उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ८१ प्रतीत होती। अतः ज्ञानी की दृष्टि में बाहर-भीतर सर्वत्र वही आत्मस्वरूप (अज) विद्यमान है, वही एकमात्र कर्ता, कर्म एवं फल के रूप में विद्यमान है। अतः ज्ञानी को उस आत्मा (प्रत्यगात्मा) में 'मम', 'अहम्' (मेरा, मैं) इस प्रकार का जो प्रतिभास (भाव) हो रहा है, वह किसका (किस अन्य वस्तु का) हो रहा है? कोई कारण ही नहीं है, जिससे तदतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का प्रतिभास हो सके। क्योंकि वही आत्मवस्तु बाहर-भीतर सर्वत्र (एक) मात्र विद्यमान है। अतः ज्ञानी के लिये कोई कर्त्तव्य शेष नहीं है ॥ १८ ॥ आत्मा ह्यात्मीय इत्येष भावोऽविद्याप्रकल्पितः । आत्मैकत्वे ह्यसौ नास्ति बीजाभावे कुतः फलम् ॥१९॥ आत्मेति- आत्मा और आत्मीय (आत्मा से सम्बन्धित) भाव भी 'अविद्या' से कल्पित है। किन्तु 'आत्मा' का एकत्व जब ज्ञात हो जाता है तब वह कल्पित भाव नहीं रहता। क्योंकि बीज ही जब नहीं रहेगा, तब उससे फल की उत्पत्ति कैसे हो पायेगी ? ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मज्ञानी को देहादि में 'अहंकार-ममकार' क्यों नहीं होता ? देहादि के प्रति उसे अहंकार-ममकार, के न होने में कारण (हेतु) यह है, कि 'आत्मा-आत्मीय भाव' अर्थात् अहंकार-ममकार जो है, वह अविद्या के द्वारा कल्पित है। किन्तु आत्मैकत्व (आत्मैक्यभाव) का ज्ञान हो जाने पर अर्थात् सर्वत्र आत्ममय दृष्टि होने पर (ज्ञान हो जाने पर) अविद्या का अभाव हो जाता है, अर्थात् अविद्या नहीं रह पाती (नष्ट हो जाती है)। जब अविद्यारूप बीज ही नहीं रहा, तब अहंकार-ममकार (आत्मा-आत्मीय भाव) रूप फल कैसे उत्पन्न हो पायगा ? ॥ १९ ॥ द्रष्टृ श्रोतृ तथा मन्तृ विज्ञात्रैव तदक्षरम् । द्रष्ट्राद्यन्यन्न तद्यस्मात्तस्माद्द्रष्टाऽहमक्षरम्* ॥२०॥ द्रष्ट्रिति-द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता ही वह अक्षर परब्रह्म है। क्योंकि वह द्रष्ट्रादिस्वरूप प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) उससे भिन्न नहीं है। इसलिये मैं ही द्रष्टृस्वरूप अक्षर ब्रह्म हूँ ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी उस आत्मैकत्व का ज्ञान, किस प्रमाण से होगा ? ऐसी जिज्ञासा होने पर आचार्यचरण कहते हैं- उस 'आत्मैकत्व' का ज्ञान 'वेदान्तवाक्य' रूप प्रमाण के बल पर होगा। वेदान्तवाक्यों में इस प्रत्यग्रूप (प्रत्यगात्मा) को द्रष्टृ (द्रष्टा), श्रोतृ (श्रोता), मन्तृ (मन्ता), विज्ञातृ१ (विज्ञाता) आदि भिन्न-भिन्न शब्दों से यत्र- तत्र बताया गया है, तथापि अनेक शब्दों से बताया जाने पर भी प्रत्यग्रूप, वह 'अक्षर' ही है, अर्थात् सर्वाधिष्ठान ब्रह्म ही है। वेदान्तवाक्यों (श्रुतियों) ने द्रष्ट्रादि शब्दों से जो प्रत्यक् स्वरूप बताया है, वह उस अक्षर से भिन्न नहीं है। जब कि श्रुति से ही यह बात सिद्ध हो गई कि इस प्रकार का अविषय भूत ही अद्वय आत्मतत्त्व है अर्थात् 'आत्मतत्त्व' एक ही है और वह कभी 'विषय' नहीं बनता। अतः मैं अक्षर ही 'द्रष्टा' हूँ ॥ २० ॥ स्थावरं जङ्गमं चैव द्रष्टृत्वादिक्रियायुतम् । सर्वमक्षरमेवातः सर्वस्याऽऽत्माऽक्षरं त्वहम् ॥२१॥ स्थावरमिति-द्रष्टृत्वादि क्रियाओं से युक्त सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम सृष्टि, अक्षर ब्रह्मरूप ही है। अतः मैं ही सबका आत्मा, अविनाशी ब्रह्म हूँ ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मा की अक्षर-ब्रह्मात्मता सिद्ध रहने पर भी उसकी अद्वयात्मता की सिद्धि कैसे होगी ? अर्थात् 'अक्षर' की सर्वात्मकता बताई और 'आत्मा' की भी सर्वात्मकता बता चुके हैं, ऐसी स्थिति में आत्मा की एकता १. 'अदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ (बृ. उ. ३।८।११)
- द्रष्टृ नान्यदतस्तस्माच्चस्माद्रष्टाहमक्षरम्-पाठान्तरम् । ११