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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

८० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मज्ञानी की बाह्य क्रिया न रहने पर भी 'संध्यं१ समाधावात्मन्याचरेत्' इस श्रुति के अनुरोध से आत्म- विषयक विस्मृति का परित्याग कर मोक्षार्थ आत्मविषयक स्मृति करनी ही चाहिये—ऐसा यदि कोई कहे तो वह उचित न होगा। क्योंकि अलुप्तचित् (सदैव चिन्मयी दृष्टि) होने के कारण उसे उस (आत्मा) के स्मरण की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। भूले हुए को स्मरण की आवश्यकता होती है। अतः अशक्य होने से स्वयं को ही स्वयं का स्मरण नहीं हो सकता। यदि यह कहें कि तत्त्वज्ञान होने के पश्चात् आविर्भाव-तिरोभावादि विकारों की शान्ति के लिये मन ही आत्मा का स्मरण करे, तो यह कहना भी उचित नहीं होगा। क्योंकि मन तो अचेतन (जड़) है, अतः वह स्मरण कैसे कर सकेगा? उसमें स्मर्तृत्व अनुपपन्न है। किन्तु 'मनः स्मरति'—मन स्मरण कर रहा है, यह व्यवहार तो होता है। तथापि इस पर उत्तर यह होगा कि 'मनः स्मरति'—यह ज्ञान भी अज्ञान के कारण होता है अर्थात् अज्ञानात्मक हेतु से होता है। वह ज्ञान अविवेकविलसित है। एवं च 'संध्यं समाधौ'—यह विधि, मन को आत्मा से भिन्न देखने वाले असम्यग्ब्रह्मवित् के लिये है, वह सम्यग्ब्रह्मवित् के लिये नहीं है ॥ १६ ॥ ज्ञातुर्ज्ञेयः परो ह्यात्मा सोऽविद्याकल्पितः स्मृतः । अपोढे विद्यया तस्मिन् रज्ज्वां सर्प इवाद्वयः ॥१७॥ ज्ञातुरिति—यदि परमात्मा को ज्ञाता का ज्ञेय कहा जाय तो उसे अविद्याकल्पित कहना होगा। क्योंकि जो भी ज्ञेय है, वह दृश्य होने से जड़ और अविद्याजन्य माना जाता है। रज्जु में अध्यस्त (आरोपित, कल्पित) सर्प के समान, विद्या के द्वारा अविद्या की निवृत्ति होने पर आत्मा अद्वयरूप ही सिद्ध है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि आत्मा अलुप्तचिद्रूप होने से अपने को (आत्मा को) स्मरण नहीं करता तथापि परमात्मा को तो स्मरण कर ही सकता है—ऐसा यदि कोई कहे तो वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि यदि परमात्मा को ज्ञाता का ज्ञेय (विषय) कहें तो उसे अविद्याकल्पित कहना होगा। जो स्व-अज्ञान से कल्पित होता है, उसे विद्वान् लोग निश्चित स्मरण करते हैं, जानते हैं। रज्जु-सर्प की तरह ज्ञान का विषय, अविद्याकल्पित होने से उसे आत्मा ही नहीं कह सकते। तथाच आत्मज्ञानरूप विद्या के द्वारा उस आत्मा के परत्व, ज्ञेयत्व आदि का बाध होने पर ज्ञातृ-ज्ञेय विभाग के न रह जाने से अद्वय आत्मा ही शेष रह जाता है। जैसे रज्जुविद्या (ज्ञान) से सर्प का बाध होने पर रज्जु ही अवशेष रहती है, उसी तरह अद्वय आत्मा ही शेष रह जाता है ॥ १७ ॥ कर्तृकर्मफलाभावात्सबाह्याभ्यन्तरं ह्यजम् । ममाहं वेति यो भावस्तस्मिन्कस्य कुतो भवेत् ॥१८॥ कर्तृकर्मफलाभावादिति—कर्ता, कर्म और फल के न रहने से 'मैं' बाहर और भीतर के सहित अजन्मा आत्मा ही हूँ। अतः मुझमें ममता किंवा अहन्ता की प्रतीति किसी को कैसे हो सकती है ? ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तुतः प्रत्यगात्मा अद्वितीय है, तथापि उसमें 'मम, अहं' इत्यादि संसार का प्रतिभास होता रहता है, उसकी निवृत्ति के लिये कुछ कर्तव्य करना होगा, इस शंका की निवृत्ति के लिये 'कर्तृकर्म-फलाभावात्' को आचार्य- चरण कह रहे हैं— ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व तक ही समस्त उपायों का अनुष्ठान कर्तव्य रहता है। ज्ञानोत्पत्ति के अनन्तर ज्ञानी को किसी भी उपाय के अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं रहती। क्योंकि प्रत्यगात्मा ही 'कर्ता' है, वह 'कर्म' है, और वही 'फल' है। कर्ता, कर्म, फल की भिन्नता जैसे लोक-व्यवहार में प्रतीत होती है, वैसे प्रत्यगात्मा में ज्ञानी को नहीं । १. (आरुणिक उ. २)

  • वेति, वेत्ति० इति पाठौ ।

स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ८१ प्रतीत होती। अतः ज्ञानी की दृष्टि में बाहर-भीतर सर्वत्र वही आत्मस्वरूप (अज) विद्यमान है, वही एकमात्र कर्ता, कर्म एवं फल के रूप में विद्यमान है। अतः ज्ञानी को उस आत्मा (प्रत्यगात्मा) में 'मम', 'अहम्' (मेरा, मैं) इस प्रकार का जो प्रतिभास (भाव) हो रहा है, वह किसका (किस अन्य वस्तु का) हो रहा है? कोई कारण ही नहीं है, जिससे तदतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का प्रतिभास हो सके। क्योंकि वही आत्मवस्तु बाहर-भीतर सर्वत्र (एक) मात्र विद्यमान है। अतः ज्ञानी के लिये कोई कर्त्तव्य शेष नहीं है ॥ १८ ॥ आत्मा ह्यात्मीय इत्येष भावोऽविद्याप्रकल्पितः । आत्मैकत्वे ह्यसौ नास्ति बीजाभावे कुतः फलम् ॥१९॥ आत्मेति- आत्मा और आत्मीय (आत्मा से सम्बन्धित) भाव भी 'अविद्या' से कल्पित है। किन्तु 'आत्मा' का एकत्व जब ज्ञात हो जाता है तब वह कल्पित भाव नहीं रहता। क्योंकि बीज ही जब नहीं रहेगा, तब उससे फल की उत्पत्ति कैसे हो पायेगी ? ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मज्ञानी को देहादि में 'अहंकार-ममकार' क्यों नहीं होता ? देहादि के प्रति उसे अहंकार-ममकार, के न होने में कारण (हेतु) यह है, कि 'आत्मा-आत्मीय भाव' अर्थात् अहंकार-ममकार जो है, वह अविद्या के द्वारा कल्पित है। किन्तु आत्मैकत्व (आत्मैक्यभाव) का ज्ञान हो जाने पर अर्थात् सर्वत्र आत्ममय दृष्टि होने पर (ज्ञान हो जाने पर) अविद्या का अभाव हो जाता है, अर्थात् अविद्या नहीं रह पाती (नष्ट हो जाती है)। जब अविद्यारूप बीज ही नहीं रहा, तब अहंकार-ममकार (आत्मा-आत्मीय भाव) रूप फल कैसे उत्पन्न हो पायगा ? ॥ १९ ॥ द्रष्टृ श्रोतृ तथा मन्तृ विज्ञात्रैव तदक्षरम् । द्रष्ट्राद्यन्यन्न तद्यस्मात्तस्माद्द्रष्टाऽहमक्षरम्* ॥२०॥ द्रष्ट्रिति-द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता ही वह अक्षर परब्रह्म है। क्योंकि वह द्रष्ट्रादिस्वरूप प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) उससे भिन्न नहीं है। इसलिये मैं ही द्रष्टृस्वरूप अक्षर ब्रह्म हूँ ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी उस आत्मैकत्व का ज्ञान, किस प्रमाण से होगा ? ऐसी जिज्ञासा होने पर आचार्यचरण कहते हैं- उस 'आत्मैकत्व' का ज्ञान 'वेदान्तवाक्य' रूप प्रमाण के बल पर होगा। वेदान्तवाक्यों में इस प्रत्यग्रूप (प्रत्यगात्मा) को द्रष्टृ (द्रष्टा), श्रोतृ (श्रोता), मन्तृ (मन्ता), विज्ञातृ१ (विज्ञाता) आदि भिन्न-भिन्न शब्दों से यत्र- तत्र बताया गया है, तथापि अनेक शब्दों से बताया जाने पर भी प्रत्यग्रूप, वह 'अक्षर' ही है, अर्थात् सर्वाधिष्ठान ब्रह्म ही है। वेदान्तवाक्यों (श्रुतियों) ने द्रष्ट्रादि शब्दों से जो प्रत्यक् स्वरूप बताया है, वह उस अक्षर से भिन्न नहीं है। जब कि श्रुति से ही यह बात सिद्ध हो गई कि इस प्रकार का अविषय भूत ही अद्वय आत्मतत्त्व है अर्थात् 'आत्मतत्त्व' एक ही है और वह कभी 'विषय' नहीं बनता। अतः मैं अक्षर ही 'द्रष्टा' हूँ ॥ २० ॥ स्थावरं जङ्गमं चैव द्रष्टृत्वादिक्रियायुतम् । सर्वमक्षरमेवातः सर्वस्याऽऽत्माऽक्षरं त्वहम् ॥२१॥ स्थावरमिति-द्रष्टृत्वादि क्रियाओं से युक्त सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम सृष्टि, अक्षर ब्रह्मरूप ही है। अतः मैं ही सबका आत्मा, अविनाशी ब्रह्म हूँ ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मा की अक्षर-ब्रह्मात्मता सिद्ध रहने पर भी उसकी अद्वयात्मता की सिद्धि कैसे होगी ? अर्थात् 'अक्षर' की सर्वात्मकता बताई और 'आत्मा' की भी सर्वात्मकता बता चुके हैं, ऐसी स्थिति में आत्मा की एकता १. 'अदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ (बृ. उ. ३।८।११)

  • द्रष्टृ नान्यदतस्तस्माच्चस्माद्रष्टाहमक्षरम्-पाठान्तरम् । ११

८२ उपदेशसाहस्री (अद्वयता) कैसे होगी ? यह शंका अभी निवृत्त नहीं हो रही है, उसकी निवृत्ति के लिये ‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च'इस श्रुति के अनुरोध से प्रत्यगात्मा की अद्वयात्मता को बताया जाता है । उपाधि, उपहित, और उपाधि का आधार, ये सब 'अक्षर' ही हैं। अतः मैं 'अक्षर' सर्वस्वरूप (सर्वस्यात्मा) हूँ। मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।।२१।। अकार्यशेषमात्मानमक्रियात्मक्रीय फलम् । निर्ममं निरहङ्कारं यः पश्यति स पश्यति ॥२२॥ अकार्यशेषमिति—जो, 'क्रिया' का अंग, क्रियारूप, और क्रिया का फल भी नहीं है, तथा जो, ममता, अहंकार से रहित है, ऐसे 'आत्मा' को जो देखता है, वही वस्तुतः देखता है—यह समझना चाहिये ।। २२ ।। हृदयस्पर्शिनी स्थावर-जङ्गमात्मक समस्त प्रपञ्च को 'अक्षर' रूप बताया है, अतः 'सप्रपञ्च अक्षर' ही आत्मा हुआ । इससे तो ब्रह्मात्मा की सप्रपञ्चता ही सिद्ध होती है, अद्वयता नहीं । इस आशंका को दूर करने के लिये आगमिक आत्मज्ञान को स्पष्ट करना आवश्यक है । यह 'आत्मा' अकार्यशेष है अर्थात् इसमें अकर्तृत्व है । तात्पर्य यह है कि 'आत्मा' अकर्ता है। क्योंकि वह 'अक्रियात्म-क्रियाफल है, अर्थात् क्रियास्वरूप और तत्फल से विलक्षण है। अथवा क्रियातत्फलसंसर्गशून्य है (सर्वविशेषशून्य है) क्योंकि वह 'निर्मम' है, और 'निर्मम' इसलिये है कि वह 'निरहंकार' है अर्थात् 'चिन्मात्र' आत्मतत्त्व है। उस चिन्मात्र आत्मतत्त्व को जो सम्यक् देखता है, वही तत्त्वदर्शी कहलाता है । आत्मज्ञानी को भी कर्म करते हुए देखा गया है, तब उसमें कार्यशेषत्व तो अर्थात् सिद्ध होता है, ऐसी स्थिति में उसे 'अकार्यशेष' कैसे कहा गया ? किन्तु इसका समाधान तो यह है कि आत्मज्ञानी को निरन्तर आत्मस्वरूप का अनुभव होता रहता है । उस कारण उसमें ममकार, अहंकार आदि नहीं हो पाते । उनका अभाव रहने से उसे अकर्मशेष (अकार्यशेष) बताया गया है ।। २२ ।। ममाहङ्कारयत्नेच्छाः शून्या एव स्वभावतः । आत्मनीति यदि ज्ञातमाध्वं स्वस्थाः किमीहितैः ॥२३॥ ममेति—हे मुमुक्षुओं ! यदि तुमने यह जान लिया है कि 'आत्मा' में ममता, अहंकार प्रयत्न और इच्छा का अभाव निसर्गतः (स्वभावतः) ही है, तो तुम्हें शान्त हो जाना चाहिये, क्योंकि तुम कृतकृत्य हो गये हो । अतः तुम्हें अब कर्म करने की क्या आवश्यकता है ? कोई आवश्यकता नहीं है ।। २३ ।। हृदयस्पर्शिनी ममकार, अहंकार, यत्न, इच्छा ये स्वभावतः ही आत्मज्ञानी में नहीं रहते । क्योंकि अविद्याप्रयुक्त देहाद्यभिमान के रहने पर ही ये रहा करते हैं, अन्यथा नहीं । अतः हे मुमुक्षुओं ! यदि तुमने इस रहस्य को जान लिया हो तो निर्व्यग्र होकर रहो । तुम्हें कर्मों से क्या करना है ? क्योंकि ज्ञान से ही तुम कृतकृत्य हो चुके हो । अनधिकृत कर्मों के करते रहने से कोई फल नहीं होता । अतः आत्मा में कर्मशेषता नहीं है ।। २३ ।। योऽहङ्कर्तारमात्मानं तथा वेत्तारमेव च । *वेत्त्यानात्मज्ञ एवासौ योऽन्यथाज्ञः स आत्मवित् ॥२४॥ योऽहमिति—जो मनुष्य 'आत्मा' को अहंकार करनेवाला तथा ज्ञाता समझता है, वह आत्मज्ञानी नहीं है और जो मनुष्य इसके विपरीत उसे समझता है, उसे ही आत्मवित् (आत्मज्ञानी ) समझना चाहिये ।। २४ ।। हृदयस्पर्शिनी आत्मा को देह से अतिरिक्त (भिन्न) माननेवाले को ही पारलौकिक कर्मों में अधिकारी माना जाता है । अतः आत्मवित् के द्वारा अनुष्ठीयमान कर्म का फल उसे मिलेगा ही, इस कारण आत्मवित् में भी कर्मशेषता माननी

