भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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८२ उपदेशसाहस्री (अद्वयता) कैसे होगी ? यह शंका अभी निवृत्त नहीं हो रही है, उसकी निवृत्ति के लिये ‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च'इस श्रुति के अनुरोध से प्रत्यगात्मा की अद्वयात्मता को बताया जाता है । उपाधि, उपहित, और उपाधि का आधार, ये सब 'अक्षर' ही हैं। अतः मैं 'अक्षर' सर्वस्वरूप (सर्वस्यात्मा) हूँ। मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।।२१।। अकार्यशेषमात्मानमक्रियात्मक्रीय फलम् । निर्ममं निरहङ्कारं यः पश्यति स पश्यति ॥२२॥ अकार्यशेषमिति—जो, 'क्रिया' का अंग, क्रियारूप, और क्रिया का फल भी नहीं है, तथा जो, ममता, अहंकार से रहित है, ऐसे 'आत्मा' को जो देखता है, वही वस्तुतः देखता है—यह समझना चाहिये ।। २२ ।। हृदयस्पर्शिनी स्थावर-जङ्गमात्मक समस्त प्रपञ्च को 'अक्षर' रूप बताया है, अतः 'सप्रपञ्च अक्षर' ही आत्मा हुआ । इससे तो ब्रह्मात्मा की सप्रपञ्चता ही सिद्ध होती है, अद्वयता नहीं । इस आशंका को दूर करने के लिये आगमिक आत्मज्ञान को स्पष्ट करना आवश्यक है । यह 'आत्मा' अकार्यशेष है अर्थात् इसमें अकर्तृत्व है । तात्पर्य यह है कि 'आत्मा' अकर्ता है। क्योंकि वह 'अक्रियात्म-क्रियाफल है, अर्थात् क्रियास्वरूप और तत्फल से विलक्षण है। अथवा क्रियातत्फलसंसर्गशून्य है (सर्वविशेषशून्य है) क्योंकि वह 'निर्मम' है, और 'निर्मम' इसलिये है कि वह 'निरहंकार' है अर्थात् 'चिन्मात्र' आत्मतत्त्व है। उस चिन्मात्र आत्मतत्त्व को जो सम्यक् देखता है, वही तत्त्वदर्शी कहलाता है । आत्मज्ञानी को भी कर्म करते हुए देखा गया है, तब उसमें कार्यशेषत्व तो अर्थात् सिद्ध होता है, ऐसी स्थिति में उसे 'अकार्यशेष' कैसे कहा गया ? किन्तु इसका समाधान तो यह है कि आत्मज्ञानी को निरन्तर आत्मस्वरूप का अनुभव होता रहता है । उस कारण उसमें ममकार, अहंकार आदि नहीं हो पाते । उनका अभाव रहने से उसे अकर्मशेष (अकार्यशेष) बताया गया है ।। २२ ।। ममाहङ्कारयत्नेच्छाः शून्या एव स्वभावतः । आत्मनीति यदि ज्ञातमाध्वं स्वस्थाः किमीहितैः ॥२३॥ ममेति—हे मुमुक्षुओं ! यदि तुमने यह जान लिया है कि 'आत्मा' में ममता, अहंकार प्रयत्न और इच्छा का अभाव निसर्गतः (स्वभावतः) ही है, तो तुम्हें शान्त हो जाना चाहिये, क्योंकि तुम कृतकृत्य हो गये हो । अतः तुम्हें अब कर्म करने की क्या आवश्यकता है ? कोई आवश्यकता नहीं है ।। २३ ।। हृदयस्पर्शिनी ममकार, अहंकार, यत्न, इच्छा ये स्वभावतः ही आत्मज्ञानी में नहीं रहते । क्योंकि अविद्याप्रयुक्त देहाद्यभिमान के रहने पर ही ये रहा करते हैं, अन्यथा नहीं । अतः हे मुमुक्षुओं ! यदि तुमने इस रहस्य को जान लिया हो तो निर्व्यग्र होकर रहो । तुम्हें कर्मों से क्या करना है ? क्योंकि ज्ञान से ही तुम कृतकृत्य हो चुके हो । अनधिकृत कर्मों के करते रहने से कोई फल नहीं होता । अतः आत्मा में कर्मशेषता नहीं है ।। २३ ।। योऽहङ्कर्तारमात्मानं तथा वेत्तारमेव च । *वेत्त्यानात्मज्ञ एवासौ योऽन्यथाज्ञः स आत्मवित् ॥२४॥ योऽहमिति—जो मनुष्य 'आत्मा' को अहंकार करनेवाला तथा ज्ञाता समझता है, वह आत्मज्ञानी नहीं है और जो मनुष्य इसके विपरीत उसे समझता है, उसे ही आत्मवित् (आत्मज्ञानी ) समझना चाहिये ।। २४ ।। हृदयस्पर्शिनी आत्मा को देह से अतिरिक्त (भिन्न) माननेवाले को ही पारलौकिक कर्मों में अधिकारी माना जाता है । अतः आत्मवित् के द्वारा अनुष्ठीयमान कर्म का फल उसे मिलेगा ही, इस कारण आत्मवित् में भी कर्मशेषता माननी

  • वेत्ति नात्मज्ञः—पाठान्तरम् ।