उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९६ उपदेशसाहस्री जलबिन्दु निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है, उसी तरह भेदवादी के अनुसार ब्रह्मस्वरूप के विरुद्ध (भिन्न) स्वरूप वाले जीव का, अपने से भिन्न स्वरूप वाले ब्रह्म में यदि एकीभाव कहा जाय तो निश्चय ही जीव के रूप का नाश हो जायगा, उस कारण ब्रह्मभावापत्ति की पुरुषार्थ में गणना न होगी, बल्कि उसे पुरुषार्थ न कहा जाकर अनर्थार्थ कहा जायगा । ताम्र का दृष्टान्त देना यहाँ उचित न होगा । ताम्र का रूप, सुवर्ण के रूप में परिवर्तित समझना केवल भ्रम है, वास्तविक नहीं है । जैसे वस्त्र को नीले पीले किसी रंग में रंगने पर उसका अपना निजी रूप, नीले-पीले आदि रंग से अभिभूत हो जाता है, ठीक उसी तरह सुवर्ण के रूप से ताम्र का रूप कुछ काल के लिये अभिभूतमात्र हो जाता है, कुछ समय के पश्चात् सुवर्णाकारता (सुवर्ण का रूप) के हट जाने पर पुनः ताँबे का रूप दृष्टिगोचर होने लगता है, उसपर सर्वदा के लिये सुवर्णरूप नहीं रहता । अतः 'ताँबे का सोना हो गया'—यह ज्ञान जैसे भ्रमात्मक, वैसे ही जीव और ब्रह्म को भिन्न मानकर जीव का ब्रह्मरूप हो जाने का ज्ञान भी भ्रमात्मक ही रहेगा । अतः जीव को ब्रह्म से भिन्न नहीं समझना चाहिए ॥ १ ॥ स्मरतो दृश्यते दृष्टं पटे चित्रमिवार्पितम् । यत्र येन च तौ ज्ञेयौ सत्त्वक्षेत्रज्ञसंज्ञकौ ॥२॥ स्मरत इति—पूर्व दृष्ट नील-पीत आदि वर्णों का स्मरण करने वाले पुरुष को वस्त्र पर काढ़े हुए चित्र के समान उन नील-पीतादि वर्णों के वासनाओं की उपलब्धि होती है। वह उपलब्धि जहाँ होती है और जिसे होती है, उन्हें क्रमशः 'सत्त्व' (बुद्धि) और क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) समझना चाहिये ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि अपने (आत्मा) से अतिरिक्त कोई ध्येय नहीं है, और ध्यातृ-ध्येयभाव के उपपन्न न हो पाने से अपना ही अपने में ध्यान करना भी संभव नहीं है, तो निदिध्यासन का विधान क्यों किया गया है ? अतः जीव-ब्रह्म का भेद मानना चाहिए । इस प्रश्न के उत्तर में यही कह रहे हैं कि बिना भेद माने भी उपपत्ति हो जाती है, उसके लिये भेद मानने की आवश्यकता नहीं । पूर्वदृष्ट नील-पीतादि रंग का स्मरण करने वाले पुरुष के अन्तःकरण में, वस्त्र पर काढ़े हुए चित्र के समान उन नील-पीतादि रंगों के वासनाओं की उपलब्धि होती है। वह उपलब्धि जहाँ होती है, उसे सत्त्व (बुद्धि-अन्तःकरण) कहते हैं, और जिसे वह होती है, उसे क्षेत्रज्ञ (जीव) कहते हैं। तथाच 'आत्मा निदिध्यासितव्यः' विधि ने 'त्वम्' पदार्थ का विवेक (विचार) सम्पादन ही निरन्तर करने के लिए कहा है, विवेक किया हुआ (विविक्त हुआ) 'त्वमर्थ' ही तो ब्रह्म है। 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्याकारक अपरोक्षानुभव (प्रत्यक्ष) से ही संसारनिवृत्तिरूप फल की प्राप्ति होती है। अपने (आत्मा) से ब्रह्म अन्य (भिन्न) है, इत्याकारक अन्यत्व की भावना करने पर पूर्वोक्त न्याय से अन्य की अन्यात्मकता न हो सकने से संसार की निवृत्ति होना कभी संभव नहीं है, जिससे विधि को निष्फल कहना पड़ेगा ॥ २ ॥ फलान्तं चानुभूतं यद्युतं कर्त्रादिकारकैः । स्मर्यमाणं हि कर्मस्थं पूर्वं* कर्मैव तच्चितः ॥३॥ फलान्तमिति—सुख-दुःखादि फल पर्यन्त कर्तृ-कर्मादिकारकविशिष्ट जिन द्वैत पदार्थों का पहले अनुभव किया था, वे द्वैत पदार्थ ही अब याद आने पर कर्मस्थ (दृश्यरूप अन्तःकरण आदि में स्थित) दिखाई देते हैं। इसलिये पहले भी वे चेतन आत्मा के कर्म (दृश्य) थे । निष्कर्ष यह है कि जब हम स्मरण करते हैं, उस समय वासनात्मक द्वैत अपने आश्रयभूत अन्तःकरण में स्थित दिखाई देता है। उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी सुख-दुःखादि पर्यन्त जितना भी कर्तृ- कर्मादिकारकविशिष्ट स्थूल प्रपञ्च है, वह सब अपने आश्रयभूत स्थूल-सूक्ष्म शरीर में स्थित हुआ ही अनुभव होता था । अतः सभी अवस्थाओं में वे पदार्थ आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होते रहते हैं यह मानना होगा, क्योंकि उनके जो आश्रय हैं, वे भी उन्हीं के समान 'आत्मा' के दृश्य हैं। इसलिये केवल 'आत्मा' ही साक्षी है, और उसके अतिरिक्त सभी पदार्थ 'आत्मा' के दृश्य हैं, और उसमें अध्यस्त हैं—यही समझ में आता है ॥ ३ ॥
- पूर्वकर्म०—पाठान्तरम्