  • वेत्ति नात्मज्ञः—पाठान्तरम् ।

चाहिये। इस आशंका के समाधान में यह कहा जाता है कि जो पुरुष, आत्मा को कर्ता, भोक्ता, प्रमाता समझता है, वह वास्तव में आत्मवित् (आत्मज्ञानी) ही नहीं है। आत्मवित् तो उसे कहते हैं, जो आत्मा को अकर्ता, अज्ञाता, अभोक्ता समझता है। अर्थात् जो उसे कर्ता, ज्ञाता, भोक्ता का साक्षी समझता है, उस पुरुष को ही आत्मवित् समझना चाहिये ॥ २४ ॥

यथान्यत्वेऽपि तादात्म्यं देहादिष्वात्मनो मतम् । तथाऽकर्तुरविज्ञानात्फलकर्मार्कर्मताऽऽत्मनः ॥ २५॥

यथेति—जिस प्रकार 'आत्मा' वस्तुतः देहादि से पृथक् (भिन्न) है, फिर भी अज्ञानवश देहादि के साथ 'आत्मा' का तादात्म्य (एकरूपता) समझा जाता है, उसी प्रकार अकर्ता-अभोक्ता आत्मा में अज्ञान से ही क्रियाफल की कर्मता मानी जाती है ॥ २५ ॥

हृदयस्पशिनी यदि आत्मा अहंकार से अतिरिक्त है तो उस आत्मा में कर्तृत्व, भोक्तृत्व की प्रसिद्धि क्यों है ? अर्थात् आत्मा को कर्ता, भोक्ता समझनेवाला पुरुष 'आत्मवित्' क्यों नहीं है ? क्योंकि कर्तृत्वादि का प्रतिभास तो आत्मा में ही होता है। इस आशंका का समाधान यह है कि आत्मा की अकर्तृता, अभोक्तृता का परिज्ञान न होने के कारण उसमें अहंकार का अध्यास होता रहता है, उससे कर्तृता-भोक्तृता का ज्ञान होता है। वस्तुतः आत्मा तो देहादि से भिन्न है तथापि अज्ञानवश देहादि के साथ आत्मा का तादात्म्य माना जाता है। उसी प्रकार अकर्ता, अभोक्ता जो आत्मा है, उसमें अज्ञान से ही क्रियाफल की कर्मता मानी गई है। जैसे स्थूल देह और आत्मा के अभेदाध्यास से मनुष्यत्वादि का अभिमान होता है, उसी तरह अहंकारप्रधान लिंगदेह और आत्मा का अभेदाध्यास (अविवेक) रहने से आत्मा में कर्तृत्वादि का अभिमान (मिथ्याबुद्धि) होता रहता है ॥ २५ ॥

दृष्टिः श्रुतिर्मतिर्ज्ञातिः स्वप्ने दृष्टा जनैः सदा । तासामात्मस्वरूपत्वादतः प्रत्यक्षताऽऽत्मनः ॥२६॥

दृष्टिरिति—स्वप्नावस्था में मनुष्य सर्वदा ही दर्शन, श्रवण, मनन एवं ज्ञान का अनुभव करता है, क्योंकि ये सभी आत्मस्वरूप ही हैं। इस अनुभव से आत्मा का प्रत्यक्ष सिद्ध होता है। अर्थात् जिसे 'प्रत्यक्ष' शब्द से कहा जाता है, वह 'ज्ञान' ही है, और 'ज्ञेय' पदार्थ जो हैं, वह तो 'ज्ञान' की उपाधिमात्र हैं, और 'ज्ञान' ही आत्मा का स्वरूप है ॥ २६ ॥

हृदयस्पशिनी पुनरपि शंका होती है कि अहंकार ही तो आत्मा है, तब यह कैसे कहा जा रहा है कि अहंकार और आत्मा में विवेक न होने से आत्मा में कर्तृत्वादि का भ्रम होता है ? इसका उत्तर यह है कि अन्तःकरण के सहित दृष्टि आदि जो हैं, वे सब साक्षिवेद्य हैं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि साक्षी, उनसे भिन्न है। पद्य में दृष्टि, श्रुति, मति, ज्ञाति शब्दों से चक्षुरादिद्वारक अन्तःकरणवृत्तियों का निर्देश किया गया है। स्वप्नावस्था में सर्वदा ही मनुष्य दर्शन, श्रवण, मनन तथा ज्ञान का अनुभव करता है। स्वप्न में सवृत्तिक अन्तःकरण वेद्याकार होता है। अतः उनका वेदिता (ज्ञाता) कोई अन्य है, जिसे साक्षी कहते हैं—यह सिद्ध हुआ। इससे आत्मा की अपरोक्षता (प्रत्यक्षता) सिद्ध होती है। दूसरी बात यह है कि दृष्टि आदि सब आत्मस्वरूप ही हैं। अभिप्राय यह है कि सुषुप्ति में सवृत्तिक अन्तःकरण तो अविद्या- मात्र होने से आत्मा में उसका अस्त (लय) हो जाता है, और आत्मा तो कहीं अस्त (लीन) होता नहीं। वह तो स्वयं अद्वय, अपरोक्ष, चिन्मात्ररूप है, अर्थात् 'ज्ञान' ही एकमात्र उसका स्वरूप है। प्रत्यक्ष होनेवाला एकमात्र केवल 'ज्ञान' ही है। ज्ञेय पदार्थ तो उसकी (ज्ञान की) उपाधियां हैं। अतः अहंकारादि स्वरूपवाले अन्तःकरण से आत्मा को पृथक् समझना उचित ही है ॥ २६ ॥

८४ उपदेशसाहस्री परलोकभयं यस्य नास्ति मृत्युभयं तथा। तस्यात्मज्ञस्य शोच्याः स्युः सब्रह्मेन्द्रा अपीश्वराः ॥२७॥ परलोकेति—जिस आत्मज्ञानी मनुष्य को परलोक का भय नहीं है और न मृत्यु का ही भय है, उस आत्म- ज्ञानी की दृष्टि में तो ब्रह्मा और इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल-गण भी शोचनीय ही हैं ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को अहंकारादि से भिन्न (समस्त प्रमाताओं का साक्षिभूत) बताकर उसकी ब्रह्मरूपता को सिद्ध करने से क्या लाभ है ? इस आशंका का समाधान करने के लिये 'योऽन्यथाज्ञः स आत्मवित्' १ श्लोक में उक्त 'आत्मवित्' को स्पष्ट किया है—जिसे परलोक का भय नहीं है और न मृत्यु का ही भय है। श्रुति कह रही है—'किमहं साधु नाकरवम्', 'किमहं पापमकरवम्'२—क्या मैंने अच्छा काम नहीं किया ? तथा क्या मैंने पाप किया ?—इस प्रकार परलोकनिमित्त भय नहीं है। श्रुति कहती है—'नैनं कृताऽकृते तपतः' ३। उसी प्रकार जिसे मृत्युभय (मरणभय) नहीं है, श्रुति कहती है— 'न जीवो म्रियते'४। आत्मा से अतिरिक्त दूसरा उसकी दृष्टि में कोई है ही नहीं। यदि दूसरा कोई हो तो उससे भय हो। श्रुति कहती है—'द्वितीयाद्वै भयं भवति'५। उस आत्मवित् की दृष्टि में तो ब्रह्मा एवं इन्द्रादि और ज्ञान-ऐश्वर्यसम्पन्न ईश्वर (लोकपालादि) भी शोचनीय हैं। आत्मवित् सोचता है कि ये सब ऐश्वर्य में आसक्त हैं, अतः निरन्तर व्यग्र रहते हैं। ये बेचारे कैसे स्वस्थ हो पायेंगे ? तस्मात् जो पुरुष परलोक और मरण के कारण होनेवाली व्यग्रता के हेतुभूत अहंकारादि से शून्य हो, वही ब्रह्मनिष्ठ आत्मवित् है। इससे जो विपरीत हो, वह आत्मवित् नहीं है ॥ २७ ॥ ईश्वरत्वेन किं तस्य ब्रह्मेन्द्रत्वेन वा पुनः । तृष्णा चेत्सर्वतश्छिन्ना सर्वदैन्योद्भवाऽशुभा ॥२८॥ ईश्वरत्वेनेति—सभी प्रकार की दीनता को उत्पन्न करनेवाली अशुभ तृष्णा का यदि क्षय हो गया है तो उस मुमुक्षु पुरुष को ईश्वरत्व या ब्रह्मत्व की प्राप्ति से क्या प्रयोजन है ? अर्थात् वह निःस्पृह रहता है ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मभाव, इन्द्रभाव, ईश्वरभाव की इच्छा सभी लोग किया करते हैं, तब वे ब्रह्मेन्द्रादि शोचनीय कैसे कहलायेंगे ? इसका समाधान यह है कि ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होने पर कुछ भी प्रार्थनीय नहीं रहता। सब प्रकार की दीनता उत्पन्न करनेवाली पापवृत्ति की द्वार होने से अशुभरूपिणी तृष्णा का सर्वथा समूल क्षय हो जाने के कारण उस आत्मवित् पुरुष को ब्रह्मत्व, इन्द्रत्व, ईश्वरत्व से क्या प्रयोजन है ? श्रुति कहती है— 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते'६ ॥ ॥ २८ ॥ अहमित्यात्मधीर्या च ममेत्यात्मीयधीरपि । अर्थशून्ये यदा यस्य स आत्मज्ञो भवेत्तदा ॥२९॥ अहमिति—जिस समय मनुष्य 'अहम्' इस आत्म बुद्धि को तथा 'मम' इस आत्मीय बुद्धि को व्यर्थ ( निष्प्रयो- जन ) समझने लगे, तभी उसे 'आत्मज्ञ' समझना चाहिये ॥ २९ ॥ १. ( उ० सा० १४।२४ ) २. ( तै. उ. २।९ ) ३. ( बृ. उ. ४।४।२२ ) ४. ( छां. उ. ६।११।६ ) ५. ( बृ. उ. १।४।२ ) ६. ( बृ. उ. ४।४।७ )

