उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मज्ञानी की बाह्य क्रिया न रहने पर भी 'संध्यं१ समाधावात्मन्याचरेत्' इस श्रुति के अनुरोध से आत्म- विषयक विस्मृति का परित्याग कर मोक्षार्थ आत्मविषयक स्मृति करनी ही चाहिये—ऐसा यदि कोई कहे तो वह उचित न होगा। क्योंकि अलुप्तचित् (सदैव चिन्मयी दृष्टि) होने के कारण उसे उस (आत्मा) के स्मरण की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। भूले हुए को स्मरण की आवश्यकता होती है। अतः अशक्य होने से स्वयं को ही स्वयं का स्मरण नहीं हो सकता। यदि यह कहें कि तत्त्वज्ञान होने के पश्चात् आविर्भाव-तिरोभावादि विकारों की शान्ति के लिये मन ही आत्मा का स्मरण करे, तो यह कहना भी उचित नहीं होगा। क्योंकि मन तो अचेतन (जड़) है, अतः वह स्मरण कैसे कर सकेगा? उसमें स्मर्तृत्व अनुपपन्न है। किन्तु 'मनः स्मरति'—मन स्मरण कर रहा है, यह व्यवहार तो होता है। तथापि इस पर उत्तर यह होगा कि 'मनः स्मरति'—यह ज्ञान भी अज्ञान के कारण होता है अर्थात् अज्ञानात्मक हेतु से होता है। वह ज्ञान अविवेकविलसित है। एवं च 'संध्यं समाधौ'—यह विधि, मन को आत्मा से भिन्न देखने वाले असम्यग्ब्रह्मवित् के लिये है, वह सम्यग्ब्रह्मवित् के लिये नहीं है ॥ १६ ॥ ज्ञातुर्ज्ञेयः परो ह्यात्मा सोऽविद्याकल्पितः स्मृतः । अपोढे विद्यया तस्मिन् रज्ज्वां सर्प इवाद्वयः ॥१७॥ ज्ञातुरिति—यदि परमात्मा को ज्ञाता का ज्ञेय कहा जाय तो उसे अविद्याकल्पित कहना होगा। क्योंकि जो भी ज्ञेय है, वह दृश्य होने से जड़ और अविद्याजन्य माना जाता है। रज्जु में अध्यस्त (आरोपित, कल्पित) सर्प के समान, विद्या के द्वारा अविद्या की निवृत्ति होने पर आत्मा अद्वयरूप ही सिद्ध है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि आत्मा अलुप्तचिद्रूप होने से अपने को (आत्मा को) स्मरण नहीं करता तथापि परमात्मा को तो स्मरण कर ही सकता है—ऐसा यदि कोई कहे तो वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि यदि परमात्मा को ज्ञाता का ज्ञेय (विषय) कहें तो उसे अविद्याकल्पित कहना होगा। जो स्व-अज्ञान से कल्पित होता है, उसे विद्वान् लोग निश्चित स्मरण करते हैं, जानते हैं। रज्जु-सर्प की तरह ज्ञान का विषय, अविद्याकल्पित होने से उसे आत्मा ही नहीं कह सकते। तथाच आत्मज्ञानरूप विद्या के द्वारा उस आत्मा के परत्व, ज्ञेयत्व आदि का बाध होने पर ज्ञातृ-ज्ञेय विभाग के न रह जाने से अद्वय आत्मा ही शेष रह जाता है। जैसे रज्जुविद्या (ज्ञान) से सर्प का बाध होने पर रज्जु ही अवशेष रहती है, उसी तरह अद्वय आत्मा ही शेष रह जाता है ॥ १७ ॥ कर्तृकर्मफलाभावात्सबाह्याभ्यन्तरं ह्यजम् । ममाहं वेति यो भावस्तस्मिन्कस्य कुतो भवेत् ॥१८॥ कर्तृकर्मफलाभावादिति—कर्ता, कर्म और फल के न रहने से 'मैं' बाहर और भीतर के सहित अजन्मा आत्मा ही हूँ। अतः मुझमें ममता किंवा अहन्ता की प्रतीति किसी को कैसे हो सकती है ? ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तुतः प्रत्यगात्मा अद्वितीय है, तथापि उसमें 'मम, अहं' इत्यादि संसार का प्रतिभास होता रहता है, उसकी निवृत्ति के लिये कुछ कर्तव्य करना होगा, इस शंका की निवृत्ति के लिये 'कर्तृकर्म-फलाभावात्' को आचार्य- चरण कह रहे हैं— ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व तक ही समस्त उपायों का अनुष्ठान कर्तव्य रहता है। ज्ञानोत्पत्ति के अनन्तर ज्ञानी को किसी भी उपाय के अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं रहती। क्योंकि प्रत्यगात्मा ही 'कर्ता' है, वह 'कर्म' है, और वही 'फल' है। कर्ता, कर्म, फल की भिन्नता जैसे लोक-व्यवहार में प्रतीत होती है, वैसे प्रत्यगात्मा में ज्ञानी को नहीं । १. (आरुणिक उ. २)
- वेति, वेत्ति० इति पाठौ ।