उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनान्यदन्यत्प्रकरणम् नान्यदन्यद्भवेद्यस्मान्नान्यत्किंचिद्विचिन्तयेत् । अन्यस्यान्यात्म*भावे हि नाशस्तस्य ध्रुवो भवेत् ॥१॥ नान्यदिति—प्रत्येक वस्तु, स्वरूपतः भिन्न ही रहती है, इसीलिये कोई वस्तु, किसी दूसरी वस्तु के रूप में नहीं समझी जाती—यह लौकिक नियम है, तदनुसार जीव 'ब्रह्म' नहीं हो सकता, यह भावना मुमुक्षु पुरुष को नहीं करनी चाहिये। अर्थात् 'ब्रह्म' मुझसे भिन्न है—यह चिन्तन नहीं करना चाहिये। यदि अन्य का अन्य भाव हो जाता है, यानी ब्रह्म, आत्मस्वरूप में परिणत होता है और आत्मा 'ब्रह्मरूप' हो जाता है—इस प्रकार चिन्तन करने पर तो उसका अवश्य ही नाश हो जायेगा। क्योंकि परिणामी मानने पर ब्रह्म की अनित्यता का वारण नहीं हो सकेगा। उसे अनित्य कहना होगा। अतः वास्तव में आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। उनमें कोई भेद नहीं है ॥ १॥ हृदयस्पर्शिनी कतिपय एकदेशीय विद्वानों का कहना है कि यदि आत्मा, स्वभावत एव शुद्ध है, तो साधनों के निरूपण करने की आवश्यकता ही नहीं, उनका निरूपण करना व्यर्थ होगा। साधन निरूपण करने से स्पष्ट हो रहा है कि वह आत्मा स्वभावत एवं शुद्ध नहीं है, अपितु स्वभावतः ही वह संसारी है और ज्ञान, ध्यान आदि साधनों के अनुष्ठान से स्वभावशुद्ध ब्रह्मस्वरूपता (ब्रह्मभाव) को प्राप्त करता है। किन्तु इन एकदेशीयों के कहने पर मुमुक्षुजनों को विश्वास नहीं करना चाहिये, क्योंकि उनके कथन का श्रुति से तथा युक्ति से बाध हो जाता है। एकदेशीयों से यह प्रष्टव्य है कि जीव और ब्रह्म में अत्यन्त भेद आपको इष्ट है, या भेदाभेद इष्ट है ? अन्तिम पक्ष को इष्ट कहना तो उचित न होगा, क्योंकि भेद और अभेद दोनों परस्परविरुद्ध स्वभाव के हैं। अतः 'ब्रह्म अहम्' = मैं ब्रह्म ही हूँ, इस प्रकार ब्रह्म की और अपनी एकरूपता का ध्यान तथा ज्ञान करना संभव नहीं, और जब वह संभव ही नहीं, तब असंसारी ब्रह्मभावरूप फल की निष्पत्ति होना भी संभव नहीं। इसी भाव को मन में रखकर प्रथम पक्ष में दोष प्रदर्शित कर रहे हैं—दोनों के स्वरूप को यदि अत्यन्त भिन्न मानेंगे अर्थात् एक को जीवरूप और दूसरे को ब्रह्मरूप मानेंगे तो जो जीवरूप से स्थित है, उसे दूसरे के रूपवाला अर्थात् ब्रह्मरूप का कभी कहा ही नहीं जा सकेगा, क्योंकि दोनों का स्वरूप नितान्त भिन्न है, दोनों का स्वरूप परस्पर विरुद्ध है। दूसरा कारण यह भी है कि यदि जीवरूप नष्ट होकर ब्रह्मरूप होता है ऐसा कहें तो, पानेवाला जीवरूप ही जब नहीं रहा तब ब्रह्मरूप को पाया किसने ? अतः दोनों में अत्यन्त भेद नहीं माना जा सकता—यह बात युक्ति से सिद्ध हुई। और भेद मानने पर 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति'१ इस श्रुति से विरोध होना तो स्पष्ट ही है। एवंच एकदेशीयों का मत, श्रुति और युक्ति विरुद्ध होने से 'अन्यत् ब्रह्म' मुझसे (आत्मा से) अतिरिक्त कोई ब्रह्म है, ऐसा ईषन्मात्र (किञ्चिन्मात्र) भी चिन्तन मुमुक्षु को नहीं करना चाहिए। अपितु 'अहमेव ब्रह्म', 'ब्रह्मैवाहम्' इस प्रकार भेदोपमर्दन करते हुए एकरूप से ही आत्मवस्तु का चिन्तन करना चाहिए। यह सब ठीक है, तथापि लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि किसी साधनविशेष की सहायता से एक वस्तु, दूसरी वस्तु के रूप में परिणत हो जाती है। जैसे औषधविशेष के सम्बन्ध से ताम्र भी सुवर्ण बन जाता है। अर्थात् ताम्र का रूप सुवर्ण के रूप में बदल जाता है। तद्वत् यहाँ पर भी मान लिया जाय कि जीव का रूप ज्ञान, ध्यान के अनुष्ठान की सहायता से ब्रह्मरूप में परिवर्तित हो जाता है। किन्तु इस प्रकार मानना अनुचित होगा२। क्योंकि जैसे लाल तपे हुए लोहे के गोले पर (अयगोलक पर) डला हुआ (प्रविष्ट हुआ) १. (तै. आ. २।२ ) २. "रसविद्धमयः स्वर्ण यथा भवति सर्वदा, केनचित् साधनेनैव तथा जीवः शिवो भवेत् ।। इति केचित् स्वमोहेन प्रवदन्ति तु वादिनः ।।"-( सूत सं. ४।३९-४० )
- न्यत्व ०—पाठान्तरम् ।