स्वप्नस्मृतिनप्रकरणम् ८५ हृदयस्पर्शिनी 'निर्ममं निरहंकारं यः पश्यति स पश्यति' इस पूर्व श्लोक के द्वारा जो कहा गया है, उसी को स्पष्ट करते हुए आत्मज्ञ का लक्षण बता रहे हैं। अर्थात् 'ब्रह्मात्मज्ञ' कब होता है ? जिस समय शास्त्र और आचार्य से अनुगृहीत मनुष्य की दृष्टि में 'अहम्' इस प्रकार की आत्मबुद्धि और 'मम' इस प्रकार की आत्मीय विषयबुद्धि निष्प्रयोजन (व्यर्थ) हो जाय, अर्थात् आदमी तत्प्रयुक्त व्यवहार से रहित हो जाय, तब उसे आत्मवित् समझना चाहिए अर्थात् देह और तदनुबन्ध में व्यवहारकाल में भी पूर्वावस्था की तरह वस्तुत्वोल्लेख से रहित होने के कारण वह आत्ममात्रदर्शी अर्थात् पूर्णतया आत्मवित् हो जाता है ॥ २९ ॥ बुद्ध्यादौ सत्युपाधौ च तथाऽसत्यविशेषता । यस्य चेदात्मनो ज्ञाता तस्य कार्यं कथं भवेत् ॥३०॥ बुद्ध्यादाविति—जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बुद्धि आदि उपाधियों के विद्यमान रहते हुए तथा सुषुप्ति अवस्था में उन उपाधियों के विद्यमान न रहने पर भी जिस पुरुष को आत्मा के एकत्व (एकरूपता) का बोध हो गया हो, उस पुरुष के लिये किसी प्रकार का भी कोई कर्तव्य कार्य कैसे शेष रह सकता है ? ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मबुद्धि और आत्मीयबुद्धि दोनों की प्रवर्तकत्व शक्ति जब समाप्त हो जाती है, तब वेदान्तवाक्य से यथोक्त विद्या का उदय उस पुरुष में होता है। उस समय वह कृतकृत्य हो जाता है, तब उसमें कार्यशेषता का होना संभव नहीं, अतः पूर्वकथित अकार्यशेषता ही उसमें रहती है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बुद्धि आदि उपाधियों के रहने पर तथा सुषुप्ति अवस्था में उन उपाधियों के न रहने पर जिस पुरुष को आत्मा की अविशेषता (एकरूपता) का ज्ञान हो जाता है, उस पुरुष के लिए कोई कर्तव्य कैसे रह सकता है ? अर्थात् उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता । यद्यपि आत्मा की एकरूपता (अविशेषता) में कोई सन्देह नहीं है, तथापि पद्य में 'चेत्' इस सन्देहवाचक शब्द को 'वेदाच्चेत्प्रमाणम्' की तरह समझना चाहिए ॥ ३० ॥ प्रसन्ने विमले व्योम्नि प्रज्ञानैकरसेऽद्वये । उत्पन्नात्मधियो ब्रूत किमन्यत्कार्यमिष्यते ॥३१॥ प्रसन्न इति—स्वाभाविक तथा आगन्तुक दोषों से शून्य (रहित) आकाशस्वरूप, विज्ञानैकरस, अद्वितीय परब्रह्म में जिसे आत्मबुद्धि उत्पन्न हो गई है, उस पुरुष के लिये आत्मस्वरूप-ज्ञान के अतिरिक्त तुम ही बताओ कि अन्य कर्तव्य क्या हो सकता है ? ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मवित् के लिये कोई भी कार्य, कर्तव्यरूप में शेष नहीं है। क्योंकि आगन्तुक तथा स्वाभाविक दोषों से रहित, आकाश की तरह निरवयव, विज्ञानैकरस, अद्वितीय अर्थात् कार्य-कारणविभागशून्य परब्रह्म में 'अहमस्मि' इस प्रकार जिसे आत्मबुद्धि उत्पन्न हो गई है, उस पुरुष के लिये, बताओ, कोई अन्य कर्तव्य कैसे रह सकता है ? अर्थात् आत्मस्वरूपज्ञान के अतिरिक्त कोई भी कार्य उसके लिये नहीं है ॥ ३१ ॥ आत्मानं सर्वभूतस्थममित्रं चात्मनोऽपि यः । पश्यन्निच्छत्यसौ नूनं शीतीकर्तुं विभावसुम् ॥३२॥ आत्मानमिति—जो मनुष्य, समस्त प्राणियों (प्राणिमात्र) में आत्मा को देखता है, अर्थात् अनुभव करता है, उसी प्रकार किसी को वह अपना शत्रु भी समझता है, तो उसकी वह समझ अग्नि को शीतल करने के समान ही है। अर्थात् जैसे अग्नि का शीतल होना असंभव है, उसी प्रकार आत्मज्ञानी की दृष्टि में अपना कोई शत्रु दिखाई देना भी सर्वथा असंभव है ॥ ३२ ॥ १. ( उ. शा. १४।२२ )

८६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी शास्त्र और आचार्य के अनुग्रह से (प्रसाद से) तत्त्वज्ञान हो जानेपर भी श्रेयोमार्ग की प्राप्ति में प्रति- बन्धक शत्रु की संभावना तो हो ही सकती है, उसके निवारणार्थ कुछ कार्य तो करना ही होगा । यह आशंका हो सकती है, किन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि रवि की स्वाभाविक उष्णता को शीतल करना अथवा अग्नि की स्वाभाविक उष्णता को शीतल करना जैसे संभव नहीं अर्थात् उष्ण स्वभाव वाले अग्नि को जैसे शीत स्वभाव का नहीं बनाया जा सकता, उसी प्रकार आत्मवित् की दृष्टि में अपना कोई शत्रु दिखाई देना सर्वथा असंभव है। क्योंकि समस्त प्राणियों में वह आत्मवित् अपने को ही देखता रहता है, अतः उसमें शत्रु-मित्रादि की भावना का होना संभव ही नहीं है । इसलिये उसमें कार्यशेषता नहीं बन पाती ॥ ३२ ॥ प्रज्ञाप्राणानुकार्यात्मा छायेवाक्षादिगोचरः । ध्यायतीवेति चोक्तो हि शुद्धो मुक्तः स्वतो हि सः ॥३३॥ प्रज्ञेति—यह आत्मा, बुद्धि और प्राण का अनुकरण करता रहता है। बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुआ वह आत्मा सूर्य के प्रतिबिम्ब के समान इन्द्रिय आदि का विषय होता है। बुद्धि जब किसी विषय का ध्यान करती है, तब वही (आत्मा ही) ध्यान करता-सा प्रतीत होता है। इसी बात को भगवती श्रुति भी कह रही है—'आत्मा मानो ध्यान करता है' १ किन्तु वस्तुतः उस आत्मा में कोई क्रिया अथवा विकार नहीं है, वह तो सर्वदा शुद्ध और मुक्त ही है ॥ ३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में कार्यशेषता समझनेवाले से हम पूछते हैं कि पहले यह बताओ कि कार्यशेषता सोपाधिक आत्मा में समझते हो या निरुपाधिक आत्मा में ? सोपाधिक आत्मा में यदि कार्यशेषता कहो तो उसे हम भी कहते हैं। किन्तु यदि निरुपाधिक आत्मा की कार्यशेषता कहो, तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि आत्मा, बुद्धि और प्राण का अनुकरण करता है। वह सूर्यादि के प्रतिबिम्ब के समान इन्द्रिय आदि का विषय होता है। अर्थात् जिस प्रकार सूर्य आदि का प्रतिबिम्ब जल आदि में गिरने से उनकी चञ्चलता के कारण चलायमान-सा दिखाई देता है, उसी प्रकार बुद्धि आदि में प्रतिबिम्बित हुआ आत्मा, उन बुद्धि आदि के ध्यान करने पर ध्यान करता-सा जान पड़ता है,१ किन्तु वास्तव में उसमें कोई क्रिया या विकार नहीं है, वह तो सर्वदा शुद्ध और मुक्त ही है ॥ ३३ ॥ अप्राणस्याऽमनस्कस्य तथाऽसंसर्गिणो दृशेः । व्योमवद्व्यापिनो ह्यस्य कथं कार्यं भवेन्मम ॥३४॥ अप्राणस्येति—प्राणहीन, मनोहिन, असंसारी और आकाश के समान व्यापक मुझ साक्षी को किसी प्रकार का कोई कर्तव्य कैसे हो सकता है ? ॥ ३४ ॥ हृदयस्पर्शिनी निरुपाधिक आत्मा में कार्यशेषता तो है ही नहीं, उसी तरह 'प्राणायामान् षडाचरेत्'२ इत्यादि यतिधर्म- विधिशेषता भी उसमें नहीं है। क्रियाशक्तिवाले प्राण से हीन, ज्ञानशक्तिवाले मन से हीन, स्वभावतः ही असंग (असंसारी), आकाश के समान व्यापक (अपरिच्छिन्न) अर्थात् स्वतः चलनशक्ति से रहित, चिदेकरस (साक्षी) स्वरूप मेरे लिये कोई कर्तव्य कैसे संभव हो सकता है ? तस्मात् मुझ निरुपाधिक में किसी प्रकार की कोई कार्यशेषता नहीं है ॥ ३४ ॥ असमाधिं न पश्यामि निर्विकारस्य सर्वदा । ब्रह्मणो मे विशुद्धस्य शोध्यं नान्यद्विपाप्मनः ॥३५॥ असमाधिमिति—मैं निर्विकार विशुद्ध ब्रह्मस्वरूप हूँ, मुझे कभी कोई विक्षेप (विकार) नहीं दिखाई देता, तथा मैं सर्वथा और सर्वदा निष्पाप हूँ, अतः कुछ शोधन करने योग्य भी मैं नहीं समझता ॥ ३५ ॥ १. 'ध्यायतीव लेलायतीव'—(बृ. उ. ४।३।७) २. (मनु. ६।६९)

स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ८७ हृदयस्पर्शिनी कदाचित् किसी आत्मवित् को विक्षेप (असमाधान) हो तो उसे दूर करने के लिए उसे कुछ कार्यानुष्ठान करना ही होगा । अर्थात्- 'तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्याऽऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये'१ ॥ इत्यादि भगवद्वचन के अनुसार मनःसमाधान के द्वारा आत्मशुद्धि सम्पादन करना तो अभी अवशिष्ट ही है, इस आशंका पर यह कह सकते हैं कि आत्मशुद्धि तो पहले से ही सिद्ध है, आत्मशुद्धिसम्पादन करने का यह अवसर नहीं है । असमाधि का अर्थ 'विकार' है । और विकार उपाधि से होता है । एवंच विकार की हेतुभूत उपाधि से रहित होने के कारण आत्मा सर्वदा निर्विकार ही है, उसे आत्मशुद्धि की अब क्या आवश्यकता होगी ? मैं निर्विकार विशुद्ध ब्रह्मस्वरूप अपने में कभी कोई विक्षेप नहीं देखता, और सर्वथा पापरहित होने के कारण कुछ शोधन करने के योग्य भी नहीं समझता ॥ ३५ ॥ गन्तव्यं च तथा नैव सर्वगस्याऽचलस्य च । नोर्ध्वं नाधस्तिरो वापि निष्कलस्यागुणत्वतः ॥ ३६॥ गन्तव्यमिति--मैं सर्वगत और निश्चल हूँ । अतः मेरे लिये कोई गन्तव्य देश नहीं है। उसी तरह निर्गुण होने के कारण मैं निरवयव हूँ, अतएव मुझमें कुछ ऊपर-नीचे अथवा इधर-उधर भी नहीं है ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी शोधन करने योग्य किसी वस्तु को मैं नहीं देख रहा हूँ, क्योंकि मैं आत्मवित्, नित्य निवृत्तकल्मष हूँ । 'मैं आत्मवस्तु के सिवाय अन्य किसी वस्तु को नहीं देखता हूँ'—यह कथन ठीक नहीं प्रतीत हो रहा है, क्योंकि गन्तव्य- स्थान ब्रह्मलोकादि और गमनसाधन जो अर्चिरादिमार्ग—उसको जानना तो ब्रह्मवित् के लिये भी आवश्यक है। अतः ज्ञातव्य आत्मवस्तु के अतिरिक्त गन्तव्य और गमनसाधन भी ज्ञातव्य है, यह शंका हो सकती है, किन्तु उसका समाधान यह है—सगुणब्रह्मवित् को वह हो सकता है, निर्गुणब्रह्मवित् के लिए वह नहीं है । 'गन्तव्यम्' का भाव और कर्म में तन्त्रेण ग्रहण होगा । तथाच सर्वगत (सर्वत्र व्यापक) होने से चलन (हिलने) का सामर्थ्य नहीं है, उसके न होने से मैं गन्तव्य (गम धात्वर्थ जो गमन) को नहीं जानता, तथा 'गन्तव्य' अर्थात् गति (गमन) के द्वारा प्राप्तव्य देशरूप स्थानविशेष को भी नहीं लक्षित कर रहा हूँ । अर्थात् सर्वगत होने से निश्चल हूँ, इस कारण मेरे लिये कोई गन्तव्य देश नहीं है। और निर्गुण (अगुण) होने से मैं निरवयव हूँ। यदि यहाँ 'निर्गुण' न कहकर केवल 'निरवयव' कहते तो उसका 'निष्कलत्व' (पूर्णत्व) सिद्ध न हो पाता । क्योंकि कुछ लोगों के अनुसार ज्ञान, सुख आदि गुणात्मक अवयव उसके होने से उसे निरवयव नहीं कहा जा सकेगा । अतः निष्कलत्व को बताने के लिये 'अगुणत्वतः' (निर्गुण) कहना पड़ा । यह जो कहा गया था कि मेरा कोई प्राप्तव्य देश नहीं है, उसका कारण यह है कि देश-भेद हो तो गन्तव्य आदि स्थान का विभाग हो सके । मेरे लिये तो ऊपर-नीचे अथवा सामने-पीछे, दक्षिण, उत्तर कोई दिग्‌विभाग नहीं है । क्योंकि मैं तो पूर्ण (निष्कल) हूँ। निष्कल इस कारण हूँ कि मैं ज्ञानस्वरूप, सुखस्वरूप हूँ, ज्ञान, सुख आदि मेरे गुण नहीं हैं। मैं तो असंग हूँ, मुझ असंग में संसर्गी गुणों का रहना संभव नहीं है। अतः जैसे दिग्भेद न होने से मेरा कोई गन्तव्य स्थान नहीं, वैसे ही गुण से भी विभागशून्य होने के कारण मेरा कोई गन्तव्य स्थान नहीं है । और न गति (प्राप्ति) ही है। अतः आत्मवित् के लिये गन्तव्य तथा गमनसाधन के जानने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ३६ ॥ चिन्मात्रज्योतिषो नित्यं तमस्तस्मिन्न विद्यते । कथं कार्यं ममैवाद्य नित्यमुक्तस्य शिष्यते ॥ ३७॥ चिन्मात्रेति-जो सर्वदा चिन्मात्र, ज्योतिःस्वरूप है, उसमें (आत्मा में) अज्ञान (तम) भी नहीं है, तब नित्यमुक्त मेरे लिये अब भी कोई कर्तव्य कैसे शेष रह सकता है ? ॥ ३७ ॥ १. (भ. गी. ६।१२ )

