहीं हो पाता तो अभेददर्शी ब्रह्मवित् को दिन-रात रूपी कालभेद का ज्ञान कैसे होगा ? भेदज्ञान होने का कोई कारण ही नहीं है। अतः कालभेद के दर्शन न होने से ही तन्निमित्त सन्ध्या- वन्दनादि कर्तव्यों का भी अभाव ब्रह्मवित् के लिये समझना चाहिये ॥ १५ ॥ न स्मरेदात्मनो* ह्यात्मा विस्मरेद्वाऽप्यलुप्तचित् । मनोऽपि स्मरतीत्येतज्ज्ञानमज्ञानहेतुजम्† ॥१६॥ न स्मरतीति—जिसकी चिन्मयी दृष्टि कभी लुप्त नहीं होती, वह कभी आत्मा का न स्मरण करता है और न उसे भूलता है। मन ही आत्मा का स्मरण करता है—यह ज्ञान भी अज्ञान के कारण ही है ॥ १६ ॥ १. (छां. उ. ३।११।३)

  • स्मरत्या०—पाठान्तरम् । † तद्ज्ञान०—पाठान्तरम् ।
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