८८ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी आत्मा तो सर्वदा चिन्मात्र ज्योतिःस्वरूप है, अतः वह गुण आदि से रहित है। क्योंकि गुण आदि की सत्ता तो अविद्या के होने से होती है। और गुण आदि के कारणीभूत अज्ञान की स्थिति आत्मवित् में कभी नहीं रहती। क्योंकि वह तो चिन्मात्र है। नित्यमुक्त आत्मा में अज्ञान रूप उपाधि के बिना किसी भी प्रकार के विशेष की कल्पना करना शक्य नहीं है। अज्ञान को ज्ञानस्वभाव कहना तो वस्तुतः असंभव ही है। अतः आत्मा में क्रिया- योग्यता तो कदापि नहीं बन सकती। इतना स्थित होने पर अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जब अज्ञान का भी प्रतिभास नहीं है तब उसमें कर्मविधिशेषता कैसे हो सकेगी ? आत्मा में स्वरूपतः, प्रतिभासतः भी तम (अज्ञान) नहीं है, क्योंकि वह तो चिन्मात्र ज्योतिःस्वरूप है ॥ ३७ ॥ अमनस्कस्य का चिन्ता क्रिया वाऽनिन्द्रियस्य का । 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र' इति सत्यं श्रुतेर्वचः ॥३८॥ अमनस्कस्येति-जो अमनस्क (मनोहीन) है, उसे चिन्ता कैसे हो सकती है? और जो अनिन्द्रिय (इन्द्रिय- रहित) है, वह किसी भी क्रिया को कैसे कर सकता है ? उसके विषय में भगवती श्रुति का वचन यथार्थ ही है-‘आत्मा, प्राणहीन, मनोहीन एवं शुद्ध है।' अतएव वह सर्वचिन्तारहित और निष्क्रिय है ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी किञ्च आत्मज्ञानी का अज्ञान के साथ और उसके कार्यभूत मन और चक्षुरादि के साथ सम्बन्ध न होने से उभयविध (बाह्याभ्यन्तर) क्रिया का अभाव है। अर्थात् जो मनोहीन होगा, उसे चिन्ता कैसे होगी ? और जिसे इन्द्रियाँ नहीं होंगी, वह क्रिया कैसे कर सकेगा ? एवञ्च उसमें क्रियाशेषता नहीं है। आत्मा के मन, प्राण आदि के न होने में प्रमाण यह है 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' १-आत्मा प्राणहीन, मनोहीन, एवं शुद्ध है- श्रुति वचन का अर्थ सत्य समझना चाहिये, वह कभी असत्य नहीं हुआ करता। और वह निर्दोष होने के कारण स्वतः प्रमाण रहता है। अतः आत्मवित् सर्वदा चिन्तारहित और क्रियारहित होता है ॥ ३८ ॥ अकालत्वाददेशत्वादादिक्त्वादनिमित्ततः । आत्मनो नैव कालाद्यपेक्षा ध्यायतः सदा ॥३९॥ अकालत्वादिति-‘आत्मा' काल, देश, दिक् से रहित है, और र्नािनमित्त है। अतः उसका ध्यान करने- वाले के लिये सर्वदा ही (कभी भी) काल आदि की अपेक्षा नहीं है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी किञ्च पुनः एक प्रश्न मन में उठता है कि आत्मचिन्तन के लिये अपररात्र्यादि काल, विविक्त पूतादि देश, प्राच्यादि दिग्विdefault/विशेष, मनोविक्षेपराहित्य, राहूपरागादि निमित्त की प्रतीक्षा तो करनी ही होगी, तब उसे क्रियारहित कैसे कह सकते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जा रहा है कि सर्वदा आत्मचिन्तन करने वाले यति के लिये काल, देश आदि की कोई अपेक्षा नहीं होती। अर्थात् जिस प्रकार धर्म का अनुष्ठान करने के लिये पूर्वाह्नादि काल, तीर्थस्थानादि पवित्र देश, पूर्वादि दिशा तथा सूर्यग्रहणादि निमित्त की आवश्यकता रहती है, वैसी आत्मचिन्तन के लिये किसी नियम की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि आत्मा तो काल, देश, दिशा, निमित्त आदि किसी भी उपाधि से परिच्छिन्न नहीं है। एवञ्च आत्मस्वरूप के कालादि में से कोई निबन्धन न होने से उसके ध्यान करने में भी काल आदि की अपेक्षा नहीं होती। उस कारण चलते, फिरते, कहीं भी और किसी भी समय आत्मस्वरूप का चिन्तन (निदिध्यासन) किया जा सकता है। तस्मात् आत्मवित् में क्रियाशेषता नहीं है। भगवान् सूत्रकार ने भी ‘यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात्' २ सूत्र से यही कहा है ॥ ३९ ॥ १. (मुं. उ. २।१।२) २. (ब्र. सू. ४।१।११)

स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ८९ यस्मिन्देवाश्च वेदाश्च पवित्रं कृत्स्नमेकताम् । व्रजेन्मानसं तीर्थं यस्मिन्स्नात्वाऽमृतो भवेत् ॥४०॥ यस्मिन्निति—समस्त देवगण, वेद और सर्वदा पवित्र (शुद्ध) हरि-हरनामोच्चारणादि, जहां एकत्व को प्राप्त हो जाते हैं, उस मानसतीर्थ में मुमुक्षु को जाना चाहिये, जिसमें स्नान करने से मनुष्य अमर हो जाता है ॥ ४० ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मवित् (ब्रह्मवित्) को देश-काल आदि की अपेक्षा रखने वाले कर्म की अपेक्षा न रहने पर भी ‘गङ्गातीरे वसेन्नित्यं भिक्षुर्मोक्षपरायणः’—इस स्मृतिवचन के अनुसार उसे प्रयागादि तीर्थ की तो अपेक्षा रहती ही है, क्योंकि प्रयागादि तीर्थ को मुक्ति में हेतु कहा है । अतः ब्रह्मविद् को सर्वविध अपेक्षारहित कैसे कहा जायगा ? ऐसी आशंका होने पर कहा गया है कि मुक्ति के साक्षात् कारणभूत ब्रह्मात्मज्ञानरूप तीर्थ में जिसने स्नान कर लिया है, उस आत्मज्ञानी के लिये अन्य तीर्थ की अपेक्षा नहीं है । तात्पर्य यह है—सभी तीर्थस्थानों के अधिष्ठाता माधव, विश्वेश्वर, रामेश्वर, त्रिविक्रम आदि देवगण, जो अपनी पूजा, तथा दर्शन, स्पर्शन, स्मरण आदि से भक्तों को पावन करते हैं, तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, जो अपने अध्ययन, ब्रह्मयज्ञपाठ, अनुष्ठान आदि से अनुष्ठाताओं को पवित्र करते हैं तथा सम्पूर्ण पवित्र तीर्थविशेष हरि-हर नामोच्चारण आदि, ब्रह्मात्मस्फुरण होने वाले आत्मज्ञानी में सागर में नदियों के समान ये सब एक हो जाते हैं, क्योंकि सर्वात्मब्रह्माविर्भाव रूप ही वह हो जाता है, सब के एक होने में यही एक परम हेतु है । उस आत्मवित् के अन्तःकरण की वेदान्तमहावाक्यजनित जो ब्रह्माकार वृत्ति है, वह संसाररूप महापाप की मूलभूत अविद्या की उच्छेदिका होने से तीर्थस्वरूप है। उस ब्रह्माकार वृत्तिरूप तीर्थ में अवगाहन कर जलराशि में निक्षिप्त जलबिन्दु के समान एकता को प्राप्त होकर निर्विशेष नित्यात्मस्वरूप ही वह हो जाता है । उस तीर्थ में नित्य निमग्न रहने वाले को किसी अन्य तीर्थान्तर की अपेक्षा नहीं रहती । यही बात तैत्तिरीय श्रुति भी कह रही है—‘शतं शुक्राणि यत्रैकं भवन्ति । सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति । सर्वे होतारो यत्रैकं भवन्ति । स मानसीन आत्मा जनानाम्’ ।१ उसी तरह काठक श्रुति भी कह रही है—‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम’ ।२ अतः जिसमें समस्त देववृन्द, वेद, भगवन्नामोच्चारण, जप आदि सब एकता को प्राप्त हो जाते हैं, उस मानस तीर्थ में जाना चाहिये, जिसमें स्नान करके मनुष्य अमर हो जाता है ॥ ४० ॥ न चास्ति शब्दादिरनन्यवेदनः परस्परेणापि न चैव दृश्यते । परेण दृश्यास्तु यथा रसादयः तथैव दृश्यत्वत एव दैहिकाः ॥४१॥ न चेति—शब्द-स्पर्शादि विषय स्वयं जड़ हैं, वे स्वयंप्रकाश नहीं हैं, और वे स्वयं जड़ होने के कारण ही परस्पर एक-दूसरे से प्रकाशित नहीं हो पाते हैं । अतः ये शब्द-स्पर्श-रसादि बाह्य विषय, जैसे किसी दूसरे के दृश्य माने जाते हैं, उसी प्रकार शारीरिक रसादि विषय भी दृश्य होने के कारण परप्रकाश्य ही हैं ॥ ४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार कृतार्थ करा देने वाले ज्ञानतीर्थ को किस उपाय से प्राप्त किया जाय ? यह जिज्ञासा होने पर पूर्वोक्त पदार्थविवेक ही उसके प्राप्ति का उपाय है, यह बताने के लिये प्रथमतः आत्मा की स्थूल देह से भिन्नता को स्पष्ट कर रहे हैं । शब्द से लेकर गन्ध तक जितने विषय हैं, वे अनन्यवेदन नहीं हैं, अर्थात् स्वयंप्रकाश नहीं हैं । तथा वे परस्पर एक-दूसरे से भी प्रकाशित नहीं होते हैं । अर्थात् शब्द से स्पर्श, तथा स्पर्श से शब्द इस प्रकार परस्पर के द्वारा भी प्रकाशित नहीं किये जाते हैं, क्योंकि वे सभी जड़ हैं । व्यवहार सर्वदा वस्तु को देखकर ही होता है, बिना देखे नहीं होता । शब्दादि विषयों का दर्शन स्वतः भी नहीं और परस्परतः भी नहीं, परिशेषात् स्वविलक्षण अजड १. ( तै. आ. ३।११ ) २. ( कठ. उ. ४।१४ ) १२

९० उपदेशसाहस्री (चेतन) से ही प्रकाश्य हैं। जिस प्रकार ये बाह्य रसादि किसी अन्य के दृश्य हैं, उसी प्रकार दृश्य होने से शारीरिक रसादि भी परप्रकाशय ही हैं। तथाच अनुमान-प्रयोग इस प्रकार होगा—'दैहिका रसादयः परेण दृश्याः दृश्यत्वात् बाह्य रसादिवत्।' तथैव 'इमे'—यह उपनय और 'तस्मात्तथा'—यह निगमन है। एवं च आत्मा, स्थूल देह से भिन्न है ॥ ४१॥ अहम्ममेत्येषणयत्नविक्रियासुखादयस्तद्वदिह प्रदृश्यतः । दृश्यत्वयोगाच्च परस्परेण ते न दृश्यतां यान्ति ततः परो भवान्* ॥ ४२ ॥ अहमिति—उसी तरह व्यवहार में अहंकार, ममता, इच्छा, यत्न, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादि विकार और सुख- दुःखादि भी दृश्यरूप होने से स्वयं प्रकाश नहीं हैं, और उनमें दृश्यत्व होने के कारण ही वे परस्पर भी एक दूसरे को प्रकाशित नहीं कर सकते। अतः इनके संघात रूप लिङ्गशरीर से आप (आत्मा) पृथक् (भिन्न) ही हैं ॥ ४२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक के द्वारा पञ्चभूतात्मक स्थूल शरीर से उसके द्रष्टा आत्मा को पृथक् (अतिरिक्त) सिद्ध करके, अब सूक्ष्मदेह से भी उसे (आत्मा को) पृथक् सिद्ध कर रहे हैं। अहंकार, ममता, इच्छा, यत्न, (कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि) विकार, और सुखादि (दुःख, मोह, द्वेष प्रभृति) ये सब 'मेरे' (मम) शब्द से निर्दिश्यमान मनोवृत्तिरूप हैं, उसी तरह पूर्वनिर्दिष्ट शब्दादि विषयों के समान ये भी स्वयम्प्रकाश (अनन्यवेदन) नहीं हैं। क्योंकि लोकव्यवहार में ये सभी दृश्य हैं (दर्शनक्रिया के कर्म हैं)। अतः इन्हें स्वयम्प्रकाश न कहना उचित ही है। तथा ये परस्पर भी एक दूसरे के दृश्य नहीं हो पाते। अभिप्राय यह है—स्थूल-देह के समान सूक्ष्म-देहात्मक अहंकारादि भी व्यवहार में स्वतः सिद्ध नहीं हैं, और उसी कारण वे परस्पर भी एक दूसरे को नहीं दिखाई पड़ते। एवं च स्वयं से भी स्वयं का ग्रहण न कर- पाने से तथा परस्पर भी एक-दूसरे से एक-दूसरे का ग्रहण न कर पाने से परिशेषात् उन सभी का ग्राहक (द्रष्टा), उन अहंकारादिकों से (अहंकारादिकों के संघात रूप सूक्ष्म देह=लिगशरीर से) अतिरिक्त (पृथक्) ही है ॥ ४२ ॥ अहंक्रियाद्या हि समस्तविक्रिया सकर्तृ का कर्मफलेन संहता । चितिस्वरूपेण समन्ततोऽर्कवत् प्रकाश्यमानाऽसिततात्मनो ह्यतः ॥ ४३ ॥ अहंक्रियाद्या इति—अहङ्कारादि सम्पूर्ण विकार सकर्तृक और कर्मफल से संहत हैं, और सूर्य के समान सर्वदा चेतनस्वरूप आत्मा से ही प्रकाशित होते हैं अतः आत्मा बन्धनरहित है, यह सिद्ध होता है। अहंकारादि उसे बाँध नहीं सकते, क्योंकि वे आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित हुआ करते हैं ॥ ४३ ॥ हृदयस्पर्शिनी तथापि पुनः जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त प्रकार से यद्यपि स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहों (शरीरों) का ग्राहक (द्रष्टा) होने से उन दोनों शरीरों से अतिरिक्त ही आत्मा है, तथापि उनके साथ उस (आत्मा) की सम्बन्धप्रतीति तो सभी को होती है, तब उसे (आत्मा को) नित्यमुक्त कैसे कहा जायगा ? उक्त जिज्ञासा का समाधान इस प्रकार किया जाता है कि अहंकारादि सम्पूर्ण विकार सकर्तृक और कर्मफल से संहत है, तथा सूर्य के समान चेतनस्वरूप आत्मा से ही सर्वथा प्रकाशित होते रहते हैं। उस कारण आत्मा की अबद्धता (बन्धनशून्यता) सिद्ध है। स्थूल- सूक्ष्म देहात्मक विकार (विक्रिया) के साथ प्रतीयमान सम्बन्ध भी दृश्य है, ऐसी स्थिति में वह (सम्बन्ध) द्रष्टा का धर्म कैसे हो सकता है ? आत्मा तो उस सम्बन्ध का भी साक्षी (द्रष्टा) है। विकार और तत्सम्बन्ध आदि ये स्वयं आत्मचैतन्य से प्रकाशित होते रहते हैं, अतः वे उसे कैसे बाँध सकेंगे ? अतः आत्मा सदा-सर्वदा नित्य मुक्त ही है ॥ ४३ ॥ दृशिस्वरूपेण हि सर्वदेहिनां वियद्यथा व्याप्य मनांस्यवस्थितः । अतो न तस्मादपरोऽस्ति वेदिता परोऽपि तस्मादत एक ईश्वरः ॥४४॥

  • भवेत्—पाठान्तरम् ।

स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ९१ दृशीति-आत्मा, सम्पूर्ण देहधारियों के अन्तःकरणों को आकाश के समान व्याप्त करके साक्षी के रूप में स्थित है। अतः उससे भिन्न अन्य कोई ज्ञाता नहीं है, और न उससे भिन्न परमेश्वर ही ज्ञाता है। इसलिये आत्मा एक ही है ॥ ४४ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धि और उसकी वृत्तियों का साक्षी (द्रष्टा) होने के कारण आत्मा का नित्यमुक्तत्व (बन्धनशून्यत्व = असितत्व) यद्यपि सिद्ध किया गया है, अर्थात् द्विविध देहों से आत्मा का पृथक्त्व (विविक्तत्व) यद्यपि बताया गया है, तथापि प्रत्येक देह में उसकी भेदेन प्रतीति होती है, अर्थात् प्रत्येक देह में वह परिच्छिन्न हुआ प्रतीत होता है। उस- कारण ब्रह्मरूप में उसकी पूर्णता कैसे हो सकती है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है—यह आत्मा सम्पूर्ण देहधारियों के अन्तःकरणों को उनका साक्षी (द्रष्टा) बनकर, घट-पटादिकों को व्याप्त किये हुए आकाश के समान व्याप्त करके अवस्थित है। वह परिच्छिन्न रूप में स्थित नहीं है। अतः उस चिति (चैतन्य) स्वरूप आत्मा से भिन्न कोई अन्य जीव ज्ञाता नहीं है, तथा न उससे भिन्न कोई दूसरा ईश्वर ही ज्ञाता है। क्योंकि दोनों का चैतन्य (चिति) स्वरूप एक (समान) ही है। अतः एक ही आत्मा है। उसके भिन्न-भिन्न स्वरूप नहीं हैं। आकाश के समान उपाधि- परामर्श के बिना उसमें भेदप्रतीति नहीं हो पाती। अतः वास्तविक रूप से आत्मा एक ही है ! उसकी भिन्नता में कोई प्रमाण नहीं है। इससे आत्मा की ब्रह्मात्मता (ब्रह्मरूपता = पूर्णता) सिद्ध है ॥ ४४ ॥ शरीरबुद्धयोर्यदि चान्यदृश्यता निरात्मवादाः सुनिराकृता मया । परश्च शुद्धो ह्यविशुद्धिकर्मतः सुनिर्मलः सर्वगतोऽसितोऽद्वयः ॥४५॥ शरीरबुद्धयोरिति - शरीर और बुद्धि की परप्रकाश्यता यदि सिद्ध होती है, तो मैंने शून्यवादादि निरात्म- वादों का सम्यकतया निराकरण कर दिया है। उसी तरह हिंसादि दोषों से दूषित कर्मों का साक्षी जो आत्मा है, वह भी उन कर्मों से भिन्न है, वह शुद्ध, निर्मल, सर्वगत, स्वतन्त्र एवं अद्वितीय है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वकथनानुसार यह आत्मा यदि स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहों का साक्षी और ब्रह्मरूप है, तो कुछ लोगों को उसके न होने की (उसकी सत्ता = विद्यमानता = अस्तित्व में) शंका क्यों होती है ? यह प्रश्न अभी दूर नहीं हो रहा है। इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर एक शब्द में यही होगा कि 'अपने ही दोष के कारण'—स्वदोषवशादेव वैसी शंका होती है। पूर्वोक्त न्याय से स्थूल-सूक्ष्म देह (शरीर-बुद्धि) की दृश्यता, नित्य-सद्रूप किसी अन्य के द्वारा (शरीर-बुद्धि की परप्रकाश्यता) जबकि सिद्ध हो चुकी है, तब उस से शून्य-क्षणिकवादी (निरात्मवादी) का निराकरण पूर्णरूप से हो जाता है। अर्थात् श्रुति-प्रमाण तथा प्रत्यभिज्ञा प्रमाण के बल पर बौद्धादिकों के सिद्धान्त का निराकरण अच्छी तरह से कर दिया गया है। साक्षी के रूप में वह आत्मा, संसार के हेतुभूत (कारणीभूत) अविशुद्धिकर धर्माऽधर्माख्य कर्मों से एकदम पृथक् (व्यतिरिक्त) ही है, क्योंकि वह तो उनका साक्षीमात्र है। अतः वह साक्षी अद्वय आत्मा अकर्ता (शुद्ध), और कर्मफल-भोगफल के लेश से भी रहित ( सुनिर्मल ), तथा अपरिच्छिन्न (सर्वगत), अतएव बन्धनशून्य (असितः = षिञ् बन्धने) है। उसी तरह वह अद्वितीय भी है। द्वैत प्रपञ्च तो दृश्य है, अतः यह आत्मा तत्सम्बन्धरहित सिद्ध होता हैं ॥ ४५ ॥ घटादिरूपं यदि तेन गृह्यते मनः प्रवृत्तं बहुधा स्ववृत्तिभिः । अशुद्धयचिद्रूपविकारदोषता मतेर्यथा वारयितुं न पार्यते ॥४६॥ घटादिरूपमिति—पुनः एक जिज्ञासा होती है कि आत्मा यदि 'मन' का ग्रहण करता है, और वह मन अपनी वृत्तियों से अनेक आकारों में परिणत होता है। तब उस परिणत हुए मन का ग्रहण करनेवाले आत्मा में भी उस परिणत हुए मन के समान विषयसंसर्गजनित अशुद्धि, अचित्स्वरूपता, और विकारिता आदि दोष उत्पन्न होंगे। जिनका निवारण करना संभव नहीं है ॥ ४६ ॥

९२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त श्लोकों से आत्मा का द्रष्टृत्व सिद्ध किये जाने पर भी शंकाकुल मन में पुनरपि शंका हो रही है कि आत्मा के द्वारा शरीर और बुद्धि यदि दृश्य हों तो पूर्वोक्त कथन सुसंगत हो सकेगा, किन्तु उनकी (शरीर और बुद्धि की) आत्मदृश्यता ही सिद्ध नहीं है। तब उसे (आत्मा को) द्रष्टा कैसे समझा जाय ? अभिप्राय यह है कि यद्यपि द्विविध शरीर का ग्राहक होने से उन दोनों शरीरों से भिन्न, नित्य सद्रूप आत्मा है, तथापि दृश्य के संसर्ग से उत्पन्न होनेवाले दोषों का परिहार कैसे किया जा सकता है ? अपने स्वरूपभूत चैतन्य से दृश्यावच्छिन्न चैतन्य का भेद न होने से वह दृश्य को अवभासित करता है, उसी कारण वह द्रष्टा कहलाता है। यदि इस तरह अवभासित न करे (द्रष्टा न हो) तो दृश्य वस्तु का प्रत्यक्ष ही नहीं हो पायेगा। दृश्य वस्तु को प्रकाशित करने पर ही किसी को द्रष्टा कहा जाता है। यदि मन और उसकी वृत्तियाँ आत्मा के द्वारा प्रकाशित न हों तो आत्मा को द्रष्टा नहीं कहा जा सकेगा । एवंच उनका प्रकाशक होने से उसमें (आत्मा में) उनके संसर्ग से होनेवाले दोषों की संभावना है, इस कारण उसे शुद्ध नहीं कह सकते। पद्य का शब्दार्थ इस प्रकार होगा—यदि अपनी वृत्तियों से घटा-पटादि अनेक आकारों में परिणत होनेवाला मन, उससे (आत्मा से) ग्रहण किया जाता है, तो दृश्य के साथ सम्बन्ध होने से उस (मन) के तुल्य उस आत्मा की भी (विषय-सम्पर्कजनित) अशुद्धि, जड़रूपता (अचिद्रूपता) एवं विकारिता आदि दोषता (दोषों) का निवारण नहीं किया जा सकता। जैसे चैतन्य के संसर्ग से बुद्धि की चिच्छायता (चिच्छायापत्ति) का निवारण नहीं किया जा सकता। इस व्याख्या में 'तेन' यह तृतीयान्त पद रहेगा। अथवा दूसरी व्याख्या—शरीर और बुद्धि को आत्मदृश्य न मानने में बाधा है। अतः दोनों में आत्म- दृश्यता माननी ही होगी। यदि तुम्हारे मत में अपनी वृत्तियों के कारण अनेक प्रकार से प्रवृत्त होकर घट-पटादि विषयाकार बने हुए मन को उससे अतिरिक्त ज्ञात होनेवाले आत्मा के द्वारा गृहीत (प्रकाशित) नहीं किया जाता, तब आत्मा को मन से भिन्न नहीं कहा जा सकेगा। तब उसमें भी मन के समान ही अशुद्धि, अचिद्रूप विकार-दोष मानने होंगे, जिनका निवारण करना शक्य नहीं होगा, और उसे साक्षी मानने पर मन-बुद्धि से पृथक् रहने के कारण मन-बुद्धि के दोषों का उसमें आना संभव ही नहीं है। किन्तु उसे साक्षी न मानने पर बुद्धिगत दोषों का उसमें आना अनिवार्य है, तब उसका कभी मोक्ष ही नहीं हो सकेगा। इस व्याख्या में 'ते' और 'न' पृथक् पद होंगे ॥ ४६ ॥ यथा विशुद्धं गगनं निरन्तरं न सज्जते नापि च लिप्यते तथा । समस्तभूतेषु सदैव तेष्वयं समः सदात्मा ह्यजरोऽमरोऽभयः ॥४७॥ यथेति—जिस प्रकार विशुद्ध और अपरिच्छिन्न आकाश किसी के साथ संलग्न या लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार समस्त भूतों में सर्वदा समान भाव से स्थित रहने वाला यह आत्मा जरा, मरण और भय से रहित रहता है ॥४७॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में मन-बुद्धि के दोष तब आ सकते हैं, यदि वह बुद्धि (मति) के समान सावयव, परिच्छिन्न, परिणामी हो, किन्तु आत्मा का स्वरूप तो ऐसा नहीं है, अतः आत्मा में अशुद्धि आदि दोषों के होने की शंका करने का अवसर ही नहीं है। इसी बात को दृष्टान्त के द्वारा बताते हुए उत्तर दे रहे हैं—जिस प्रकार परिणामरूप विकारात्मक मल से रहित (शुद्ध), और अपरिच्छिन्न (निरन्तर) अतएव निरवयव आकाश, काष्ठ से जतु की तरह किसी के साथ संलग्न अथवा भल्लातक (बिब्वा, भिलावा) रस से वस्त्र के समान लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी विशुद्ध, निरन्तर, निरवयव है, यह शास्त्र से सुनिश्चित हो चुका है, अतः वह भी बुद्धि आदिकों में संलग्न नहीं होता अर्थात् उसके दोष से लिप्त नहीं होता। क्योंकि अपने-अपने अभिमानी देवताओं के सहित विद्यमान समस्त भूतों में वह सर्वदा समान भाव से स्थित रहता है, अतः वह अजर, अमर, अभय है। अर्थात् जरा, मरण और भय से रहित है, यानी नित्य शुद्ध है। तथाच श्रुति ने भी यही बताया है—'जो समस्त भूतों में स्थित रहने वाला समस्त भूतों के भीतर है, जिसे समस्त भूत नहीं जानते, समस्त भूत जिसके शरीर हैं, और जो भीतर रहकर समस्त भूतों का

स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ९३ नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' इति। श्रीमद्भगवद्गीता का भी यही अभिप्राय है— “नाम, रूप, जाति आदि भेदों से परस्पर विभक्त भूतों में एक रूप से विद्यमान तथा भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट न होने वाले परमेश्वर को जो साक्षात् देखता है, वह ब्रह्मविद् यति ही अपने को विमुक्त देखता है²।” कठोपनिषद् ने भी इसी का समर्थन किया है—“सम्पूर्ण भूतों का एक ही आत्मा संसार के दुःख से लिप्त नहीं होता, बल्कि उनसे बाहर रहता है³ ॥ ४७ ॥ अमूर्तंमूर्तानि च कर्मवासना दृशित्वरूपस्य बहिः प्रकल्पिता । अविद्यया ह्यात्मनि मूढदृष्टिभिरपोह्य नेतीत्यवशेषितो दृशिः ॥४८॥ अमूर्तंमूर्तानीति—मूढदृष्टि प्राकृत मनुष्य के द्वारा अविद्यावश आत्मा में वायु और आकाश जैसे अमूर्त एवं अग्नि, जल और पृथिवी जैसे मूर्त भूतों तथा कर्मवासनाओं का आरोप कर लिया जाता है। किन्तु चैतन्यस्वरूप आत्मा से भिन्न बाह्य वस्तुओं का 'नेति-नेति' इत्यादि वाक्य से निषेध (निराकरण) कर देने पर 'साक्षी' ही शेष रह जाता है। अतः उसमें किसी भी प्रकार के दोष का स्पर्श तक नहीं है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी किंच दृश्य के बाधित होने पर भी तत्कृत दोषसम्बन्ध का होना आत्मा में संभव नहीं। क्योंकि मिथ्या पदार्थ (वस्तु) के साथ सत्य वस्तु का सम्बन्ध नहीं हुआ करता। तब दृश्य को बाधित कैसे समझा जाय ? रज्जु-सर्प की तरह प्रतिपन्न उपाधि में निषेध किये जाने के कारण दृश्य को बाधित समझना चाहिये। (उप समीपवर्तिनि स्वधर्मम् आदधाति संक्रामयति इति उपाधिः।) मूढ़ दृष्टिवाले पुरुषों द्वारा मोहरूप अविद्या के कारण दृशित्वरूप प्रत्यगात्मब्रह्मरूप आत्मा में वायु और आकाश रूप अमूर्त, तथा अग्नि, जल और पृथिवीरूप मूर्त भूतों तथा कर्म- वासनाओं का आरोप कर लिया गया है। चैतन्यस्वरूप आत्मा में उन बाह्य वस्तुओं का 'नेति नेति' इत्यादि वाक्य से निराकरण (निषेध) किये जाने पर निषेध का परमावधिरूप साक्षी ही अवशिष्ट रह जाता है⁴। अतः उस आत्मा में किसी प्रकार का दोषसंसर्ग नहीं है। 'अमूर्तंमूर्तानि' यहाँपर 'अमूर्ते च मूर्तानि च अमूर्तंमूर्तानि' अर्थात् पञ्चमहा- भूतात्मक स्थूल पदार्थ⁵ और कर्मवासना का आश्रयभूत लिङ्ग पदार्थ⁶ इस प्रकार अमूर्तादि पदार्थों का निराकरण करते हुए श्रुति ने आत्मस्वरूप का प्रतिपादन किया है। अतः आत्मा की विशुद्धता में कोई सन्देह नहीं है ॥ ४८ ॥ प्रबोधरूपं मनसोऽर्थयोगजं स्मृतौ च सुप्तस्य च *दृश्यतेऽर्थवत् । तथैव देहप्रतिमानतः पृथग् दृशेः शरीरं च मनश्च दृश्यतः ॥४९॥ प्रबोधरूपमिति—जैसे जाग्रत् अवस्था, 'मन' कि विषयाकार वृत्तिस्वरूप है, क्योंकि वह विषयाकार मनो- वृत्ति, विषय के संसर्ग से उत्पन्न हुई है। तथा स्वप्न और स्मृति के समय भी मन की वृत्ति विषयाकार प्रतीत होती है, यद्यपि उस समय विषय का अभाव रहता है। उसी प्रकार दृश्य होने के कारण, 'शरीर, मन और दोनों शरीरों' का जो १. “यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।”—(बृ. उ. ३।७।१५) २. “समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ।”—(भ. गी. १३।२७) ३. “न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः”—(कठ. उ. २।२।११) ४. “सत्यस्य सत्यम्”—(बृ. उ. २।३।६), “अधिष्ठानावशेषो हि नाशः कल्पितवस्तुनः”—(सूत सं. ४।२।८) ‘यथा शुक्तौ आरोपितस्य रजतस्य अधिष्ठानशुक्तियाथात्म्यज्ञानेन निवृत्तौ सत्याम् अधिष्ठानभूता शुक्तिरेव केवलमवशिष्यते, नतु अन्य- द्रजतं तदभावलक्षणं किमपि। तद्वदेव सकलजगदधिष्ठानब्रह्मस्वरूपयाथात्म्यज्ञानेन समारोपितजगन्निवृत्तौ अधिष्ठानमात्रा- वशेषोऽवतिष्ठते।' ५. “द्वे वा व ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च”—(बृ. उ. २।३।१) ६. “तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासः”—(बृ. उ. २।३।६)

  • दृश्यतोऽर्थ०—पाठान्तरम् ।

९४ उपदेशसाहस्री प्रतिभास होता है, वह भी 'आत्मा' से पृथक् ही है। वे 'आत्मा' के विशेषण नहीं हैं। अतः दृश्य होने मात्र से वे शुक्ति- रजत के समान मिथ्या हैं ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी भगवती श्रुति ने स्थूल-सूक्ष्म प्रपञ्च का बाध कर दिया है यह बताकर, युक्ति से भी उसका बाध बता रहे हैं। जिस प्रकार विषय के सम्बन्ध से उत्पन्न हुई मन की विषयाकार वृत्तिरूपा जाग्रत् अवस्था है, उसी प्रकार स्वप्न और स्मृति के समय (विषय का अभाव रहने पर भी) मन की वृत्ति विषयाकार हुई-सी दिखाई देती है। वे मनो- वृत्तियाँ आत्मा के द्वारा दृश्य रहती हैं, उस कारण उन्हें आत्मा से पृथक् ही समझना चाहिये। वे आत्मा की विशेषण नहीं हैं। तथैव दृश्य होने के कारण ही शरीर, मन एवं देहद्वय का प्रतिभास भी आत्मा से पृथक् ही है। अर्थाकार (विषयाकार) हुआ जो रूप है, वह मन का रूप है, आत्मा का नहीं। आत्मातिरिक्त स्थूल-सूक्ष्मादि यच्चयावत् पदार्थ, आत्मा के द्वारा दृश्य होने के कारण उससे पृथक् ही हैं। और दृश्य होने से शुक्तिरजतादि के समान वे सभी मिथ्या हैं ॥ ४९ ॥ स्वभावशुद्धे गगने घनादिके मलेऽपयाते सति चाविशेषता । यथा च तद्वच्छ्रुतिवारितद्वये सदाऽविशेषो गगनोपमे दृशौ ॥५०॥ स्वभावशुद्धे इति—जैसे स्वभावतः ही शुद्ध आकाश में मेघादि मल के निवृत्त हो जाने पर कोई विशेषता नहीं रहती, वैसे ही भगवती श्रुति के द्वारा द्वैतमल का निराकरण कर देने पर उस आकाशसदृश साक्षी में सर्वदा ही विशेषता का अभाव रहता है ॥ ५० ॥ हृदयस्पर्शिनी भगवती श्रुति के द्वारा यदि आत्मा में अध्यस्त संसार का निरसन (निषेध) कर आत्मा का प्रतिपादन किया जा रहा है, तो निवृत्त संसारी और अनिवृत्त संसारी में कोई भेद ही नहीं रहा, दोनों समान हैं, तब उसमें अनित्यत्वादि दोषों की प्रसक्ति क्यों नहीं होगी ? अथवा प्रकारान्तर से यह भी कह सकते हैं कि अध्यस्त का निषेध करने से आत्मा में निवृत्त-संसारत्वरूपविशेषतारूपी विकार पैदा होने के कारण उसमें अनित्यत्वादि दोष का प्रसंग क्यों नहीं होगा ? उक्त शंका का समाधान यह है कि जिस प्रकार स्वभावतः शुद्ध आकाश में मेघादि मल की निवृत्ति हो जानेपर कोई विशेषता (विकार) नहीं रहती, अर्थात् आकाश (गगन) रूप अधिष्ठान सदैव विकाररहित (अविक्रिय) ही है। उसी प्रकार श्रुति के द्वारा जिसमें द्वैत का निषेध किया गया है, उस आकाशसदृश साक्षी में सर्वदा ही विशेषता का अभाव है। अर्थात् उसमें कूटस्थता है। यह दृक् आत्मा, स्वभावत एव शुद्ध है, उसके स्वरूप में अध्यस्तनिवृत्ति के व्यतिरिक्त कभी कोई विशेष नहीं होता। और यह निवृत्ति, मिथ्याप्रतियोगिक होने से (मिथ्या पदार्थ की निवृत्ति होने से) अधिष्ठानरूप दृगात्मा के व्यतिरिक्त (भिन्न) नहीं है। अतः आत्मस्वरूप में कभी कोई किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ करता। उसका अपना विशुद्ध स्वरूप ही आच्छादन के हट जाने पर प्रकट रहता है ॥ ५० ॥ ॥ इति चतुर्दशं स्वप्नस्मृतिप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग १५: नान्यदन्यत्प्रकरणम्

नान्यदन्यत्प्रकरणम् नान्यदन्यद्भवेद्यस्मान्नान्यत्किंचिद्विचिन्तयेत् । अन्यस्यान्यात्म*भावे हि नाशस्तस्य ध्रुवो भवेत् ॥१॥ नान्यदिति—प्रत्येक वस्तु, स्वरूपतः भिन्न ही रहती है, इसीलिये कोई वस्तु, किसी दूसरी वस्तु के रूप में नहीं समझी जाती—यह लौकिक नियम है, तदनुसार जीव 'ब्रह्म' नहीं हो सकता, यह भावना मुमुक्षु पुरुष को नहीं करनी चाहिये। अर्थात् 'ब्रह्म' मुझसे भिन्न है—यह चिन्तन नहीं करना चाहिये। यदि अन्य का अन्य भाव हो जाता है, यानी ब्रह्म, आत्मस्वरूप में परिणत होता है और आत्मा 'ब्रह्मरूप' हो जाता है—इस प्रकार चिन्तन करने पर तो उसका अवश्य ही नाश हो जायेगा। क्योंकि परिणामी मानने पर ब्रह्म की अनित्यता का वारण नहीं हो सकेगा। उसे अनित्य कहना होगा। अतः वास्तव में आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। उनमें कोई भेद नहीं है ॥ १॥ हृदयस्पर्शिनी कतिपय एकदेशीय विद्वानों का कहना है कि यदि आत्मा, स्वभावत एव शुद्ध है, तो साधनों के निरूपण करने की आवश्यकता ही नहीं, उनका निरूपण करना व्यर्थ होगा। साधन निरूपण करने से स्पष्ट हो रहा है कि वह आत्मा स्वभावत एवं शुद्ध नहीं है, अपितु स्वभावतः ही वह संसारी है और ज्ञान, ध्यान आदि साधनों के अनुष्ठान से स्वभावशुद्ध ब्रह्मस्वरूपता (ब्रह्मभाव) को प्राप्त करता है। किन्तु इन एकदेशीयों के कहने पर मुमुक्षुजनों को विश्वास नहीं करना चाहिये, क्योंकि उनके कथन का श्रुति से तथा युक्ति से बाध हो जाता है। एकदेशीयों से यह प्रष्टव्य है कि जीव और ब्रह्म में अत्यन्त भेद आपको इष्ट है, या भेदाभेद इष्ट है ? अन्तिम पक्ष को इष्ट कहना तो उचित न होगा, क्योंकि भेद और अभेद दोनों परस्परविरुद्ध स्वभाव के हैं। अतः 'ब्रह्म अहम्' = मैं ब्रह्म ही हूँ, इस प्रकार ब्रह्म की और अपनी एकरूपता का ध्यान तथा ज्ञान करना संभव नहीं, और जब वह संभव ही नहीं, तब असंसारी ब्रह्मभावरूप फल की निष्पत्ति होना भी संभव नहीं। इसी भाव को मन में रखकर प्रथम पक्ष में दोष प्रदर्शित कर रहे हैं—दोनों के स्वरूप को यदि अत्यन्त भिन्न मानेंगे अर्थात् एक को जीवरूप और दूसरे को ब्रह्मरूप मानेंगे तो जो जीवरूप से स्थित है, उसे दूसरे के रूपवाला अर्थात् ब्रह्मरूप का कभी कहा ही नहीं जा सकेगा, क्योंकि दोनों का स्वरूप नितान्त भिन्न है, दोनों का स्वरूप परस्पर विरुद्ध है। दूसरा कारण यह भी है कि यदि जीवरूप नष्ट होकर ब्रह्मरूप होता है ऐसा कहें तो, पानेवाला जीवरूप ही जब नहीं रहा तब ब्रह्मरूप को पाया किसने ? अतः दोनों में अत्यन्त भेद नहीं माना जा सकता—यह बात युक्ति से सिद्ध हुई। और भेद मानने पर 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति'१ इस श्रुति से विरोध होना तो स्पष्ट ही है। एवंच एकदेशीयों का मत, श्रुति और युक्ति विरुद्ध होने से 'अन्यत् ब्रह्म' मुझसे (आत्मा से) अतिरिक्त कोई ब्रह्म है, ऐसा ईषन्मात्र (किञ्चिन्मात्र) भी चिन्तन मुमुक्षु को नहीं करना चाहिए। अपितु 'अहमेव ब्रह्म', 'ब्रह्मैवाहम्' इस प्रकार भेदोपमर्दन करते हुए एकरूप से ही आत्मवस्तु का चिन्तन करना चाहिए। यह सब ठीक है, तथापि लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि किसी साधनविशेष की सहायता से एक वस्तु, दूसरी वस्तु के रूप में परिणत हो जाती है। जैसे औषधविशेष के सम्बन्ध से ताम्र भी सुवर्ण बन जाता है। अर्थात् ताम्र का रूप सुवर्ण के रूप में बदल जाता है। तद्वत् यहाँ पर भी मान लिया जाय कि जीव का रूप ज्ञान, ध्यान के अनुष्ठान की सहायता से ब्रह्मरूप में परिवर्तित हो जाता है। किन्तु इस प्रकार मानना अनुचित होगा२। क्योंकि जैसे लाल तपे हुए लोहे के गोले पर (अयगोलक पर) डला हुआ (प्रविष्ट हुआ) १. (तै. आ. २।२ ) २. "रसविद्धमयः स्वर्ण यथा भवति सर्वदा, केनचित् साधनेनैव तथा जीवः शिवो भवेत् ।। इति केचित् स्वमोहेन प्रवदन्ति तु वादिनः ।।"-( सूत सं. ४।३९-४० )

  • न्यत्व ०—पाठान्तरम् ।

९६ उपदेशसाहस्री जलबिन्दु निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है, उसी तरह भेदवादी के अनुसार ब्रह्मस्वरूप के विरुद्ध (भिन्न) स्वरूप वाले जीव का, अपने से भिन्न स्वरूप वाले ब्रह्म में यदि एकीभाव कहा जाय तो निश्चय ही जीव के रूप का नाश हो जायगा, उस कारण ब्रह्मभावापत्ति की पुरुषार्थ में गणना न होगी, बल्कि उसे पुरुषार्थ न कहा जाकर अनर्थार्थ कहा जायगा । ताम्र का दृष्टान्त देना यहाँ उचित न होगा । ताम्र का रूप, सुवर्ण के रूप में परिवर्तित समझना केवल भ्रम है, वास्तविक नहीं है । जैसे वस्त्र को नीले पीले किसी रंग में रंगने पर उसका अपना निजी रूप, नीले-पीले आदि रंग से अभिभूत हो जाता है, ठीक उसी तरह सुवर्ण के रूप से ताम्र का रूप कुछ काल के लिये अभिभूतमात्र हो जाता है, कुछ समय के पश्चात् सुवर्णाकारता (सुवर्ण का रूप) के हट जाने पर पुनः ताँबे का रूप दृष्टिगोचर होने लगता है, उसपर सर्वदा के लिये सुवर्णरूप नहीं रहता । अतः 'ताँबे का सोना हो गया'—यह ज्ञान जैसे भ्रमात्मक, वैसे ही जीव और ब्रह्म को भिन्न मानकर जीव का ब्रह्मरूप हो जाने का ज्ञान भी भ्रमात्मक ही रहेगा । अतः जीव को ब्रह्म से भिन्न नहीं समझना चाहिए ॥ १ ॥ स्मरतो दृश्यते दृष्टं पटे चित्रमिवार्पितम् । यत्र येन च तौ ज्ञेयौ सत्त्वक्षेत्रज्ञसंज्ञकौ ॥२॥ स्मरत इति—पूर्व दृष्ट नील-पीत आदि वर्णों का स्मरण करने वाले पुरुष को वस्त्र पर काढ़े हुए चित्र के समान उन नील-पीतादि वर्णों के वासनाओं की उपलब्धि होती है। वह उपलब्धि जहाँ होती है और जिसे होती है, उन्हें क्रमशः 'सत्त्व' (बुद्धि) और क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) समझना चाहिये ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि अपने (आत्मा) से अतिरिक्त कोई ध्येय नहीं है, और ध्यातृ-ध्येयभाव के उपपन्न न हो पाने से अपना ही अपने में ध्यान करना भी संभव नहीं है, तो निदिध्यासन का विधान क्यों किया गया है ? अतः जीव-ब्रह्म का भेद मानना चाहिए । इस प्रश्न के उत्तर में यही कह रहे हैं कि बिना भेद माने भी उपपत्ति हो जाती है, उसके लिये भेद मानने की आवश्यकता नहीं । पूर्वदृष्ट नील-पीतादि रंग का स्मरण करने वाले पुरुष के अन्तःकरण में, वस्त्र पर काढ़े हुए चित्र के समान उन नील-पीतादि रंगों के वासनाओं की उपलब्धि होती है। वह उपलब्धि जहाँ होती है, उसे सत्त्व (बुद्धि-अन्तःकरण) कहते हैं, और जिसे वह होती है, उसे क्षेत्रज्ञ (जीव) कहते हैं। तथाच 'आत्मा निदिध्यासितव्यः' विधि ने 'त्वम्' पदार्थ का विवेक (विचार) सम्पादन ही निरन्तर करने के लिए कहा है, विवेक किया हुआ (विविक्त हुआ) 'त्वमर्थ' ही तो ब्रह्म है। 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्याकारक अपरोक्षानुभव (प्रत्यक्ष) से ही संसारनिवृत्तिरूप फल की प्राप्ति होती है। अपने (आत्मा) से ब्रह्म अन्य (भिन्न) है, इत्याकारक अन्यत्व की भावना करने पर पूर्वोक्त न्याय से अन्य की अन्यात्मकता न हो सकने से संसार की निवृत्ति होना कभी संभव नहीं है, जिससे विधि को निष्फल कहना पड़ेगा ॥ २ ॥ फलान्तं चानुभूतं यद्युतं कर्त्रादिकारकैः । स्मर्यमाणं हि कर्मस्थं पूर्वं* कर्मैव तच्चितः ॥३॥ फलान्तमिति—सुख-दुःखादि फल पर्यन्त कर्तृ-कर्मादिकारकविशिष्ट जिन द्वैत पदार्थों का पहले अनुभव किया था, वे द्वैत पदार्थ ही अब याद आने पर कर्मस्थ (दृश्यरूप अन्तःकरण आदि में स्थित) दिखाई देते हैं। इसलिये पहले भी वे चेतन आत्मा के कर्म (दृश्य) थे । निष्कर्ष यह है कि जब हम स्मरण करते हैं, उस समय वासनात्मक द्वैत अपने आश्रयभूत अन्तःकरण में स्थित दिखाई देता है। उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी सुख-दुःखादि पर्यन्त जितना भी कर्तृ- कर्मादिकारकविशिष्ट स्थूल प्रपञ्च है, वह सब अपने आश्रयभूत स्थूल-सूक्ष्म शरीर में स्थित हुआ ही अनुभव होता था । अतः सभी अवस्थाओं में वे पदार्थ आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होते रहते हैं यह मानना होगा, क्योंकि उनके जो आश्रय हैं, वे भी उन्हीं के समान 'आत्मा' के दृश्य हैं। इसलिये केवल 'आत्मा' ही साक्षी है, और उसके अतिरिक्त सभी पदार्थ 'आत्मा' के दृश्य हैं, और उसमें अध्यस्त हैं—यही समझ में आता है ॥ ३ ॥

  • पूर्वकर्म०—पाठान्तरम्

नान्यदन्यत्प्रकरणम् ९७ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि अन्तःकरण के प्रत्यक्ष न होने से उसमें स्थित नील-पीतादि की उपलब्धि, स्मृति-अवस्था में कैसे हो सकती है ? इसका उत्तर तो यह है कि सुख-दुःखादि फलपर्यन्त जिन कर्तृ-कर्मादि कारकों से युक्त द्वैत पदार्थों का प्रथमतः (पूर्व) अनुभव किया था, उनका अब स्मरण किये जानेपर वे दृश्यरूप अन्तःकरणादि में स्थित (कर्मस्थ) दिखाई देते हैं; द्रष्टृनिष्ठ नहीं दिखाई पड़ते । क्योंकि उससे पूर्व भी स्मर्यमाण अधिकरण का अधिकरणरूप अन्तः- करण, 'आत्मा' (चित्) का दृश्य (कर्म) ही है । निष्कर्ष यह है- पूर्वानुभूत विषयाकार वृत्ति, जो अन्तःकरण की परिणामरूप है, उसे ही 'स्मृति' कहते हैं। उसमें भासित होनेवाला (भासमान) जो विषय, वह आश्रय के सहित (साश्रय) ही भासित होता है । उस समय साक्षी के द्वारा अनुभूयमान विषय की अवस्थिति का भान कहीं बाहरी आश्रय में नहीं होता है । जिस प्रकार स्मरण करते समय वासनात्मक द्वैत अपने आश्रय अन्तःकरण में स्थित दिखाई देता है, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी सुखदुःखादिपर्यन्त जितना कर्तृ-कर्मादिकारकविशिष्ट स्थूल प्रपञ्च है, वह सब अपने आश्रय स्थूल-सूक्ष्म शरीर में स्थित ही अनुभूत होता है । अतः सभी अवस्थाओं में वे आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होनेवाले हैं, क्योंकि उनके आश्रय तो उनके समान ही आत्मा के दृश्य हैं । अतः एकमात्र आत्मा ही साक्षी है, शेष सभी पदार्थ आत्मा के दृश्य और उसमें अध्यस्त हैं। एवंच पहिले भी ये सभी चेतन (आत्मा) के कर्म (दृश्य) ही थे ॥ ३ ॥ द्रष्टुश्चान्यद्‌भवेद्दृश्यं दृश्यत्वाद्घटवत्सदा । दृश्याद्द्रष्टाऽसजातीयो न धीवत्साक्षिताऽन्यथा ॥४॥ द्रष्टुरिति—सभी दृश्य पदार्थ घट-पटादि के समान दृश्य रहने से सर्वदा ही द्रष्टा से पृथक् होते हैं। 'द्रष्टा' कभी भी 'दृश्य' का सजातीय नहीं होता । यदि यह न माना जाय तो उसे भी बुद्धि के समान परिणामी कहना होगा । तब उसे 'साक्षी' नहीं कह सकेंगे ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से 'स्मर्यमाण के अधिकरण के रूप में चित्त ही दिखाई देता है',—यह बताया गया, जिससे अन्तःकरण में साक्षी की प्रत्यक्षता सिद्ध हुई । किन्तु भाट्ट मीमांसकों ने आत्मा को ही द्रष्टा और दृश्य दोनों रूपों में माना है । अतः कहना होगा कि स्वगत वासनारूप को ही आत्मा देखता है, 'इदं स्मरामि'—यह अनुभव तो अन्यथा भी सिद्ध हो सकता है, अतः अन्तःकरण को साक्षीप्रत्यक्ष कैसे कह सकेंगे ? उत्तर यह होगा कि दृश्य पदार्थ, घटादि के समान दृश्य होने के कारण ही सर्वदा द्रष्टा से भिन्न होते हैं, अर्थात् 'विमतं दृश्यं द्रष्टुरत्यन्तं भिन्नं, दृश्यत्वात्, घटवत्'—इस अनुमान से द्रष्टा और दृश्य का भेद सिद्ध रहने पर भी परिणामिता के कारण साजात्य (सजातीयता) का संभव होने से द्रष्टा का सजातीय ही यह दृश्य है, यह क्यों न कहा जाय ? द्रष्टा कभी भी दृश्य का सजातीय नहीं होता । अन्यथा दृश्यांश के अचेतन होने से उसका (द्रष्टा का) आत्मत्व उपपन्न नहीं हो सकेगा । तथा बुद्धि के समान उसे परिणामी मानने पर उसकी साक्षिता सिद्ध न हो पायगी ॥ ४ ॥ स्वात्मबुद्धिमपेक्ष्यासौ विधीनां स्यात्प्रयोजकः । जात्यादिः शववत्तेन तदज्ञानात्मताऽन्यथा ॥५॥ स्वात्मबुद्धिमिति—माता-पिता आदि के मृत शरीर में आत्मीयता का दृढ़ अभ्यास रहने से उसके संस्कार करने की प्रवृत्ति होती है, उसी तरह ब्राह्मणत्वादि जाति, वृद्धादि अवस्था और पिता-पुत्रादि सम्बन्धों में भी आत्मत्व का अभिनिवेश रहने से ही वे विधि में प्रवृत्त कराते हैं । वे शव के समान ही आत्मा के धर्म नहीं हैं। नहीं तो 'आत्मा' की अनात्मता कही जायगी ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि आत्मा तो साक्षी हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो ब्राह्मणत्व आदि जातिमान् रहता है, उस कारण उसमें विशेषता रहती है, जिससे उसको कर्मानुष्ठान का अधिकार प्राप्त रहता है, इस प्रकार उसमें १३

९८ उपदेशसाहस्री परिणामित्व की उपपत्ति हो जाती है। तस्मात् विकारी होने के कारण उसे साक्षी कैसे कहा जा सकता है ? उक्त प्रश्न का यह उत्तर है कि शव के समान ब्राह्मणत्वादि जाति, उसी प्रकार वय, अवस्था आदि तथा पिता-पुत्रादि सम्बन्धों में भी आत्मत्व का अभिनिवेश होने से, वे विधि के प्रयोजक (प्रवर्तक) बनते हैं। वस्तुतः प्राण निकल जाने पर देह, 'शव' कहलाता है, तथापि 'मेरी माता, मेरे पिता'—यह अध्यास दृढ़ रहने के कारण, वह संस्कार का प्रयोजक होता दिखाई देता है, अर्थात् उसके संस्कारादि किये जाते हैं। उसके अभाव में नहीं। उसी प्रकार (शव के समान ही) जाति, वृद्धादि अवस्था, एवं पिता-पुत्रादि सम्बन्ध भी आत्मा के धर्म नहीं है। यदि इन सब को आत्मा के धर्म कहें तो घट आदि के समान उसमें अनात्मता (जड़ता) सिद्ध होगी। तस्मात् आत्मा को साक्षी समझना चाहिये, कर्म का अधिकारी सुनकर उसे परिणामी (विकारी) नहीं समझना चाहिये ॥ ५ ॥ न प्रियाप्रिय इत्युक्तेर्नादेहत्वं क्रियाफलम् । देहयोगः क्रियाहेतुस्तस्माद्विद्वान् क्रियास्त्यजेत् ॥६॥ नेति—'आत्मा' अशरीरी है, उसे कभी भी सुख-दुःख आदि स्पर्श नहीं करते—इस श्रुतिवचन के अनुरोध से 'अशरीरत्व' को 'कर्म' का फल नहीं समझना चाहिये। 'कर्म' का फल तो 'देह' के साथ सम्बन्ध होना ही है। अतः विद्वान् (ज्ञानी) पुरुष को कर्मों का त्याग कर देना चाहिये ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि कर्तृत्व को अध्यास-निबन्धन नहीं कह सकते, क्योंकि मुमुक्षु विद्वान् को भी मोक्षार्थ क्रियानुष्ठान करना पड़ता है। उसका समाधान यह होगा कि अशरीरत्व (शरीर रहित होना) को 'मोक्ष' कहा जाता है। उसे किसी क्रिया का फल नहीं कह सकते। क्योंकि क्रिया के फल तो 'सुख-दुःख' संसार में प्रसिद्ध हैं। वे सुख-दुःख शरीर को ही हुआ करते हैं, शरीर से अन्यत्र अशरीर पर होते उन्हें न किसी ने देखा और न सुना है। अशरीरी आत्मा को सुख-दुःख स्पर्श नहीं करते—'अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः'१ इस श्रुतिवचन से ही उसकी मुक्तता स्पष्ट हो जाती है। कर्म का फल तो देह के साथ संबन्ध होना ही है। अर्थात् कर्म (क्रिया) से देहसम्बन्ध ही साध्य है, मोक्ष नहीं। तस्मात् विद्वान् मुमुक्षु यह समझे कि मुक्ति, 'कर्म' से—साध्य होने वाली नहीं, अपितु एकमात्र 'ज्ञान' से ही वह साध्य है। इस प्रकार समझते हुए वह अहंकार सहित सम्पूर्ण कर्मों का परित्याग करे, अर्थात् संन्यस्त होकर श्रवण- मननादि में तत्पर रहे ॥ ६ ॥ कर्मस्वात्मा स्वतन्त्रश्चेन्निवृत्तौ* च तथेष्यताम् । अदेहत्वे फलेऽकार्ये ज्ञाते कुर्यात्कथं क्रियाः ॥७॥ कर्मेति—'कर्म' करने में यदि 'आत्मा' स्वतन्त्र है, तो कर्म के त्याग करने में भी उसकी वैसे ही स्वतन्त्रता समझनी चाहिये। देहसम्बन्धरहित मोक्षरूप फल यदि कर्म से साध्य नहीं है, तो 'ज्ञान' होने पर मुमुक्षु विद्वान् कर्मा- नुष्ठान क्यों करे ? ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि लोकव्यवहार में हम अनुभव करते रहते हैं कि सभी कर्म (क्रियाएँ) आत्मकर्तव्य के रूप में होते हैं, ऐसी स्थिति में विद्वान् मनुष्य उन कर्मों (क्रियाओं) को कैसे त्याग सकेगा ? समाधान यह है कि यदि आत्मा कर्म (क्रियाओं के) करने में स्वतन्त्र है, तो उसे उन कर्मों के त्यागने में भी वैसा ही स्वतन्त्र समझो। जैसे आसक्त (रागादिमान्) पुरुष प्रवृत्तिरूप कर्म में स्वतन्त्र होता है, उसीप्रकार विशुद्ध वीतराग पुरुष को भी कर्म के त्यागने (निवृत्ति) में स्वतन्त्र समझना चाहिये। कर्मसाध्य फल की अभिलाषा न रहने पर कर्म का त्याग तो अर्थात् प्राप्त है। देहसम्बन्ध से शून्य (शरीरसम्बन्धरहित) मोक्षरूप फल, किसी भी कर्म से साध्य नहीं है (अकार्य है), १. ( छां. उ. ८।१२।१ )

  • निवृत्तं ०—पाठान्तरम् ।

नान्यदन्यत्प्रकरणम् ९९ यह बात शास्त्र आदि के द्वारा ज्ञात हो जाने पर मुमुक्षु पुरुष क्यों कर्म करेगा ? अर्थात् कभी नहीं करेगा । उसके लिये क्रियाएँ निष्प्रयोजन ही हैं ॥ ७ ॥ जात्यादीन्संपरित्यज्य निमित्तं कर्मणां बुधः । कर्महेतुविरुद्धं यत्स्वरूपं शास्त्रतः स्मरेत् ॥८॥ जात्यादीनिति—ज्ञानी पुरुष 'कर्मों' की निमित्तभूत जाति आदि का सम्यक् प्रकार से त्याग कर कर्मरूप निमित्त के विरुद्ध जो आत्मा का स्वरूप है, उसका शास्त्र के अनुसार चिन्तन करे । 'ब्राह्मण वसन्त ऋतु में अग्नि का आधान करे'—इस विधिवाक्य में ब्राह्मण जाति ही अग्न्याधान करने में निमित्त है। अतः कर्मानुष्ठान में 'जाति' को ही निमित्त कहना होगा, किन्तु शुद्ध आत्मा में कोई जाति आदि नहीं है, इसलिये उसे कर्म के निमित्त के विरुद्ध कहा गया है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी तो क्या केवल क्रिया (कर्म) परित्याग करनेमात्र से विदेहकैवल्यरूप अकार्य की प्राप्ति हो जायगी ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जा रहा है कि बुद्धिमान् (पण्डित) पुरुष, कर्मों की निमित्तभूत जाति का अर्थात् जाति आदि के अभिमान का सम्यक् प्रकार से त्याग कर कर्म-निमित्त के उपमर्दक शुद्ध आत्मस्वरूप का शास्त्रानुसार चिन्तन करता रहे । तात्पर्य यह है कि 'वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत'—वसन्त ऋतु में ब्राह्मण अग्न्याधान करे, इस विधि के अनुसार अग्न्याधान में निमित्त 'ब्राह्मणत्व जाति' है । अतः कर्म के अनुष्ठान में निमित्त ब्राह्मणत्व जाति ही कही जायगी, किन्तु शुद्ध आत्मा में कोई जाति आदि नहीं है। अतः शुद्ध आत्मस्वरूप को कर्म की निमित्तभूत जाति आदि से विरुद्ध कहा गया है। एवञ्च कर्मपरित्याग करने मात्र से विदेहकैवल्य (मोक्ष) प्राप्त नहीं होगा, अपितु यथाशास्त्र विशुद्ध आत्मस्वरूप के चिन्तन करने से वह प्राप्त होगा ॥ ८ ॥ आत्मैकः सर्वभूतेषु तानि तस्मिंश्च खे यथा । पर्यगाद्व्योमवत्सर्वं शुक्लं दीप्तिमदिष्यते ॥९॥ आत्मैक इति—समस्त भूतों में आकाश के समान एक ही आत्मा व्याप्त है, तथा वे भूत भी उसी (आत्मा) में अध्यस्त हैं। क्योंकि 'स पर्यगाच्छुक्र' अर्थात् वह (आत्मा) सर्वगत, शुक्र अशरीरी, अक्षत, स्नायु आदि से रहित, शुद्ध और पापशून्य है। इस श्रुतिवचन के अनुसार आत्मा को आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त, शुद्ध और प्रकाशमय माना गया है ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी किस रूप के (किंलक्षण) आत्मा का चिन्तन करे ? और कौन-सा वह शास्त्र है, जिसके अनुसार चिन्तन करे ? उसके उत्तर में शास्त्रीय वाक्यों का उल्लेख करते हुए स्मर्तव्य आत्मस्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं—'आत्मैकः··· खे यथा ।' इस पूर्वार्ध से ईशावास्योपनिषद् के मन्त्र¹ के अर्थ को बताया गया है। और अग्रिम सार्धश्लोक से आठवें मन्त्र² के अर्थ को बताया है । सम्पूर्ण भूतों में 'मैं' ही एकमात्र आत्मा हूँ, भिन्न-भिन्न भूतों में भिन्न-भिन्न आत्मा (चेतन) नहीं है । तो क्या ये भूत, आत्मा के अधिकरणस्वरूप हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा कि ये भूत, आत्मा के अधिकरण नहीं हैं, प्रत्युत उस आत्मा में ही ये भूत अध्यस्त हैं, उससे पृथक् नहीं हैं। तथाच अपने (आत्मा) में अध्यस्त हुए समस्त विकारों में मणियों में, सूत्र के समान पिरोये हुए (अनुस्यूत) सत्तास्फूर्तिरूप आत्मा का विकारोप- मर्दपुरःसर अनुसन्धान करते रहना चाहिये । अन्तः (भीतर) सुषिर रूप से और बाहर अवकाश रूप से विद्यमान आकाश में जैसे भूतसम्बन्ध है, उसी प्रकार से समझना चाहिये । वह आत्मा सर्वगत, शुभ्र, अशरीरी, अक्षत, १. "यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ॥ सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥"—( ई. उ. ६) २. "स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।"—(ई० उ० ८) ।